सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296

२८२ [पाँचवीं पञ्चिका
अर्थात् कुरूप हो जाओ । कुरूप हो जाओ ।” जब असुर कुरूप
होने लगे, देव स्वर्ग को चले गये ।
इससे वैरूप साम उत्पन्न हुआ । इसीलिये इसको वैरूप
( कुरूप ) कहते हैं । जो पाप के कारण कुरूप हो गया हो, वह
इस रहस्य को समझकर पाप से छूट जाता है ।
असुरों ने देवों को फिर सताया । देवों ने घोड़ा बनकर
अपनी टापों से उनको मार दिया । इसीलिये घोड़ों का नाम हैं
अश्व, जो इस रहस्य को समझता हैं वह समृद्धि को पाता है
( अश्नुते ) ।
घोड़ों ने पिछली टांगों से मारा इस लिये घोड़े सब पशुओं
में तेज होते हैं । जो इस रहस्य को समझता है उसका पाप छूट
जाता है । इसीलिये तीसरे दिन के आज्यशस्त्र में 'अश्व' शब्द
आता है । यह तीसरे दिन का रूप है ।
प्र-उग शस्त्र में नीचे के तीन तीन मंत्र हैं :—
( १ ) वायवा याहि वीतये जुषाणो हव्यदातये । पिबा सुतस्यान्धसो
अभिप्रयः ॥
सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः । निम्नं न यन्ति
सिन्धवोऽभिप्रयः । (ऋ० ५।५१।५-७)
( २ ) वायो याहि शिवा दिवो वहस्वा सु स्वश्व्यम् । वहस्व महः पृथु-
पक्षसा रथे ॥
त्वां हि सुप्सरस्तमं नृषदनेषु हूमहे । ग्रावाणं नाश्वपृष्ठं संहना ॥
स त्वं नो देव मनसा वायो मन्दानो अग्रियः । कृधि वाजाँ
अपो धियः ॥ (ऋ० ८।२६।२४-२५)
( ३ ) इन्द्रश्च वायवेषां सुतानां पीतिमर्हतः । ताञ्जुषेथामरेपसावभि
प्रयः ।
सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः । निम्नं न यन्ति
सिन्धवोऽभि प्रयः ।