आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमलखानका बिवाह । १७६ २३
तिसर नगाड़ा के बाजतखन चलिभे सबै शूर सरदार ९७
कूच करायो पथरीगढ़ते भुन्नागढ़ै पहुँचे जाय ॥
गा हरिकारा पथरीगढ़ते राजै खबरि दीन बतलाय ९८
सुनिकै बातें हरिकारा की सूरज बेटा लीन बुलाय ॥
काँतामल औ मानसिंह सों राजा कह्यो खूब समुझाय ९९
जितने आये हैं मोहबेते सो बिन घाव एक ना जायँ ॥
बिदा माँगिकै सो राजा सों डङ्का तुरत दीन बजवाय १००
झीलमबख्तर पहिरि सिपाहीन हाथम लीन ढाल तलवार ॥
रणकी मोहरि बाजन लागी रणका होनलाग ब्यवहार १०१
कूच करायो भुन्नागढ़ सों पहुँचे समरभूमि मैदान ॥
ढोल औ तुरही बाजन लागीं घूमनलागे लालनिशान १०२
इतसों आगे सूरज ठाकुर उतसों बेंदुलको असवार ॥
सूरज ठाकुर के देखत खन ऊदन गरु दीन ललकार १०३
छलिकै लैकै मलखाने को औ खन्दक में दीन डराय ॥
बिना बिहाये हम जैहैं ना बहुतन धजी २ उड़िजाय १०४
इतना सुनिकै सूरज जरिगे अपनो घोड़ा दीन बढ़ाय ॥
औ ललकारा उदयसिंह को अब तुम खबरदार है जाय १०५
वार हमारी सों बचिहैना ऊदन मोहबे के सरदार ॥
इतना कहिकै सूरज ठाकुर जल्दी खैंचिलीन तलवार १०६
ऐंचिकै मारा बघऊदन को ऊदन लीन्ह्यो वार बचाय ॥
मानसिंह औ फिरि देबाका परिगा समर बरोबरि आय १०७
सूँदि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन केर ॥
हौदा हौदा यकमिल हैगे मारैं एक एक को हेर १०८
गोली ओलासम वर्षन भईं कहूँ कहूँ कड़ाबीनकी मार ॥