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अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ
  • अध्याय १२३ * २६७

इ, उ, ए, ओ—ये पाँच स्वर होते हैं। इन्हींके क्रमसे नन्दा (भद्रा, जया, रिक्ता, पूर्णा) आदि तिथियाँ होती हैं। 'क' से लेकर 'ह' तक वर्ण होते हैं और पूर्वोक्त स्वरोंके क्रमसे सूर्य-


इसी तरह कलादि फल-साधनके लिये 'कर्कटादौ हरेद्राशिमृतुवेदत्रयैः क्रमात्' के अनुसार करना चाहिये।

क. ६ + १२''कल्पना किया कि चं० सू० = ०० । ११ । २५ । १०''
सिं ४ + ४०''यहाँपर मेष राशिका विकलात्मक ५०
क. ३ + ५०''ফল—५० को जोड़ा = ०० । ११ । २६ । ००''
तु. ३ - ५०''यहाँ ११ सम्बन्धि ५ घटी. फल प्रतिपदाकी घटी
वृ. ४ - ४०''जोड़ दिया तो २४ । ९ । ३६
ध. ६ - १२''५ । ००
------------------
म. ६ - १२''२ । ५४ । ३६ हुआ
कुं. ४ - ४०''फिर मीन तथा मेषका राशि ध्रुवा (३-३) = ०
मी. ३ - ५०''इससे (२६ । ००) × ० गुणा किया तो
मे. ३ + ५०''= ० । ० हुआ। इसको तिथि घट्यादिमें
वृ. ४ + ४०''संस्कार किया २।५४ । ३६
मि. ६ + १२''०० । ००
------------------
= स्पष्ट २ । ५४ । ३६ तिथि-मान हुआ।

इसमें एष्यखण्डासे गतखण्डा अधिक हो तो फलको ऋण समझना चाहिये। फिर भी तिथि-संस्कारके लिये तृतीय संस्कार कह रहे हैं (श्लो० १९-२०)। तिथिमानको द्विगुणित करके षष्ठांश उसीमें घटा दे। सूर्यके अंशके फलको विपरीत संस्कार करे, उसमें तिथि-नाड़ीको मिला दे। इसमें कलादिका ऋण फल-संशोधन करनेपर स्पष्टमान दण्डादिक हो जाता है। ऋणात्मक मानके नहीं घटनेपर उसमें ६० मिलाकर घटाना चाहिये एवं जिसमें संस्कार करना है, वही ६० से अधिक हो तो उसमें ही ६० घटाना चाहिये—इस तरह तृतीय संस्कार होता है।

उदाहरण—‘‘द्विगुणिता’’ के स्थानपर ‘‘त्रिगुणिता’’ पाठ रखनेपर पूर्वानीत मध्यम तिथिका मान दण्डादिक (९ । ३६) को ३ से गुणा किया तो (२८ । ४८) हुआ। इसका षष्ठांश (४ । ४८) हुआ। (२८ । ४८)-मेंसे षष्ठांश (४ । ४८)-को घटाया तो = २४ । ०० हुआ। इसमें तिथि-नाड़ी (९ । ३६)-को मिलाया तो (३३ । ३६) हुआ। इसमें सूर्यके अंशका ५ घ० संस्कार-फल घटाया तो (३३ । ३६) - (५ । ०) = (२८ । ३६) हुआ। ६० से तष्टित किया तो २८ । ३६ घट्यादिक स्पष्ट तिथिका मान हुआ, जो पूर्वानीत मध्य तिथिके घट्यादिक (९ । ३६) के आसन्न हुआ।

‘‘द्विगुणिता’’ पाठ रखनेपर ऐसा नहीं होता है, अधिक अन्तर होता है। अब योगका साधन बताते हैं (श्लोक २१-२३)।

स्पष्ट तिथि-मानको (२८ । ३६) × ४ = ११४ । २४ हुआ। इसमें तिथिका तृतीयांश (९ । ३२) मिलाया तो १२३ । ५६ हुआ। २७ से तष्टित किया तो लब्धि ४ से घट्यादिक १५ । ५६ हुआ अर्थात् सौभाग्य योगका मान घट्यादिक १५ । ५६ हुआ।

योग-साधनका दूसरा प्रकार कहते हैं—(श्लोक २३) सूर्य तथा चन्द्रमाकी योग-कलामें ८०० से भाग देनेपर लब्धि योगसंख्या होगी। शेष एष्य योगका गत घट्यादि मान होगा। उसे ८०० कलामें घटाकर सूर्य-चन्द्र-गति-योगमें ६० घटी तो शेष योगकलामें क्या इस तरह अनुपातसे भी योगका घट्यादि मान होगा।

