ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६० [ तीसरी पञ्चिका
इससे वायु के ग्रह की स्तुति की जाती है ।
नीचे के तीन इन्द्र-वायु वाले मंत्र पढ़ता है :-
इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरा गतम्। इन्दवो वामुशन्ति हि ॥
वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू। तावा यातमुप द्र॒वत् ॥
वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम्। मक्ष्वित्था धिया नरा ॥
( ऋ० १।२।४-६ )
यह इन्द्र-वायु के ग्रह की स्तुति हुई ।
नीचे के तीन मित्रा-वरुण के मंत्र पढ़ता है :-
मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्। धियं घृताचीं साधन्ता ॥
ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥
कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षं दधाते अपसम् ॥
( ऋ० १।२।७-६ )
इससे मित्रावरुण के ग्रह की स्तुति हुई ।
नीचे के तीन मंत्र दो अश्विनों के लिये पढ़े गये :-
अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत् पाणी शुभस्पती । पुरुभुजा चनस्यतम् ॥
अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया । धिष्ण्या वनतं गिरः ॥
दस्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः । आ यातं रुद्रवर्तनी ॥
( ऋ० १।३।१-३ )
इससे अश्विनों के ग्रहों की स्तुति की गईँ ।
नीचे के तीन इन्द्र के मंत्र पढ़ता है :-
इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः । अण्वीभिस्तना पूतासः ॥
इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः । उप ब्रह्माणि वाघतः ॥
इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः । सुते दधिष्व नश्चनः ॥
( ऋ० १।३।४-६ )
इससे शुक्र और मन्थी ग्रह की स्तुति हुई ।
अब विश्वेदेवों के तीन मंत्र पढ़ता है :-
ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वेदेवास आ गत । दाश्वांसो दाशुषः सुतम् ॥