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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 337

१८ आल्हखण्ड । ३३४
कुसुमारानी की पुरिया सों जादू गईं तहां सब हारि २५
रूप उजागर सब गुण आगर नागर देशराज का लाल ॥
विषय उमण्डी बलवण्डी जी रण्डी कुलै विडम्बी बाल २६
ती सब देखें बघऊदन को नैनन बैनन सैन चलाय ॥
धर्म न छाँड़ै यहु क्षत्री का ज्यहिका कहैं उदयसिंहराय २७
दीख कुदृष्टी ज्यहि ऊदन का त्यहिका डाटिदीन ततकाल ॥
नैनन सैनन अरु बैनन में डिगैन सिद्धपुरुष यिहु काल २८
हम नहिं भोगी नर योगी हैं रोगी विषय भरी तू बाल ॥
माना भगिनी अरु कन्यासम देखैं तीनिभाव सबकाल २६
तपै बिवण्डी पररण्डी है झण्डी नरक केरि अधिकाय ॥
यह हम जानतहैं नीकी विधि तुमते साँच देयँ बतलाय ३०
बातें सुनिकै ई योगी की नारिन मूड़ लीने औंधाय ॥
बोलि न आवा क्यहु नारी ते घर घर चलन लगीं शर्माय ३१
खबरि पायकै कान्तामल ने योगिन द्वार लीन बुलवाय ॥
योगी आये जब द्वारे पर आसन तुरतदीन बिछवाय ३२
लैकै गडुवा दौरति आवा तुरतै पाँय पखारोसि आय ॥
पैर धोयकै तिन योगिन का लै जलधाम छिनाकाजाय ३३
पदै मनुस्मृति भलकान्तामल जानै अतिथिभाव अधिकाय ॥
पै पहिंचानत त्यहि योगीथे मकरँद बार बार सुसुकाय ३४
यह गति दीख्यो मकरन्दाकै बोल्यो तुरत बनाफरराय ॥
तुम पहिंचान्यो नहिंमकरँदको तुमको देखि देखिमुसुकायँ ३५
पाय इशारा यहु ऊदन का मुख तन दीख खूब धरिध्यान ॥
देवा ऊदन मकरन्दा का निश्चय फेरिलीन पहिंचान ३६
किह्यो खातिरी तब पहुनन कै लै रनिवास पहुँचा जाय ॥