आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्दलहरण । २४१ २५
पारसहै जिनके घरमा तिनकी लघुता कहि कोन दिखाई ।
राजनराज समाजबढ़्यो औचढ़योललिते यशसिंधुउफाई १०८
इतना कहिकै मलखाने ने औरो हाल दीन बतलाय ॥
बिदामांगिकै परिमालिक ते दशहरिपुरै पहुँचे आय १०६
मलखे देवा इन्दल सँगमाँ महलन गये बनाफरराय ॥
रूप देखिकै इन तीनों का आल्हा ठाढ़ भये हर्षाय ११०
बड़ी खुशहाली मन अन्तरभै औ यह बोले बचन सुनाय ॥
कहाँ बनाफर बयऊदन हैं हमरे परम सनेही भाय १११
नेही गेही नरदेही को इनसोंअधिक कौनदिखलाय ॥
परम सनेही यहि देही का नेही टिका कहाँपर जाय ११२
डाटा डपटा नहीं ऊदन का पाला प्रीति रीति अधिकाय ॥
गुणही प्यारे हैं मानुष के जानौयुगनयुगनतुमभाय ११३
होय निर्गुणी जो दुनिया मा जहँ तहँ बैठै पेट खलाय ॥
यहु यश गैहैं जे आगे नर खैहैं पुवा कचौरी भाय ११४
कलियुग आवाहै दुनियामा सब सों कलह देय करवाय ॥
भूप युधिष्ठिर यहि डरिभागे गलिगैशैलहिमालयजाय११५
क्षण क्षण बुद्धी उलटै पुलटै पण्डित मूर्ख बनावैभाय ॥
उड़ै सुहारा सम परदारा आरा चलै पेट में भाय ११६
बश नहिं इन्द्री अब काहूकी कलियुग नीच मीच सुखदाय ॥
ऋषी कहावैं जे मनइनमा तिनहुनकामदेय बहँकाय११७
यहु परितापी अरु पापी अति व्यापीभयो जगत में आय ॥
हाय रुपैया यहि समया में दैया बापू रहा कहाय ११८
बिना कन्हैया के ध्याये ते विपदा कौन हटावै आय ॥