आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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जालिम राजा नयपाली है ज्यहिघर अमरढोल सरदार ३७
कौन बियाहन त्यहि घर जैहै ऐहै लौटि कौन बलवान ॥
टीका फेरो सब राजन ने मानो कही वीर मलखान ४८
सवैया ॥
शान चढ़ी मलखान के ऊपर आन नहीं कछूहू नृप राखी।
मोहिं पियार न प्राण भुवार कहौं मैं सत्य सदाशिव साखी ॥
कीरतिही प्रिय बीरनको हम शान कि आन सदा मनमाखी।
आनरहै नहिं शान कि जो मरि जान भलो ललिते हम भाखी ४६
इतना कहिकै मलखाने ने डंका तुरत दीन बजवाय ॥
लिखिकै उत्तर उदयसिंहने सुवना गरे दीन लटकाय ५०
उड़िकै सुवना फिरि मोहबे ते सुनवाँ पास पहुंचा आय ॥
रानी मल्हना के महलन में राजा तुरत पहुंचे जाय ५१
हाल बतायो सब मल्हना को सुनतै गई सनाकाखाय ॥
मलखे देवा को बुलवायो सुनतै गये महल में आय ५२
मल्हना बोली तब मलखे ते बेटा हाल देउ बतलाय ॥
काहे डंका तुम्हरे बाजे कहँ चढ़िजाउ बनाफरराय ५३
हाथ जोरिकै मलखे बोले मल्हना चरणन शीश नवाय ॥
पाती आई नैनागढ़ की आल्हा तहाँ बियाहन जायें ५४
सुनिकै बातें मलखाने की मल्हनै देवै कहा सुनाय ॥
शकुन तुम्हारे सों मलखाने माड़ो लीन बाप का दायँ ५५
कैसी गुजरी नैनागढ़ में सो सब हाल देव बतलाय ॥
सुनिकै बातें ये मल्हना बुझि देवा पोथी लीन मँगवाय ५६
लैके पोथी ज्योतिष वानी औ सब हाल दीन बतलाय ॥
जीति तुम्हारी द्वैहै सांची बात कहैं हम माय ५७