ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय ] ३५१
अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद, आदित्य से सामवेद । उसने
इन वेदों को तपा । इनसे तीन शुक्र उत्पन्न हुये । ऋग्वेद से
भूः , यजुर्वेद से भुवः, सामवेद से स्वः । उसने इन तीन शुक्रों
को तपा । उनसे तीन वर्ण उत्पन्न हुये अकार, उकार और
मंकार । उसने तीनों को जोड़ दिया । इससे ओ३म् हुआ ।
इसलिये ओम् ओम् कहता है । ओ३म् स्वर्गलोक है । और
ओ३म् वह है जो तपता है (अर्थात् सूर्य्य) । प्रजापति ने यज्ञ
ताना । यज्ञ को लिया और यज्ञ किया । उसने ऋग्वेद से होता
का काम किया । यजुः से अध्वर्यु का और साम से उद्गाता
का । इन तीन विद्याओं में जो शुक्र (वीर्य्य) था उससे ब्रह्मत्व
को उत्पन्न किया ।
उस प्रजापति ने यज्ञ देवों को दिया । उन देवों ने यज्ञ को
ताना, यज्ञ को लिया और यज्ञ को किया । ऋग्वेद से होता
का काम किया, यजुर्वेद से अध्वर्यु का और सामवेद से
उद्गाता का । इन तीन विद्याओं के शुक्र से ब्रह्मत्व को उत्पन्न
किया ।
देवों ने प्रजापति से पूछा कि अगर हमसे ऋग्वेद में कोई
चूक हो जाय या यजुर्वेद में या साम में, भूल से या आपत्
काल में तो क्या प्रायश्चित्त है । प्रजापति ने देवों से कहा,
“अगर ऋग्वेद में कोई भूल हो जाय तो ‘भूः’ से गार्हपत्य
अग्नि में आहुति दो । अगर यजुः में भूल हो जाय तो ‘भुवः’
से अग्नीध्रीय अग्नि में या अन्वाहार्यपचन अर्थात् दक्षिणाग्नि में
आहुति दो । अगर साम में भूल हो जाय तो ‘स्वः’ से आह्व-
नीय में । यदि बेजाने या आपत्ति के कारण भूल हो जाय तो
आहवनीय अग्नि में भूर्भुवः स्वः तीनों से । यह तीन व्याहृतियों
द्वारा यज्ञ की बिखरी हुई चीज़ों को ऐसे जोड़ते हैं जैसे एक
चीज को दूसरी से । एक टुकड़े को दूसरे से । एक कड़ी को