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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 292 में से

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पृष्ठ 189

अकबरबीरबल विनोद १७५
जरा नरमा कर फिर बोला- "मैंने तेरी माँ कब माँगी है, क्या
मैंने किसी का नाम लिया था ?"
बीरबल ने कहा- "गरीबपरवर ! मैंने आपके बहन का
नाम कब लिया था और कब उसे माँगा था । मैंने तो आपसे
केवल दुपट्टा बहने देने की अर्ज करी थी । आपकी बहन मेरे
बहन के समान है। मैं उसका नाम अपनी जबान पर कैसे ला
सकता हूँ।" बादशाह को आगे बढ़ने का कोई मार्ग नहीं
मिला अतएव खामोश रह गया ।

भाग्य बड़ी है कि उद्योग
एक दिन बादशाह ने अपने दरबारियों से भरी सभा में
पूछा- "भाग्य बड़ी है कि उद्योग।" सब दरबारियों ने एक
मत होकर बतलाया- "पृथिवीनाथ ! उद्योग बड़ा है ?"
परन्तु बीरबल की राय सबसे भिन्न थी। वह अपनी तरफ से
अकेला होकर बोला- "महाराज ! मेरी सम्मति से भाग्य बड़ी
है।" बादशाह ने बीरबल से पूछा- "यदि उद्योग न किया
जाय तो भाग्य क्या कर सकती है, भला उस मनुष्य को जो
भाग्य के भरोसे बैठ रहे, कभी खाना नसीब हो सकता है ?"
बीरबल ने उत्तर दिया- "चाहे कोई कितना ही उद्योग क्यों
न करे, परन्तु जो बात उसके भाग्य में लिखी न होगी, कदापि
नहीं मिल सकती। यह सब देखते हुए भाग्य को ही प्रधानता
मिलनी चाहिये ।"
एक दरबारी को बीरबल की यह दलील बहुत खटकी