अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल विनोद ७०
बीरबल ने उस आदमी से पूछा—"क्यों साहब ! यह
सब सामान कहाँ लिये जा रहे हो, जो आपका पैर खुशि-
हाली के कारण जमीन पर नहीं पड़ता, आपके मर्म को
जानने की मुझे बड़ी इच्छा है अतएव थोड़ा कष्ट कर बत-
लाते जाइये ।" उस आदमी ने पहले तो इस ख्याल से कुछ
हीला हवाली किया कि कहीं उचित समय पर पहुँचने में
देर न हो जाय । परन्तु जब बीरबल ने उसे छेड़कर कई बार
पूछा तो वह मटक कर बोला—"यद्यपि मुझे विलम्ब हो रहा है
परन्तु आपके इतना आग्रह करने पर बतला देना भी जरूरी
है । "मेरी औरत ने एक दूसरा खसम कर लिया है उससे
उसे लड़का पैदा हुआ है, आज बरही है । मैं उसीका
बधावा लिये हुए न्योते में जा रहा हूँ । बीरबल ने उसे अपना
नाम बतला कर रोक लिया और बोला "तुझे मेरे साथ
बादशाह के पास चलना पड़ेगा, जब मैं छुट्टी दूँगा तब जाना ।
वह बीरबल का नाम सुनकर डर गया और लाचार होकर
उसके साथ हो लिया । वह उसको साथ में लेकर आगे बढ़ा,
दैवयोग से रास्ते में एक घोड़ी सवार मिला । वह आप तो
घोड़ी पर सवार था परन्तु अपने सिर पर घास का बण्डल
ढो रहा था । बीरबल ने उससे पूछा—"क्यों भाई ! यह क्या
मामला है, आप अपने सिर का बोझ घोड़ी पर लादकर
क्यों नहीं ले जाते ?" उसने कहा—"गरीबपरवर ! इसका
कारण यह है कि मेरी घोड़ी गर्भिणी है ऐसी दशा में उसपर
इतना बोझ नहीं लादा जा सकता, मुझे ले जा रही है यही
क्या कम गनीमत है ।