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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

अकबर बीरबल विनोद १६६
कर दिया जायगा तो मैं बिना उज्र चली जाऊँगी ।”
बीरबल उसे डाँटकर बोला-“ऐ वेश्या ! तुझे ज्ञात होना
चाहिये था कि यह दिल्लीधीश्वर का दरबार है और ये जगत
विजयी बादशाह हैं; यहाँ पर आकर यह क्या गंदी बात मुँह
से निकालती है, यदि तुझे माँगना ही था तो कोई अलभ्य
वस्तु माँगती जिससे तू अजाचक हो जाती और तेरी कीर्ति
देशदेशान्तर में फैलती।” वह बोली-“दीवान महोदय !
मैंने जिस चीज को आप से माँगा है यदि उसे देना
मंजूर हो तब तो देवें नहीं तो इन्कार करें, मैं अपने घर लौट
जाऊँगी । आगा पीछा करने से क्या लाभ ? हाँ तो हाँ,
नहीं तो नहीं ।”
बीरबल ने बादशाह से कहा-“पृथ्वीनाथ ! मैंने इस
विदेशी वेश्याको आगा पीछा दिखलाकर बहुत कुछ समझाया,
परन्तु वह एक भी मानने को राजी नहीं है, बचन का पालन
करना आवश्यक है, नहीं तो संसार में आपकी बड़ी अपकीर्ति
फैलेगी। बादशाह ने बीरबल के मत को स्वीकार किया। तब
कौल बीरबल ने वेश्या से कहा-“बादशाह की आज्ञा है, तू
अपना मनोभिलषित पूर्ण कर ले। यानी गद्दी पर पाखाना कर
ले। हाँ एक बात याद रखना कि पाखाना के समय पेशाब
न निकले। जो तू इस बात में जरा भी चूकेगी तो तुरत
जान से मार डाली जायगी।” अब तो उस भठियारिन के
कान खड़े हो गये; कुछ देर तक आगा पीछा करती रही, फिर
बादशाह को सलाम कर चुपके से चली गई ।
उसका काम समाप्त हो गया इसलिये वह अब दिल्ली