अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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दो लाख रुपये खर्च पड़ेगे। बीरबल को तत्काल दो लाख
रुपये दिये गये। वह उन रुपयों को लेकर घर गया। दूसरे
दिन स्नान ध्यान से निवृत्त होकर एक लाख तो ब्राह्मणों
को दान किया बाकी एक लाख रुपये अपने काममें खर्च
किया। जब रुपया लिये बहुत दिन हो गये तो एक
दिन बीरबल के जी में आया कि जो बादशाह को किसी
दिन कौतुक की बात याद आयेगी तो वह तत्काल तकाजा
कर बैठेगा इसलिये इसको गुप चुप इसी समय कर
दिखाना चाहिये।
वह बीमारी का बहाना कर दरबार जाना बन्द कर दिया;
धीरे धीरे बीरबलके बीमारी की बात बादशाह के कानों तक
पहुँची। वह घबड़ाकर इलाज के लिये बड़े बड़े हकीम और
वैद्यों को उसके पास भेजा, पर उसकी बीमारी घटने के
बजाय दिनोंदिन बढ़ती ही गई। यह समाचार सुन बादशाह
एक दिन स्वयं बीरबल से मिलने गया। बादशाह को देखकर
बीरबल रोने लगा और बोला—"पृथ्वीनाथ ! अब मेरी
जिन्दगी का अन्तिम दिन है, इस बीमारी से मैं बच नहीं
सकता। बीरबल के असाधारण बीमारी से बादशाह को
बड़ा खेद हुआ और वह बीरबल को तसल्ली देता हुआ
बोला-“बीरबल ! तुम जानते ही हो कि मैं तुम्हें कितना प्यार
करता हूँ; तुम्हारे बिना मेरा एक क्षण भी सुखपूर्वक नहीं
बीत सकता। खुदा करे ऐसा न हो; नहीं तो तुम्हारी मौत से
बढ़कर मेरी मौत होगी।"
बीरबलने उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! विधि के विधान में