अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल बिनोद १६१
यही सोचते थे कि जैसी माता है उसकी पुत्री भी उसीके
समान होगी ।
उन दिनों भगवान की कृपा से बीरबल की बड़ी ख्याति हो
रही थी। जिसकारण कितने ही लोग क्या जात क्या परजात
भीतर भीतर उससे ईर्षा करने लगे । सबों ने मिलकर सोचा
कि यदि इस लड़की से बीरबल का विवाह हो जावे तो
इसकी कीर्ति की जगह अपकीर्ति फैलने लगे।” एक दिन बीर-
बल को बिरादरी का एक ब्राह्मण जो कि पुरोहिती करता था
उससे मिलने आया । थोड़ी देरतक इधर उधर की बातें कर
वह बीरबल से उस लड़की के साथ विवाह करने का आग्रह
किया। बीरबल ने कहा-“पंडितवर ! आप जानते ही हैं कि
मेरा विवाह हो चुका है, फिर एक स्त्री के रहते हुए दूसरी के
साथ विवाह करना अनुचित होगा; हाँ यदि आपकी ऐसी ही
इच्छा है तो आप मेरे भाई को पसंद करें । वह काशी जी पढ़ने
गया है, मैं उसका विवाह करने के लिये तय्यार हूँ ।”
पुरोहित की मंशा वर आई, बीरबल नहीं तो उसका भाई
ही सही । घरमें अशान्ति होने से बीरबल को भी कष्ट होगा ।
ऐसी पक्की धारणा बनाकर वह राम बाई के घर पहुँचा,
वहाँ की अजीब हालत थी । रामबाई पतिदेव के मस्तक
पर नौ जूता चढ़ा चुकी थी । दसवें के लिये भी तैयार थी, इसी
बीच पुरोहित जी उसके मकान में दाखिल हुये और
हैं ! हैं ! हैं करके उसे रोकना चाहा, परन्तु वह कुलटा भला
कब मानने वाली थी । अपना दसवाँ जूता भी विचारे पति
को जड़कर ही शान्त हुई ।
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