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सर्वकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 108 में से

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पृष्ठ 101

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१
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कानि तानि ? उच्यन्ते— | वे कौन-कौन हैं, सो बतलाते
अण्डजानि पक्ष्यादीनि, जारु- | हैं। अण्डज-पक्षी आदि, जारुज-
जानि जरायुजानि मनुष्या- | जरायुज-मनुष्यादि, स्वेदज-जूँ
दीनि, स्वेदजादीनि यूका- | आदि, उद्भिज-वृक्षादि, तथा अश्व,
दीनि, उद्भिजानि च वृक्षा- | गौ, पुरुष, हाथी एवं अन्य भी ये
दीनि, अश्वा गावः पुरुषा | जो कुछ प्राणी हैं-वे कौन-कौनसे ?
हस्तिनोऽन्यच्च यत्किंचेदं प्राणि- | जङ्गम जो पैरोंसे चलते हैं, पक्षी-
जातम् ; किं तत् ? जङ्गमं यच्च- | जो आकाशमें उड़नेवाले हैं और
लति पद्भ्यां गच्छति। यच्च | स्थावर-जो अचल हैं, वे सब यही
पतत्रि आकाशेन पतनशीलम् । | हैं, अर्थात् वे सब-के-सब प्रज्ञा-
यच्च स्थावरमचलम् । सर्वं तदेप | नेत्र हैं। प्रज्ञा प्रज्ञप्तिको कहते
एव । सर्वं तदशेषतः प्रज्ञानेत्रम् । | हैं और वह ब्रह्म ही है तथा जिससे
प्रज्ञप्तिः प्रज्ञा तच्च ब्रह्मैव । नीय- | नयन किया जाय [अर्थात् ले जाया
तेऽनेनेति नेत्रम् । प्रज्ञा नेत्रं यस्य | जाय ] उसे 'नेत्र' कहते हैं। इस
तदिदं प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने ब्रह्म- | प्रकार प्रज्ञा ही जिसका नेत्र है वह
ण्युत्पत्तिस्थितिलयकालेषु प्रतिष्ठितं | प्रज्ञानेत्र कहलाता है। तथा उत्पत्ति,
प्रज्ञाश्रयमित्यर्थः । प्रज्ञानेत्रो | स्थिति और प्रलयके समय प्रज्ञान
लोकः पूर्ववत् । प्रज्ञाचक्षुर्वा सर्व | यानी ब्रह्ममें स्थित रहनेवाले अर्थात्
एव लोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा सर्वस्य | प्रज्ञाके आश्रित हैं। इस प्रकार
जगतः । तस्मात्प्रज्ञानं ब्रह्म । | पूर्ववत् यह लोक प्रज्ञानेत्र है अर्थात्
| सभी लोक प्रज्ञारूप नेत्रवाला है,
तदेतत्प्रत्यस्तमितसर्वोपाधि- | सम्पूर्ण जगत्का आश्रय प्रज्ञा ही है;
| अतः प्रज्ञान ही ब्रह्म है ।
विशेषं सन्निरञ्जनं निर्मलं निष्क्रियं | जो सम्पूर्ण औपाधिक विशेषता-
| से रहित, नित्य, निरञ्जन, निर्मल,
शान्तमेकमद्वयं “नेति नेति” | निष्क्रिय, शान्त, एक और
| अद्वितीय है, जो "नेति नेति"
इति (बृ० उ० ३ । ९ । २६) | इत्यादि [ श्रुतियोंद्वारा ] क्रमसे