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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 328

३१४ [ पाँचवीं पञ्चिका
के लिये यह सब किया जाय तो यजमान चलने के योग्य हो
जाता है ।
अग्निमारुतशस्त्र का प्रतिपद् यह है :—
अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च वि वर्तेते रजसी वेद्याभिः । वैश्वानरो
जायमानो न राजाऽवातिरज् ज्योतिषाग्निस्तमांसि ॥ ( ऋ० ६।६।१ )
'अहः' 'अहः' यह पुनरावृत्ति और निवृत्ति है, यह छठे दिन
का रूप है ।
'मध्वो वो नाम मारुतं यजत्रा' यह मरुत सूक्त है । यह
बहुवचन है । बहुवचन 'अन्त' वाला है । यह छठे दिन का
रूप है ।
जातवेदस मंत्र वही है “जातवेदसे सुनवाम” ( १।९९।१ )
जातवेदस का निविद् सूक्त “स प्रत्नथा सहसा जायमानः”
( १।९६।१ ) है । यह समानोदर्क है, यह छठे दिन का रूप है ।
इस सूक्त के हर मंत्र में 'धारयन्' आता है । इस प्रकार
ऋत्विज् यज्ञ को दोनों सिरों पर बाँधता है जैसे रस्सी को
दोनों सिरों पर बाँधते हैं, ( आग्रन्थन और निर्ग्रन्थन ) सादी
गाँठ और लपेट की गाँठ । यह जैसे किसी चीज को दो खूटियाँ
गाड़ कर तान देते हैं, यह यज्ञ की निर्विघ्नता के लिये किया
जाता है । जो इस रहस्य को समझते हैं उनका यह् निर्विघ्न
समाप्त हो जाता है । ( १० )
ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ।