ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ] १६९
इसलिये यह अनुमन्त्र पढ़ना चाहिये "वागोजः सह ओजो मयि
प्राणापानौ" । इस प्रकार होता अपने में वाणी, प्राण और अपान
को स्थापित करता है और पूर्ण आयु भोगता है । जो इस
रहस्य को समझता है वह पूर्ण आयु भोगता है । (८)
९—यज्ञ देवताओं के पास से चला गया । उन्होंने उसको
'प्रैष' मन्त्रों से बुलाना चाहा । इन मन्त्रों का नाम "प्रैष" इसी
लिये है कि इनके द्वारा यज्ञ को चाहा (प्र+इष्) । 'पुरोरुक्'
मन्त्रों के द्वारा उन्होंने इसको चमकाया (प्रारोचयन्) । इसी
लिये इनको 'पुरोरुक' कहते हैं । उन्होंने उसको वेदी में पाया
(विद्-प्रापणे) इसीलिये इसको वेदी कहते हैं। उसको पाकर
ग्रहों में ग्रहण किया । इसीलिये इनको 'ग्रह' कहते हैं। उसको
पाकर उन्होंने 'निविद्' के द्वारा देवताओं से निवेदन किया
इसलिये इनका नाम 'निविद्' हुआ ।
जब कोई किसी खोई हुई चीज को पाना चाहता है तो
इसका अधिक भाग चाहता है या कम भाग । जो बड़ा ( या
बुद्धिमान् ) होता है वह अच्छा भाग चाहता है । जो समझता
है कि 'प्रैष' बलवान हैं वह यह भी जानता है कि वह श्रेष्ठ
हैं । 'प्रैष' का अर्थ है खोये हुये को चाहना । इसलिये 'प्रैष'
को सिर झुका कर बोलते हैं । (९)
१०—निविद् जो हैं वह 'उक्थ' अर्थात् शस्त्रों के गर्भ हैं ।
प्रातः सवन में वे उक्थ या शस्त्रों से पहले रक्खे जाते हैं ।
क्योंकि गर्भ में बच्चे नीचे को सिर किये रहते हैं और नीचे को
सिर किये पैदा होते हैं ।
दोपहर के सवन में वे शस्त्र के मध्य में रक्खे जाते हैं ।
क्योंकि गर्भ योनि के मध्य में होते हैं । सायं के सवन में निविद्
पीछे रक्खे जाते हैं । क्योंकि गर्भ ऊपर से पैदा होते हैं । जो
इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशु से युक्त होता है ।