अब करणका साधन-प्रकार कहते हैं—

द्विगुणित तिथि-संख्यामें १ घटानेसे सात ‘चल’ करण होते हैं और कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके द्वितीय परार्धमें शकुनि तथा अमावास्याके पूर्वार्ध और परार्धमें चतुष्पद एवं ‘नाग’ करण होते हैं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदाके पूर्वार्धमें किंस्तुघ्न नामके चार करण ‘स्थिर’ होते हैं और तिथिके आधेके बराबर करणोंका मान होता। यहाँपर मूल पाठमें ‘‘तिथ्यर्थतो हि’’ ऐसा लिखा है, किंतु वास्तवमें ‘‘तिथ्यर्थतोऽहिः’’ ऐसा पाठ होना चाहिये; क्योंकि ‘हि’ को पादपूरक रखनेसे ‘नाग’ अर्थ नहीं होगा। जिससे नाग नामक करणका ज्ञान नहीं होगा और ‘‘अहिः’’ ऐसा रखनेपर नाग करणका बोध होगा।

२६८ * अग्निपुराण *

मङ्गल, बुध-चन्द्रमा, बृहस्पति-शुक्र, शनि-मङ्गल | नाड़ीका स्फुरण अहर्निश होता रहता है और इसी
तथा सूर्य-शनि—ये ग्रह-स्वामी होते हैं॥ १-२॥ | मानसे अकारादि स्वरोंका उदय भी होता रहता
चालीसको साठसे गुणा करे। उसमें ग्यारहसे | है॥ ३-४ $\frac{१}{२}$॥
भाग दे। लब्धिको छःसे गुणा करके गुणनफलमें | (अब व्यावहारिक काल-ज्ञान कहते हैं—)
फिर ग्यारहसे ही भाग दें। लब्धिको तीनसे गुणा | तीन बार स्फुरण होनेपर १ 'उच्छ्वास' होता है
करके गुणनफलमें एक मिला दे तो उतनी ही | अर्थात् १ 'अणु'$^२$ होता है, ६ 'उच्छ्वास'का १
बार नाडीके स्फुरणके आधारपर पल होता है। | 'पल' होता है, ६० पलका एक 'लिसा' अर्थात्
इसके बाद भी अहर्निश नाडीका स्फुरण होता ही | १ 'दण्ड' होता है, (यद्यपि 'लिसा' शब्द कला-
रहता है। | वाचक है, जो कि ग्रहोंके राश्यादि विभागमें
उदाहरण—जैसे ४०×६०=२४००। $\frac{\text{२४००}}{\text{११}}$=२१९ | लिया जाता है, फिर भी यहाँ काल-मानके
लब्धि स्वल्पान्तरसे हुई। इसे छःसे गुणा किया | प्रकरणमें 'लिसा' शब्दसे 'दण्ड' ही लिया
तो २१९×६=१३१४ गुणनफल हुआ। इसमें फिर | जायगा; क्योंकि 'कला' तथा 'दण्ड'—ये दोनों
११ से भाग दिया तो $\frac{\text{१३१४}}{\text{११}}$=११९ लब्धि, | भचक्रके षष्ट्यंश-विभागमें ही लिये गये हैं।) ६०
शेष=५, शेष छोड़ दिया। लब्धि ११९ को ३ से | दण्डका १ अहोरात्र होता है। उपर्युक्त अ, इ, उ,
गुणा किया तो गुणनफल ३५७ हुआ। | ए, ओ—स्वरोंकी क्रमसे बाल, कुमार, युवा,
इसमें १ मिलाया तो ३५८ हुआ। इसको स्वल्पान्तरसे | वृद्ध, मृत्यु—ये पाँच संज्ञाएँ होती हैं। इनमें किसी
३६० मान लिया। अर्थात् करमूलगत नाडीका | एक स्वरके उदयके बाद पुनः उसका उदय पाँचवें
३६० बार स्फुरण होनेके आधारपर ही पल होते | खण्डपर होता है। जितने समयसे उदय होता
हैं, जिनका ज्ञानप्रकार आगे कहेंगे। इसी तरह | है, उतने ही समयसे अस्त भी होता है। इनके


१. इस विषयके स्पष्ट बोधके लिये निम्नाङ्कित स्वरचक्र देखिये—

स्वराःअइउएओ
तिथयःनन्दा<br>१।६।११भद्रा<br>२।७।१२जया<br>३।८।१३रिक्ता<br>४।९।१४पूर्णा<br>५।१०।१५
वर्णाःक<br>छ<br>ड<br>ध<br>भ<br>वख<br>ज<br>ढ<br>न<br>म<br>शग<br>झ<br>त<br>प<br>य<br>षघ<br>ट<br>थ<br>फ<br>र<br>सच<br>ठ<br>द<br>ब<br>ल<br>ह
स्वामिनःसूर्य<br>मंगलबुध<br>चन्द्रबृह०<br>शुक्रशनि०<br>मं०सू०<br>श०
संज्ञाबालकुमारयुवावृद्धमृत्यु

२. इस विषयपर भास्कराचार्य अपनी 'गणिताध्याय' नामक पुस्तकके 'कालमानाध्याय' में लिखते हैं—
गुर्वक्षरैः खेन्दुमितैरसुस्तैः षड्भिः पलं तैर्घटिका खषड्भिः। स्याद्वा घटीषष्टिरहः खरमैर्मासो दिनैस्तैर्द्विकुभिश्च वर्षम्॥ १॥
"दस गुरु अक्षरोंके उच्चारणमें जितना समय लगता है, उसे एक 'अणु' कहते हैं और ६ अणुओंका एक 'पल' होता है। ६० पलका १ 'दण्ड', ६० दण्डका १ 'अहोरात्र', ३० दिन-रातका एक 'मास' और १२ मासका एक 'वर्ष' होता है।"

