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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 292 में से

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पृष्ठ 89

७५ अकबर बीरबल विनोद

कर उससे कहने लगा- "भाई आधा धन मुझे दो और
बाकी आधा आप ले लो, इसमें मेरी राजी है।" लुहार
डाटकर बोला-"क्या पहले मेरे तेरे बीच ऐसी शर्ते पकी नहीं
हुई थीं कि मैं तुझे अपनी मनमानी दूँगा ! अब चों चप्पड़
क्यों करता है?"
दोनों में वाता विवाद होते होते सम्पूर्ण रात्रि व्यतीत
होगई और सूर्योदय का समय आया । सूमड़ा आधा
रत्नोंको पानेकेलिये बहुतेरा प्रयास किया परन्तु लुहार उसकी
एक भी सुनने को तय्यार नहीं था सूमड़े ने लाचार होकर
बादशाह के पास अर्जी गुजारी । मामला पेचीला देखकर
वादशाहने बीरबलको बुलाया और उनका सारा हाल सुनाकर
उसे न्याय करने की आज्ञा दी । बादशाह की आज्ञा
सिरोधार्य कर बीरबल ने उन दोनों से अलग अलग बयान
लिया, और उन बयानों को पृथक पृथक दो कागजों पर
लिखकर उस पर उनके हस्ताक्षर कराये । फिर उन दोनों से
बारी बारी शाक्षी लेकर प्रमाणित कराया कि उनका कहना
बिल्कुल सत्य और उन्हें मान्य है। तब बीरबल ने पहले पहल
लुहार से पूछा-"तुमको इसमें से क्या क्या लेना मंजूर है?"
लोहार बोला-"मेरी इच्छा जवाहरात लेने की है।" बीरबल
ने तुरत निर्णय कर दिया-"तू जवाहरात इस कंजूस को दे
दे और स्वयं खाली पिटारी ले ले।" यह निर्णय सुनकर
लोहार ने शर्तनामें की तरफ इशारा किया । बीरबल बोला-
: "तूँ पहले ही अपनी शर्तों में लिख चुका है-"मैं अपनी मन मानी
दूँगा।" तो तेरे मन में जवाहरात लेने का है अतएव तेरी