अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनिवासी देख नहीं सकते इसीसे तुम मुझे नग्न देख रहे हो।”
नगर निवासी निरे भाँदू नहीं थे; उनमें भी एक से एक
धुरंधर विद्वान थे । आपस में बोले-“हो न हो! यह सब बीर-
बल के ही बहकावे में आ गये हों । तुम लोग जानते हो कि
बीरबलको मरे आज कई वर्षों का समय बीत गया, फिर बीर-
बल कहाँ से आ पहुँचा । यह बात सबको स्मरण होगा
कि एक समय बादशाह ने बीरबल से एक अजीब तमाशा
दिखलाने को कहा था । जिस कारण इतने दिनों तक गुप्त रह
कर आज बादशाह को अजीब तमाशा दिखलाता हुआ आ
रहा है।” सब नागरिकों ने इस बात को स्वीकार किया
और सब बीरबल की बुद्धिमानी पर और जोर जोर
से हँसने लगे । नागरिकों के ऐसे हास्य और भाषण को
सुनकर नग्न अमीरों के कान खड़े हो गये; परन्तु फिर भी वे
बीरबलकी सारी बातें सच्ची मानकर नगर वासियों की उपेक्षा
करते हुये महल की तरफ चले । बीरबल अपने दल के
सहित सारे नगर में घूमता फिरता शाही दर्बार में जा
पहुँचा । सब लोग जगह बा जगह खड़े हो गये, परन्तु बीर-
बल बादशाह को सबसे अलग ले गया और तब एकान्त
में अपना दोनों हाथ जोड़कर बोला-“पृथ्वीनाथ ! यदि
मेरे अपराधों की माफी मिले तो मैं कुछ निवेदन करूँ ।”
बादशाह ने कहा-“अच्छा कहो, तुम्हें माफी दी जायगी ।”
तब बीरबल बोला-“हुजूर को स्मर्ण होगा कि एक समय वर्ष
के भीतर मुझे एक अजीब तमाशा दिखलाने को श्रीमान् ने
हुक्म दिया था और यह भी बचन दिया था कि उस अजीब