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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 133

दूसरा अध्याय ] ११६
क्योंकि 'अपोनप्त्रीय' इसका देवता है। यह ऋचा वज्र है क्योंकि
त्रिष्टुप् छन्द में है। यह ऋचा वज्र है क्योंकि यह 'वाणी' है।
उस वज्र को इन्हीं तीनों के द्वारा फेंका और इस वज्र से असुरों
को मारा। इस प्रकार देव जीत गये और असुर परास्त हो
गये। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने अहित-चिंतक
शत्रु के ऊपर आधिपत्य कर लेता है।
इस पर कहते हैं कि उसी को होता बनना चाहिये जो इस
ऋचा में सब छन्द उत्पन्न कर दे। यदि यह तीन बार बोली जाय
तो इसमें सब छन्द उत्पन्न हो जाते हैं। (६)
१७—दीर्घ आयु की कामना वाला सौ मंत्र पढ़े। मनुष्य की
आयु सौ वर्ष की है। उसमें सौ पराक्रम और सौ इन्द्रियाँ होती
हैं। जो सौ मंत्र पढ़ता है वह यजमान के लिये इतनी आयु,
इतना पराक्रम और इतनी इन्द्रियों को धारण करता है।
जिसको यज्ञ की कामना हो वह ३६० मंत्र पढ़े। क्योंकि
संवत्सर में ३६० दिन होते हैं। संवत्सर इतना ही होता है।
संवत्सर प्रजापति है। प्रजापति यज्ञ है। जो होता यह समझकर
३६० मंत्र पढ़ता है वह यज्ञ को यजमान की ओर झुकाता है।
प्रजा और पशु की कामना वाला ७२० मंत्र पढ़े। सम्वत्सर
में ७२० दिन रात होते हैं। सम्वत्सर इतना ही होता हैं।
संवत्सर प्रजापति है। क्योंकि इसी के उत्पन्न होने पर सब प्रजा
उत्पन्न होती है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजापति
संवत्सर के पीछे उत्पन्न होकर प्रजा और पशु को पाता है।
प्रजावाला और पशु वाला होता है।
यदि कोई ब्राह्मणेतर या ऐसा पुरुष यज्ञ करे जिस पर
अपराधों का धब्बा हो तो ८०० मंत्र पढ़ने चाहिये। गायत्री में
आठ अक्षर होते हैं। देवता भी गायत्री की ही प्रकृति के हैं। इस
लिये उन्होंने पाप के अनिष्ट फलों का निवारण कर दिया। जो