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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 34

संयोगिनिस्वयंम्बर । २६
दुखी जो बाम्हन हाँपर होइहैं तौ सब क्षत्री धर्म नशाय ॥
सुनिकै बातें पृथुइराज की भा मन खुशी चँदेलाराय ४६
डोला मँगायो संयोगिनि को सो रण खेतन दीन धराय ॥
देखिकै डोला संयोगिनि को बोला तुरत पिथौराराय ५०
लड़ो सिपाही दिल्लीवाले डोला तुरत लेउ उठवाय ॥
जीतिकै चलिहौ जोकनउजते चौगुन तलब देब घरजाय ५१
दै दै पानी रजपूतन को पिरथी सब को दीन जुझाय ॥
फिरि मुकुन्द औ रतीभानको मुर्चा परो बरोबरि आय ५२
दोऊ बराबरि के क्षत्री हैं दोऊ समरधनी बलवान ॥
खैंचि सिरोही ली मुकुन्द ने करिकै रामचन्द्र को ध्यान ५३
हनिकै मारा रतीभान को ठाकुर लीन्ह्यों वार बचाय ॥
औ ललकारा फिरि मुकुन्दको अब तुम खबरदार द्वैजाय ५४
वार हमारी सों बचिहौना तुमका लावा काल बुलाय ॥
यह कहि मारा तलवारी को सो फिरि परी ढालपरजाय ५५
बचिगा ठाकुर दिल्ली वाला ज्यहिका राखिलीन भगवान॥
सो फिरि बोला रतीभान सों करिकै मनै बड़ा अभिमान ५६
किह्यो लड़ाई है लरिकन सों कबहूँन परा जवानते काम ॥
सँभरिकै बैठो अब घोड़ा पर तुमको पठैदेउँ यमधाम ५७
खैंचिकै मारा रतीभान को सोऊ लीन ढाल की वार ॥
मुठिया रहिगै कर मुकुन्द के रणमा टूटि गिरी तलवार ५८
गद्दी कटिगै मखमल वाली औ फटिगई गैंड़की ढाल ॥
रिसहा ह्वैगा रतीभान तहँ दोऊ नैन भये तब लाल ५६
ऐंचि सिरोही को कम्मर सों मारा रतीभान बलवान ॥
गिरा तड़ाका शिर धरती माँ मरिगा तुरत मुकुन्दाज्वान ६०