आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ आल्हखण्ड । २३४
मई न ऐसो कहूँ पैदा भो जैसो रहै बनाफरराय ६८
सोच आयगा ब्रह्मानँद के मनमाँ बार बार पछिताय ॥
छाती पीटै रानी अगमा महलन गिरी पछाराखाय ६९
तोहिं चौंड़िया यह चाही ना कीन्हे घाटि महलमौँ आय ॥
नालति तेरी द्विज देही का चौंड़ा काहगये बौराय ७०
घाव मूंदिकै बघऊदन का रानी औषध दीनलगाय ॥
कन्या राजनकी महरानी औ सब जानै भले उपाय ७१
मारु कूटकी घर घर चरचा क्षत्री बंश रहै तंत्र भाय ॥
राजा पिरथी की महरानी त्यहिबघऊदनदीनजियाय ७२
उठा दुलरूवा द्यावलिवाला बेला देखिगई हर्षाय ॥
ऐसि खुशहाली भै ब्रह्मा के जैसे योग सिद्धि है जाय ७३
गवैं सुहागिल दिल्ली वाली लैलै नाम बनाफरक्यार ॥
बड़ी खुशहाली भै महलन में होवन लाग मंगलाचार ७४
पायँ लागिकै महरानी के बोला उदयसिंह सरदार ॥
आयसु तुम्हरी जो हमपावैं तौ तम्बुन को होयँ तयार ७५
रूप देखिकै बघऊदन को नारी पीटन लगींकपार ॥
भई अभागिनिहमसब महलन अब ये चलन हेत तय्यार ७६
रूप न देखा क्यहु क्षत्री का जैसो उदयसिंह सरदार ॥
पाग बैंजनी शिरपर बाँधे ऊपर कलँगी करै बहार ७७
बेला चमेला के गजरा हैं तिनपर परा मोतियनहार ॥
बाँके नैना यहि क्षत्री के सखिया चुभै करेजे फार ७८
मन बौराना सहिवाला पर आला देवरूप अवतार ॥
दूसरि बाला त्यहि काला में बोली मानो कही हमार ७९
आगि तुम्हारी अस नाहीं है जो ये होयँ तोर भर्तार ॥