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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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४७६ [ आठवीं पञ्चिका
किया। भोग के लिये। इसलिये दक्षिण दिशा के राजा लोग
देवों की क्रियाओं का अनुकरण करके इन्हीं ऋचाओं आदि
के द्वारा भोग के लिए अभिषेक कराते हैं और 'भोज' कहलाते
हैं।
इन्हीं ऋचाओं, इसी यजु और इन्हीं व्याहृतियों का पाठ
करके ३१ दिनों में पश्चिम दिशा में आदित्यों ने इन्द्र का
स्वाराज्य के लिये अभिषेक किया। इन्हीं देवों का अनुकरण
करके पश्चिम में राजा लोग स्वाराज्य के लिये अभिषेक कराते
हैं और 'स्वराट्' कहलाते हैं।
इन्हीं तीन ऋचाओं, इसी एक यजु और तीन व्याहृतियों
का पाठ करके विश्वेदेवों ने ३१ दिन में वैराज्य के लिये इन्द्र
का उत्तर दिशा में अभिषेक किया। इसी लिये इन देवों के
कृत्यों का अनुकरण करके उत्तर दिशा में जो बर्फीले प्रदेश हैं
उत्तर कुरु आदि पहाड़ के उत्तर को, वहाँ के राजा लोग इन्हीं
ऋचाओं आदि के द्वारा वैराज्य के लिये अभिषेक कराते हैं
और 'विराट्' कहलाते हैं।
यह जो ध्रुवा बीच की प्रतिष्ठित दिशा है इसमें साध्य
और आप्तों ने ३१ दिन में इन्हीं तीन ऋचाओं एक यजु और
तीन व्याहृतियों द्वारा राज्य के लिये इन्द्र का अभिषेक किया।
और देवों के कृत्यों के अनुकरण रूप में बीच की प्रसिद्ध ध्रुवा
दिशा के जो राजा लोग हैं जैसे कुरु पांचाल सवश और उशीनर
ये राज्य के लिये अपना अभिषेक कराते हैं और 'राजा'
कहलाते हैं।
इन्हीं तीन ऋचाओं, यजु और तीन व्याहृतियों का पाठ
करके ३१ दिन में मरुतों और अङ्गिरसों ने 'ऊर्ध्व' दिशा में
इन्द्र का पारमेष्ठ्य, महाराज्य, आधिपत्य और स्वावश्य के लिए
अभिषेक किया। वह परमेष्ठी और प्रजापति हो गया।