ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४७४ [ आठवीं पञ्चिका
मित्र और वरुण ने दो ऊपर के तख्ते और अश्विनों ने दो
बगल के तख्ते ।
इन्द्र तब सिंहासन को इस प्रकार संबोधन करके उस
पर चढ़ा, "वसु तुझ पर गायत्री छन्द, त्रिवृत स्तोम, रथंतर
साम द्वारा चढ़े । उनके पीछे साम्राज्य के लिये मैं चढूँ । रुद्र
तुझ पर त्रिष्टुभ् छन्द से, पंचदश स्तोम से और बृहत् साम
से चढ़े । उनके पीछे मैं भोग के लिये चढूँ । आदित्य तुझ
पर जगती छन्द, १७ स्तोम और वैरूप साम से चढ़े । उनके
पीछे मैं स्वराज्य के लिये चढ़ूँ, विश्वेदेवा तुझ पर अनुष्टुभ् छन्द,
२१ स्तोम और वैराज साम से चढ़े । और उनके पीछे मैं तुझ
पर वैराज्य के लिये चढूँ । साध्य और आप्त्य तुझ पर पंक्ति
छन्द, त्रिणव (२७) स्तोम और शक्वर साम से चढ़े और उनके
पीछे मैं तुझ पर राज्य के लिये चढूँ । मरुत और अंगिरा तुझ
पर अतिच्छंदस् छन्द से और ३३ स्तोम और रैवत साम से
चढ़े और मैं उनके पीछे तुझ पर पारमेष्ठ्य के लिये. महाराज्य
के लिये, स्वावश्य के लिये और अधिक जीवन के लिये चढूँ" ।
इन शब्दों को कह कर सिंहासन पर बैठे ।
जब इन्द्र इस प्रकार सिंहासन पर बैठ गया तो विश्वेदेवों
ने उससे कहा, "जब तक इन्द्र की घोषणा न की जायगी वह
पराक्रम के कार्य्य न कर सकेगा। परन्तु यदि ऐसी घोषणा
की जायगी तो वह कर सकता है।" तब उन्होंने ऐसा करना
अंगीकार कर लिया और इन्द्र के सामने मुँह करके जोर से
(इन्द्र के पदों की) घोषणा करने लगे ।
देवों ने उसको साम्राज्य का सम्राट्, भोगों का भोक्ता,
स्वराज्य का स्वराट्, वैराज्य का विराट्, राजों का पिता,
परमेष्ठि, बना दिया । उन्होंने कहा, "आज क्षत्र पैदा हुआ,