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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 592 में से

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पृष्ठ 399

चौथा अध्याय ] ३८५
वह अब प्रजापति के अनिरुक्त सूक्त को पढ़ता है (अर्थात्
इसमें प्रजापति का स्पष्ट नाम नहीं)। प्रजापति अनिरुक्त है।
प्रजापति की प्राप्ति के लिये। इसमें एक बार 'इन्द्र' आया है।
वह इसलिये कि यज्ञ का इन्द्र-पन न चला जाय। इसमें दस
ऋचायें हैं। विराट् में १० अक्षर होते हैं। विराट् अन्न हैं।
अन्न की प्राप्ति के लिये। दस ऋचाओं के विषय में यह भी है
कि प्राण दस हैं। इससे यजमान प्राणों को प्राप्त करता है और
प्राणों को आत्मा में धारण करता है।
अच्छावाक संपात सूक्तों के बाद इस सूक्त को इसलिये
पढ़ता है कि यजमानों के लिये स्वर्ग की प्राप्ति हो जाय जब
यजमान इसी लोक में प्रतिष्ठित हैं। (४)
२१—प्रतिदिन के आरम्भ के प्रगाथ "कद्वत्" मन्त्र हैं।
(जिन मंत्रों में प्रश्नवाचक 'कः' या उसका कोई रूप आता है
उनको "कद्वत्" मंत्र कहते हैं)। वह यह हैं :—
कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति। श्रद्धा इत्ते मघवन् पार्ये
दिवि वाजी वाजं सिषासति ॥
मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु । तव प्रणीती
ह्य॑श्व सूरिभिर्विश्वा तरेम दुरिता ॥ ( ऋ० ७।३२।१४-१५ )
कश्चव्यो अतसीनां तुरो गृणीत मर्त्यः। नही न्वस्य महिमानमिन्द्रियं
स्वर्गन्त आनशुः ॥
कदु स्तुवन्त ऋतयन्त देवत ऋषिः को विप्र ओहते। कदा हवं
मघवन्निन्द्र सुन्वतः कदु स्तुवत आ गमः ॥ ( ऋ० ८।३३।१३-१४ )
कदू न्वस्याकृतमिन्द्रस्यास्ति पौंस्यम्। केनो नु कं श्रोमतेन न
शुश्रुवे जनुषः परि वृत्रहा ॥
कदू महीरधृष्टा अस्य तविषीः कदु वृत्रघ्नो अस्तृतम्। इन्द्रो
विश्वान् वेकनाटाँ अहर्दृश उत क्रत्वा पर्णीँ रभि ॥
( ऋ० ८।६६।९-१० )
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