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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 592 में से

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पृष्ठ 275

चौथा अध्याय ] २६१
लेनी चाहिये और पहले पक्ष ( शुक्ल पक्ष ) में । जो इस रहस्य
को समझता है वह पापों से छूट जाता है ।
यह प्रजापति ही था जो संवत्सर के रूप में, ऋतुओं और
महीनों में व्यापक था । यह ऋतुयें और महीने प्रजापति
संवत्सर में ही प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार यह एक दूसरे में प्रतिष्ठित
हैं । जो द्वादशाह कराता है वह ऋत्विज् में प्रतिष्ठित होता है ।
इसीलिये ऋत्विज् लोग कहा करते हैं कि कोई पापी द्वादशाह
कराने के योग्य नहीं है और न वह मुझमें प्रतिष्ठित हो
सकता है ।
द्वादशाह ज्येष्ठ ( बड़े ) के लिये हैं । जिसने द्वादशाह किया
वह देवों में ज्येष्ठ हो गया ।
यह द्वादशाह श्रेष्ठ ( अगुआ ) के लिए हैं । जिसने द्वाद-
शाह किया वह देवों में श्रेष्ठ हो गया ।
ज्येष्ठ और श्रेष्ठ को ही यह यज्ञ करना चाहिये । इससे
कल्याण होता है ।
कहते हैं कि किसी पापी को द्वादशाह यज्ञ नहीं करना
चाहिये क्योंकि ऐसा (पापी) मुझमें प्रतिष्ठित नहीं हो सकता ।
इन्द्र को देवों ने ज्येष्ठ और श्रेष्ठ नहीं माना । उसने बृहस्पति
से कहा, "मुझे द्वादशाह यज्ञ करा दो"। उसने यज्ञ करा दिया
तब से देवों ने इन्द्र को ज्येष्ठ और श्रेष्ठ मान लिया । जो इस
रहस्य को समझता है उसको ज्येष्ठ और श्रेष्ठ माना जाता है
और उसके सम्बन्धी उसको श्रेष्ठ मान लेते हैं ।
पहला त्र्यह ( तीन दिन ) ऊर्ध्व है ( अर्थात् प्रातः सवन से
साय सवन तक छन्दों के अक्षर बढ़ते जाते हैं ) । बीच का
अर्थात् दूसरा त्र्यह ( बीच के तीन दिन ) तिर्यक् हैं ( अर्थात्
इनमें छन्दों के घटने बढ़ने का नियम नहीं है ), पिछला त्र्यह