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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 292 में से

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पृष्ठ 146

अकबर बीरबल विनोद १३२
भगवान घुँघची की माला क्यां पसंद करते हैं, ? उन्हें एक
से एक अमूल्य रत्नों की मालाएँ क्यों नहीं पसन्द आतीं ?”
बीरबल ने उत्तर दिया—“पृथिवीनाथ ! हमारे शास्त्र में
ऐसा लिखा है कि जो एक बार भी सोने से तौला जाता
है वह पवित्र हो जाता है; फिर यह घुँघची तो बारंबार सोने
से तौली जाती है। यही खास कारण है कि घुँघची के माले
की इतनी प्रतिष्ठा की जाती है। इसी विचार से भगवान कृष्ण
भी बहुमूल्य हीरे मोतियों की मालाओं को न पहनकर
इसे अपने गले का हार बनाते हैं। इस उत्तर से बादशाह का
चेहरा खिल गया और हँस पड़े।
बीरबल के कुटुम्ब की परीक्षा ।
एक दिन बादशाह के मन में बीरबल के कुटुम्ब की परीक्षा
लेने का उमंग उठा। वे अपना भेष बदलकर कई अन्य
सभासदों के साथ बीरबल के घर पहुँचे। इस समय बीरबल
के घर पर कोई बड़ा बूढ़ा आदमी नहीं था, वे लोग निजी
काम से घर से बाहर चले गये थे। केवल बीरबल का एक
छोटा लड़का और एक लड़की आपस में द्वार पर खेल कूद
मचा रहे थे। लड़के ने बादशाह को देखकर कहा—“वह
आये।” तब लड़की ने लड़के के प्रश्न का उत्तर दिया—“वह
नहीं हैं।” बीरबल की स्त्री दालान में बैठी हुई कुछ दस्तकारी
कर रही थी, वह भी इनकी बातें बराबर सुनती जा रही
थी। वह बोली—“बच्चों ! यह भी होता है और वह
भी होता है।”