ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] ३५
वाक्य और याज्य पढ़ता है वह मानो सब छन्दों द्वारा यज्ञ कर
लेता है । (३)
१०—( प्रायणीय इष्टि के ) इन सब अनुवाक्य और
याज्य मन्त्रों में 'प्र', 'नी', 'पथि', 'स्वस्ति' शब्द आते हैं। देवों
ने इन्हीं से यज्ञ करके स्वर्ग लोक की प्राप्ति की । इसी प्रकार
यजमान भी इन्हीं मन्त्रों से यज्ञ करके स्वर्ग लोक को जाता है ।
इनमें एक पद है "स्वस्ति राये मरुतो दधातन" (ऋ० १०।६३।१५)
अर्थात् "हे मरुतो, हमको कल्याण युक्त धन दो ।" मरुत देवों के
वैश्य हैं और अन्तरिक्ष में रहते हैं। जो स्वर्ग को जाता है वह
उनसे निवेदन करने जाता है, वह उसको रोक या मार भी सकते
हैं। होता जो कहता है "स्वस्ति राये मरुतो दधातन" ( ऋ०
१०।६३।१५ ), वह ऐसा कह कर मानों यजमान का देवों के वैश्य
मरुतों के साथ परिचय कराता है । तब मरुत न तो उसको जो
स्वर्ग को जाता है, रोकते हैं और न मारते हैं। जो इस रहस्य को
जानता है वह उनके द्वारा स्वर्ग लोक तक अच्छा मार्ग पा लेता
है । इस ( प्रायणीय इष्टि ) की स्विष्टकृत् आहुति के लिये जो
दो संयाज्य मन्त्र हैं, वह विराट् छन्द में होने चाहिये । जिसमें
तेतीस अक्षर होते हैं । यह दो मन्त्र यह हैं :—
(१) सेदग्निरग्नींरत्यस्त्वन्यान्यत्र वाजी तनयो वंळुगशिः ।
सहस्र पाथा अक्षरा समेति । (ऋ० ७।१।१४)
(२) सेदग्निर्यो वनुष्यतो निपाति समेद्धारमंहस उरुष्यात् ।
सुजातासः परि चरन्ति वीराः । (ऋ० ७।१।१५)
देवों ने इन दो संयाज्यों को विराट् छन्द में पढ़ कर स्वर्ग
की प्राप्ति की । इसी प्रकार जो यजमान इन दोनों संयाज्यों को
विराट् छन्द में पढ़ता है वह स्वर्ग लोक की प्राप्ति कर लेता है ।
इनमें तेतीस अक्षर होते हैं । तेतीस ही देवते हैं, आठ वसु,
ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, प्रजापति और वषट्कार । इस प्रकार