आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइन्दलहरण । ३३३ १७
मर्म जानिकै महतारी ने आशिर्वाद दीन हरषाय ॥
मकरँदचलिभा निजमहलनको पहुँचा नारिपास सो जाय १४
कही हकीकति सब रानी सों कुसुमा बोली शीश नवाय ॥
पहिले जैयो तुम झुन्नागढ़ तहँपर पता लगैयो जाय १५
घर घर जादू है झुन्नागढ़ कन्ता सत्य कहौं समुझाय ॥
तुमहूं जावो ऊदन सँग में हमरो चित्त बहुतघबड़ाय १६
इतना कहिकै कुसुमारानी पुरिया चारि दीन पकराय ॥
रखिहौ मुखमाँ यह पुरिया जब जादूसकी निकट नहिंआय १७
लैकै पुरिया मकरन्दा फिरि तहँ ते कूच दीन करवाय ॥
देवा ऊदन जहाँ ठाढ़े थे मकरँद तहाँ पहुँचा आय १८
सम्मत करिकै तीनों योगी झुन्नागढ़ै चले फिरिधाय ॥
सातरोजकी मैजलि करिकै झुन्नागढ़ै पहुँचे आय १६
बाजा डमरू मकरन्दा का खँझड़ी मैनपुरी चौहान ॥
बाजी बँसुरी तहँ ऊदन की गावनलाग राग कल्यान २०
तान कान में ज्यहिके जावे त्यहिके जाय प्रान पर आन ॥
मोहित हैगे नरनारी सब लागे हृदय तान के बान २१
भा खलभल्ला औ हल्लाअति लल्ला छांड़ि चलीं तब बाल ॥
होश बहुल्ला ना छल्ला का ✪अल्लाध्यानकरैत्यहिकाल२२
भये दुपल्ला उरपल्ला तब कङ्कन कल्ला दीन भिड़ाय ॥
प्राणन तल्ला तज्यो इकल्ला लल्ला जौनु बनाफरराय २३
बड़ी भीर भै गलियारे में नाचै देशराज का लाल ॥
बाजै डमरू जस मकरँद कै देवा देय तैसही ताल २४
रूप देखिकै तिन योगिन का जादू करें अनेकन नारि ॥
✪ ( अल्ला ) देवी का नाम है ॥