अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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पश्चात् बादशाह बोले-“हाँ यह आप लोगों का कहना सत्य
है कि तानसेन बहुत बड़ा विद्वान् है, परन्तु फिर भी वह
बीरबल की समता नहीं कर सकता, यदि तुम लोगों को
विश्वास नहीं है तो वह दिन नजदीक है जब कि मैं सारी
बातें प्रत्यक्ष, करके तुम्हें दिखला दूँगा।
कुछ दिनों तक बादशाह ने इस बात की चर्चा नहीं की
जब उन्हें भलीभाँति विदित हो गया कि अब सरदारों को बात
भूल गई तो एक दिन ब्रह्मदेश के बादशाह के नाम एक पत्र
लिखकर तानसेन और बीरबल को एक साथ भेजने का
निश्चय किया। पत्रके भीतर लिखा हुआ था कि इस पत्र को ले
जाने वाले इन दोनों आदमियों को तुरत शूली दिला देना।
पश्चात् बादशाह ने बीरबल और तानसेन को बुलाया और कुछ
आवश्यक कार्य्यका बहाना कर दोनों को पत्र देकर ब्रह्मदेश के
राजा के पास भेज दिया। इनको भेजते समय बादशाह बोले-
“देखो तानसेन, यह बड़ा गूढ़ काम है, यदि दूसरे को भेजूं
तो यह हल नहीं हो सकता। इसलिये बहुत समझ बूझकर
तुमदोनों को भेज रहा हूँ अविलम्ब ब्रह्मदेश के महाराज
के पास जाओ और जैसे हो सके इसको निपटा कर शीघ्र
वापस लौट आओ।” उन्होंने “बहुत अच्छा” कहकर पत्र
को ले लिया और घरपर पहुँच रास्ते के लिये खाने पीने का
प्रबन्ध कर ब्रह्मदेश के लिये प्रस्थान किया।
बीरबल रास्ते में मनो मन अनुमान करता जा रहा
था-“हो न हो इस काम के अन्दर कोई गूढ़ भेद छिपा हो,
खैर देखा जायगा, अब तो थोड़े दिन पश्चात् वह सामने ही