ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 44, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय खण्ड
देवताओंकी अन्न एवं आयतनयाचना
ता एता देवता सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतंस्त-
मशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमब्रुवन्नायतनं नः
प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥
वे ये [इस प्रकार] रचे हुए [इन्द्रियाभिमानी] देवगण इस
महासमुद्रमें पतित हो गये। उस (पिण्ड) को [परमात्माने] क्षुधा-
पिपासासे संयुक्त कर दिया। तब उन इन्द्रियाभिमानी देवताओंने उससे
कहा—'हमारे लिये कोई आश्रयस्थान बतलाइये, जिसमें स्थित होकर
हम अन्न भक्षण कर सकें' ॥ १ ॥
ता एता अग्न्यादयो देवता | ईश्वरद्वारा लोकपालरूपसे संकल्प
लोकपालत्वेन संकल्प्य सृष्टा | करके रचे हुए वे ये अग्नि आदि
देवगण इस अति महान् संसारार्णव
ईश्वरेणास्मिन्संसारार्णवे संसार- | —संसारसमुद्रमें [गिरे], जो (संसार-
समुद्र) अविद्या, कामना और कर्मसे
समुद्रे महत्यविद्याकामकर्मप्रभव- | उत्पन्न हुए दुःखरूप जल तथा तीव्र
दुःखोदके तीव्ररोगजरामृत्यु- | रोग, जरा और मृत्युरूप महाग्राहोंसे
पूर्ण है, अनादि अनन्त अपार एवं
महाग्राहेऽनादावनन्तेऽपारे निरा- | निरालम्ब है, विषय और इन्द्रियोंके
संयोगसे होनेवाला अणुमात्र सुख ही
लम्बे विषयेन्द्रियजनितसुखलवक्ष- | जिसकी क्षणिक विश्रान्तिका स्वरूप
णविश्रामे पञ्चेन्द्रियार्थतृणमारुत- | है, जिसमें पाँचों इन्द्रियोंकी विषय-