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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 292 में से

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पृष्ठ 80

का न्यायाधीश बनाया गया। वह बादशाह की आज्ञा
स्वीकार करते हुए बोला-"पृथ्वीनाथ ! मैं यथाशीघ्र इसका
न्याय करने का प्रयत्न करूँगा।"
वह मारवाड़ी को एक ठौर बैठाकर दीनदयाल को बुलाने
के लिये एक कर्मचारी को भेजा। जब आया तो उसे मारवाड़ी
के सामने खड़ा कराकर बीरबल ने पूछा-"क्या तुम्हें अपना
रुपया लेना मंजूर नहीं है? मारवाड़ी रुपया लेना नहीं चाहता
था इससे साफ इनकार कर दिया। तब बीरबलने कहा-"मुझे
काजी का फैसला शर्तनामे के बमूजिब स्वीकार है अतः
मारवाड़ी को हुक्म देता हूँ कि सौदागर के शरीर से
एक सेर माँस का टुकड़ा अपने हाथ से निकाल ले; परन्तु
ध्यान रहे; अगर टुकड़ा जरा भी छोटा बड़ा हुआ कि वह
सकुदुंब जान से मारा जावेगा। घर बार तथा उसका सारा
कोष उसी अपराध के कारण जब्त कर लिया जायगा।"
इस विज्ञप्ति से मारवाड़ी दहल गया और उससे कुछ
उत्तर देते न बना। बीरबल उसे चुप देखकर जवाब के
लिये बारबार उत्तेजित करने लगा। तब वह बोला-
"दीवान जी ! मुझे माँस लेने की खाहिश नहीं है, मैं केवल
पाँच लाख रुपये लेकर अपने मामले को उठा लेना चाहता हूँ,
सूद भी छोड़े देता हूँ।" बीरबल ने कहा-"यह हरगिज नहीं
हो सकता, तुम्हें मांस का टुकड़ाही लेना पड़ेगा, क्योंकि पहले
तूँ साहूकार से रुपये लेना नामंजूर कर चुका है।" यदि तूँ
शर्तनामें के अनुसार माँस न लेगा तो राजाज्ञा भंग करने के
अपराध में तुझे सात लाख रुपये जरबाने लगेंगे। इस बार