ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९२ [ पाँचवीं पञ्चिका
तद्व उक्थस्य बर्हणोन्द्रायोपस्तृणीबषि । विपो न यस्योतयो वि
यद्रोहन्ति सक्षितः ॥ ( ६।४४।४-६ )
अप त्यं वृजिनं रिपुं स्तेनमग्ने दुराध्यम्। दविष्ठमस्य सत्पते कृधी
सुगम् ॥
ग्रावाणः सोम नो हि कं सखित्वनाय वावशुः । जही न्यत्रिणं पणिं
वृको हि षः ॥
यूयं हि ष्ठा सुदानव इन्द्रज्येष्ठा अभिद्यवः । कर्ता नो अध्वना सुगं
गोपा अमा ॥ ( ऋ० ६।५१।१३-१५ )
अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अप्रशस्ता इव स्मसि
प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ।
त्वे विश्वा सरस्वति श्रितायूँ षि देव्याम् । शुनहोत्रेषु मत्स्व प्रजां देवि
दिदिड्ढि नः ॥
इमा ब्रह्म सरस्वति जुषस्व वाजिनीवति । या ते मन्म गृत्समदा
ऋतावरि प्रिया देवेषु जुह्वति ॥ ( ऋ० २।४१।१६-१८ )
इनमें 'आ', 'प्र' और 'शुक्र' आया है। यह चौथे दिन का
रूप है ।
तं त्वा यज्ञेभिरीमहे तं गीर्भिर्गीर्वणस्तम । इन्द्र यथा चिदाविथ
वाजेषु पुरुमाय्यम् ॥ ( ८।६८।१० )
यह मरुत्वतीय शस्त्र का प्रतिपद है । 'ईमहे' से तात्पर्य है
कि आज का कृत्य लम्बा हो जाय । यह चौथे दिन का रूप है ।
नीचे दिये हुये मंत्र जो पहले दिन पढ़े जाते हैं चौथे दिन
भी काम आते हैं :—
इदं वसो सुतमन्धः ( ऋ० ८।२'-१२ )
इन्द्र नेदीय ( ऋ० ८।५३।५-७ )
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः ( ऋ० १।४०।३ )
अग्निर्नैता ( ऋ० ३।२०।४ )
त्वं सोमक्रतुभिः ( ऋ० १।९१।२ )