आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । १०३ ५५
पैदा होई सो मरजाई आई कछू नहीं फिर काम ॥
भलो बुरो जो जग में करिहै सोई बना रही नितनाम २
परमसनेही रघुनन्दन बिन नेही और जगत में कौन ॥
तिनहित देही नरगेही तज जावै राम भौनको तौन ३
आलस देही नरगेही तज सो यमपुरी पहुँचे जाय ॥
पार न जावै बैतरणी के धरि धरि चील्हगीधसबखायँ ४
छूटि सुमिरनी गै देवनकै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥
कल्हू पिरायी नृप जम्बै को ठाकुर उदयसिंह सरदार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
माहिल चलिभे ह्याँ उरई ते लिल्ली घोड़ीपर असवार ॥
तिक तिक हाँकै त्यहि घोड़ीका एँड़ी करें भड़ाभड़ मार १
थोड़ी देरी के अरसा माँ माहिल अटे मोहोबे आय ॥
पहिले मिलिकै परिमालिकको मल्हना भवन पहुँचे जाय २
दीख्यो मल्हना जब माहिलको उठिकै बड़ा कीन सत्कार ॥
पूँछन लागी फिरि भैयासों राजा उरई के सरदार ३
आल्हा ऊदन मलखे सुलखे बोरेसे स्यये चारिहू भाय ॥
आठ महीना का कहिकै गे आयो एक साल नगच्याय ४
खबरि जो पाई कहुँ भाई हो हमको बेगि देउ बतलाय ॥
सुनिकै बातें ये मल्हना की माहिल बोले बचन बनाय ५
मरे बनाफरगे माड़ो में खुपरी टँगी बरगदे डार ॥
सुनिकै बातें ये माहिल की मल्हना रोई छाँड़ि डिंडकार ६
स्वने कै लंका म्वारि जरिबरिगै अबधों कौन लगाई पार ॥
माहिल बोला फिरि बहिनीसों कीन्हे चुगुलिन का ब्यौपार ७
अब बुलवावो तुम पंडित को सूतक साइति करै बिचार ॥