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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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माड़ोका युद्ध । १०५ ५७

किला घरेरैं अब लोहागढ़ लश्कर कूच देयँ करवाय २०
पांचो मिलिकै सम्मत करिकै डंका तुरत दीन बजवाय ॥
घोड़ बेंदुला ऊदन बैठे मलखे चढ़े कबुतरी जाय २१
घोड़ मनोहर पर देवा है सय्यद सिरगा पर असवार ॥
आल्हा बैठे पत्रशब्दा पर सुमिरिकैदेव मोहोबे क्यार २२
कूच करायो बबुरीवनते लोहा गढ़ै पहुंचे जाय ॥
तोप लगायो तहँ फाटक पर बत्ती तुरत दीन करवाय २३
फाटक गाँसा जम्बै दीख्यो रानी महल पहुंचा जाय ॥
चारो पुत्रन कै सुधि करिकै रोवनलाग तहां पर आय २४
बंश बूड़िगा म्वर पापी का मेरो काल रहा नगञ्याय ॥
बड़ो लड़ैया सब शूरन में आल्हाकेर लहुरवाभाय २५
म्वहिं भय आई त्यहि ऊदनते ताते प्राण मोर घबड़ायँ ॥
सुनिकै बातें ये राजाकी बिजमाबोली बचन सुनाय २६
करिकै जादू मैं ऊदनको राखौं झारखण्ड में जाय ॥
इतनाकहिकै चली बिजैसिनि लश्कर तुरत पहुंची आय २७
डाखो गुटका मुखभीतर माँ जासों नजरबन्द हैजाय ॥
गायब ह्वैकै तहँ पर पहुँची जहँ पर रहै लहुरवाभाय २८
नारसिंह औ भैरों वाली तीसर जौन महमदा वीर ॥
पुरिया डारी तहँ जादू की ह्वैगे सबै बीर आधीर २९
डारि मशान दयो लश्कर में नाहीं मसा तलक भन्नाय ॥
जादू मारी बंगाले की ऊदन मेढ़ा लयो बनाय ३०
लैके मेढ़ा बिजमाँ चलिभै पहुँची झारखण्ड में आय ॥
गुरू झिलमिलाकी मढ़ियामाँ मेढ़ा बँधा बिजैसिनिजाय ३१
हाथ जोरिकै गुरुबाबा के औ सब हाल दीन्ह समुझाय॥