ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 483, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ४६९
"सन्मृत्तिरसि दिशां मयि देवेभ्यः कल्पत । कल्पतां मे योगक्षेमो-
ऽभयं मेऽस्तु ।"
"तू दिशाओं को जीतने वाला है। मुझे देवों के योग्य
बनाओ । मेरे लिये योगक्षेम हो । अभय हो ।"
अब वह विपरीत दिशा की ओर चलता है। पराजय को
हटाने के लिये । ऐसा कहते हैं । ( ५ )
१०—देव और असुर इन लोकों में लड़ते थे । वे पूर्व की
दिशा में लड़े और असुर जीत गये । वे दक्षिण की दिशा में
लड़े । वहाँ भी असुर जीत गये । वे पश्चिम की दिशा में लड़े ।
वहाँ भी असुर जीत गये । वे उत्तर की दिशा में लड़े । वहाँ
भी असुर जीत गये । अब वे पूर्व और उत्तर के बीच की
(अवान्तर) दिशा में लड़े और जीत गये ।
राजा जब दो सेनाओं के बीच में खड़ा होकर लड़ाई को
चले तो पूर्व और उत्तर की दिशा में चले और अपने घर के
पुरोहित से कहे, "ऐसा कर कि मैं इस सेना को जीत जाऊँ ।"
वह कहे, "अच्छा" और रथ के ऊपर के भाग को छूकर
यह पढ़े :—
"वनस्पते वीड्वंगो हि भूयाः" ( ऋ० ६।४७।२६ )
फिर राजा से कहे, "इस (उत्तर-पूर्व) दिशा में मुड़, तेरा
रथ आदि भी इसी दिशा की ओर जावे । अर्थात् उत्तर-पूर्व
की ओर, फिर उत्तर-पश्चिम की ओर, दक्षिण-पूर्व की ओर,
और अन्त में शत्रु की ओर ।"
इस सूक्त को पढ़कर रथ को घुमावे :—
अभीवर्तेन हविषा......(ऋ० १०।१७४)