ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ [ प्रथम पञ्चिका
मन्त्र के तेतीस अक्षरों में होता देवों को यज्ञ के अग्र भाग में ही
यज्ञ में शरीक कर लेता है। क्योंकि एक एक अक्षर एक एक देव
के लिये पात्र है ( dish ) है जिससे वे प्रसन्न और तृप्त हो
जाते हैं। (४)
११—कुछ लोग कहते हैं कि प्रायणीय इष्टि में प्रयाज पढ़ने
चाहिये और अनुयाज नहीं पढ़ने चाहिये। क्योंकि प्रायणीय
इष्टि के अनुयाज हीन हैं अर्थात् उनमें देर लगती है। परन्तु यह
पक्ष आदर के योग्य नहीं है। प्रयाज और अनुयाज दोनों ही
होने चाहिये। प्रयाज प्राण हैं और अनुयाज प्रजा हैं। यदि
प्रयाजों को छोड़ देगा तो यजमान के प्राणों को छोड़ देगा।
और यदि अनुयाजों को छोड़ देगा, तो यजमान की सन्तान को
छोड़ देगा। इसलिये (प्रायणीय इष्टि में) प्रयाज और अनुयाज
दोनों ही होने चाहिये।
पत्नियों* के संयाज्यों को न बोले। न संस्थित यजुओं को।
इतना यज्ञ पूरा हो गया। यज्ञ की संतति (जारी रखने) के लिये
प्रायणीय इष्टि का शेष भाग उदयनी इष्टि के भाग में मिलाने
के लिये रख लेना चाहिये। (जिससे दोनों इष्टियां मिल कर एक
हो जायं)। यज्ञ बीच में न टूटे इसके लिये एक और उपाय है
अर्थात् जिस थाली में प्रायणीय इष्टि का पुरोडाश तैयार किया,
उसी थाली में उदयनीय-इष्टि का पुरोडाश तैयार करे। इस प्रकार,
यज्ञ बीच में टूटता नहीं। उसका सिलसिला कायम रहता है।
कुछ लोगों का कहना है कि इससे लोग परलोक में सफल हो
जाते हैं, इस लोक में नहीं। जब यह 'प्रायणीयम्', 'प्रायणीयम्'
- राका सिनीवाली (पूर्णिमा के) और कुहू और अनुमति
(अमावस्या के) देवपत्नियों के लिये जो मंत्र पढ़े जाते हैं, वह पत्नी-
संयाज्य कहलाते हैं।