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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

५४ आल्हखण्ड । १०२
सुनिकै बातैं ये सय्यद की बोला उदयसिंह सरदार ॥ ।
आठमहीना कहि आये त्यन त्यहिते ह्वैगै बहुत अवार १२६
यहु शिर पठवो तुम मोहबे को दादा मानो कही हमार ॥
हार लयआयो यहु मल्हना को जामें मिलै जाय इउ हार १२७
सुनिकै बातैं ये ऊदन की रूपन बारी लीन बुलाय ॥
करिया ठाकुर को शिर लै कै आल्हा मोहवे दीन पठाय १२८
पूरि तरंग यहाँ सों ह्वैगै शारद तुही लगावै पार ॥
डगमग नैया भवसागर में माता तुही निवाहनहार १२६
पार को पावै यहु आल्हाकहि थाल्हा जौन शूरमनक्यार ॥
शारदमाता ज्यहि जिह्वा में ताको खेय लगावै पार १३०
बन्दनकरिकै तिन शारद को ह्याँते करौं तरंग को अन्त ॥
सुनै सुनावै हरिगुण गावै ललिते स्वई जगतमें सन्त १३१
इति श्रीलखनऊनवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरआत्मजबाबू प्रयागनारा-
यणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध
कृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतकरियाबधोनामचतुर्थस्तरंगः ॥ ४ ॥
सवैया ॥
कूप तड़ाग औ मंदिर सुन्दर वृक्ष चिलौलहुके बहु राजैं।
मंदिर में शिव मूरति थापित देखतही दुख दारिद भाजैं ॥
जानतहौं नहिं कौनैहिंथाप्यो भूरिदिनोंसे तहां सो बिराजैं।
ग्रामक नाम बड़ी पड़री तहँ मंदिर में सगरेश्वर गाजैं १
सुमिरन ॥
वेनु बाँसुरी अब बाजै ना नाकहुँ फिरैं गलिनमें श्याम ॥
रहिगै ठकुरी ना दशरथ की ना रहिगयो धनुर्धर राम १