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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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पृष्ठ 63

[Header] ४६ अकवर बीरबल विनोद
सुशर्मा ने तन्मय होकर कई वर्षों तक उस पर्णकुटीर में
तप किया परन्तु फिर भी देवताओं की प्रसन्नता न हुई
तब ऐसी तपश्चर्य्या से उसका मन ऊब गया और उस
प्रणाली को बदल कर संन्यास धारण किया। काशाय वस्त्र
पहन कर पुनः तप करने में दत्तचित्त हुआ। सुदामा नाई भी
छत्रछाया की तरह उसकी सेवा करता हुआ अपना धर्म
पालन करने लगा; उसका अनुमान था कि सन्यासी की
सेवा से मनोभीष्ट फल की प्राप्ति कर लूँगा। दोनों की
प्रगाढ़ मैत्री थी। इन्हें आपस के सहयोग से कठिन से
कठिन कार्य साधन में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता
था। जब इस ढंग से तप करते हुए भी बारह वर्ष बीत गये
कुछ भी हासिल न हुआ, यानी देवता प्रसन्न नहीं हुए,
तब इन दोनों को बड़ा दुख हुआ और एक दूसरे का मुख
देखते हुए इस बात के अनुसन्धान में लगे कि अब कौन सा
यत्न किया जाय कि, जिससे अभीष्ट फल की प्राप्ति हो। अपने
मित्र सुदामा नाई को चुप देखकर संन्यासी बाला-"मित्र
सुदामा ! तुम भलीभाँति देख रहे हो कि हमें तप साधन
करते चौबीस वर्ष का समय बीत गया लेकिन कार्य
की सिद्धि न हुई, तब आखिर ऐसा कौन सा उपाय किया
जाय कि जगत में हमारी अपकीर्ति न हो। मेरे मनमें तो
यह आता है कि आत्महत्या के अतिरिक्त निवृत्ति का दूसरा
मार्ग नहीं है, लेकिन इससे भी मुक्ति नहीं मिलती
इसमें भी एक बात बड़े अड़चन की है। शास्त्रकारों ने आत्म-
हत्या को बड़ा पाप बतलाया है। तब भाई तुम्हीं कोई ऐसी
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