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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 592 में से

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पृष्ठ 457

चौथा अध्याय ] ४४३
बचावे । 'ब्रह्मणे स्वाहा' कहकर वह ब्रह्म को प्रसन्न करता है ।
यह प्रसन्न हुआ ब्रह्म क्षत्र से रक्षा करता है । अब पशु के बाँधने
का समिष्ट-यजु पढ़ने के पश्चात् पढ़ता है :—
“क्षत्रं प्रपद्ये॒ क्षत्रं मा ब्रह्मणो गोपायतु । क्षत्राय॒ स्वाहा॑” ।
ऐसा ही होता भी है । जो क्षत्र को प्राप्त होता है वह
राष्ट्र को प्राप्त होता है । क्षत्र ही राष्ट्र है । जो क्षत्र से प्रपन्न है
उसे ब्रह्म नहीं सताता । 'क्षत्राय स्वाहा' से क्षत्र को प्रसन्न करता
है । इस प्रकार प्रसन्न होकर वह ब्रह्म से रक्षा करता है ।
यह दोनों आहुतियाँ इष्टापूर्त्त की कमी से बचने के लिये
हैं । इन दोनों आहुतियों को देना चाहिये । (४)
२३—क्षत्र का देवता इन्द्र है और छन्द त्रिष्टुभ्, स्तोम वह
है जिसमें १५ ऋचायें हैं । राज्य के हिसाब से क्षत्र सोम है,
सम्बन्ध से राजा । जब मृग चर्म धारण करके दीक्षा का व्रत
लेता है और ब्राह्मण उसके चारों ओर रहते हैं तब वह ब्राह्म-
णता को प्राप्त हो जाता है ।
ऐसे दीक्षा पाने वाले से इन्द्र इन्द्रिय लेता है, त्रिष्टुभ् वीर्य,
पंद्रह स्तोम आयु, सोम राज्य, पितर यश और कीर्ति । क्योंकि
लोग कहते हैं, यह हम से अलग हो गया, यह ब्रह्म है, यह
ब्रह्म हो गया है । अब वह दीक्षा से पहले आहुतियों को देकर
आहवनीय के पास आकर कहता है :—
"मैं इन्द्र देवता को नहीं छोड़ता, न त्रिष्टुभ् छन्द को, न १५
स्तोमों को, न सोम राजा को, न पितरों के सम्बन्ध को । इन्द्र
मुझ से इन्द्रिय न ले, त्रिष्टुभ् वीर्य न ले, १५ स्तोम आयु न
लें, सोम राजू न ले, पितर यश और कीर्ति न लें । मैं इन्द्रिय,
वीर्य, आयु, राज्य, यश और कीर्ति से युक्त होकर अग्नि देवता