* अध्याय १२३ *२६९

उदयकाल एवं अस्तकालका मान अहोरात्रके अर्थात् ६० दण्डके एकादशांशके समान होता है—जैसे ६० में ११ से भाग देनेपर ५ दण्ड २७ पल लब्धि होगी तो ५ दण्ड २७ पल उक्त स्वरोंका उदयास्तमान होता है। किसी स्वरके उदयके बाद दूसरा स्वर ५ दण्ड २७ पलपर उदय होगा। इसी तरह पाँचोंका उदय तथा अस्तमान जानना चाहिये। इनमेंसे जब मृत्युस्वरका उदय हो, तब युद्ध करनेपर पराजयके साथ ही मृत्यु हो जाती है॥ ५–७॥

(अब शनिचक्रका वर्णन करते हैं—) शनिचक्रमें १५ दिनोंपर क्रमशः ग्रहोंका उदय हुआ करता है। इस पञ्चदश विभागके अनुसार शनिका भाग युद्धमें मृत्युदायक होता है। (विशेष—जब कि शनि एक राशिमें ढाई साल अर्थात् ३० मास रहता है, उसमें दिन-संख्या ९०० हुई। ९०० में १५ का भाग देनेसे लब्धि ६० होगी। ६० दिनका १ पञ्चदश विभाग हुआ। शनिके राशिमें प्रवेश करनेके बाद शनि आदि ग्रहोंका उदय ६० दिनका होगा; जिसमें उदयसंख्या ४ बार होगी। इस तरह जब शनिका भाग आये, उस समय युद्ध करना निषिद्ध है)॥ ८॥

(अब कूर्मपृष्ठाकार शनि-बिम्बके पृष्ठका क्षेत्रफल कहते हैं—) दस कोटि सहस्र तथा तेरह लाखमें इसीका दशांश मिला दे तो उतने ही योजनके प्रमाणवाले कूर्मरूप शनि-बिम्बके पृष्ठका क्षेत्रफल होता है। अर्थात् ११००, १४३०००० ग्यारह अरब चौदह लाख तीस हजार योजन शनि-बिम्ब पृष्ठका क्षेत्रफल है। (विशेष—ग्रन्थान्तरोंमें ग्रहोंके बिम्ब-प्रमाण तथा कर्मप्रमाण योजनमें ही कहे गये हैं। जैसे 'गणिताध्याय' में भास्कराचार्य—सूर्य तथा चन्द्रका बिम्बपरिमाण-कथनके अवसरपर—'बिम्बं रवेर्द्विद्विशरर्तुसंख्यानीन्दोः खनागाम्बुधियोजनानि।' आदि। यहाँ भी संख्या योजनके प्रमाणवाली ही लेनी चाहिये।) मघाके प्रथम चरणसे लेकर कृत्तिकाके आदिसे अन्ततक शनिका निवास अपने स्थानपर रहता है, उस समय युद्ध करना ठीक नहीं होता॥ ९॥

(अब राहु-चक्रका वर्णन करते हैं—) राहु-चक्रके लिये सात खड़ी रेखा एवं सात पड़ी रेखा बनानी चाहिये। उसमें वायुकोणसे नैर्ऋत्यकोणको लिये हुए अग्निकोणतक शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे लेकर पूर्णिमातककी तिथियोंको लिखना चाहिये एवं अग्निकोणसे ईशानकोणको लिये हुए वायुकोणतक कृष्णपक्षकी प्रतिपदासे लेकर अमावास्यातककी तिथियोंको लिखना चाहिये। इस तरह तिथिरूप राहुका न्यास होता है। 'र'कारको दक्षिण दिशामें लिखे और 'ह'कारको वायुकोणमें लिखे। प्रतिपदादि तिथियोंके सहारे 'क'कारादि अक्षरोंको भी लिखे। नैर्ऋत्यकोणमें 'सकार' लिखे। इस तरह राहुचक्र तैयार हो जाता है। राहु-मुखमें* यात्रा करनेसे यात्रा-भङ्ग


* देवालये गेहविधौ जलाशये राहोर्मुखं शम्भुदिशो विलोमतः।
मीनार्कसिंहार्कमृगार्कतस्त्रिभे खाते मुखात् पृष्ठवि दिक् शुभा भवेत्॥
(मुहूर्त्तचिन्तामणि, वास्तुप्रकरण, १९)

मुहूर्त्तचिन्तामणि-ग्रन्थोक्त रामाचार्यके प्रोक्त वचनानुसार राहुका भ्रमण अपने स्थानसे विलोम ही होता है। जैसे लिखित चक्रमें शुक्लपक्षकी एकादशीको राहुका मुख दक्षिण दिशामें कहा गया है और पुच्छ अमावास्या तिथिपर रहेगी; क्योंकि राहुका स्वरूप सर्पाकार है और एकादशीके बाद दशमी, नवमी आदि विलोम तिथियोंपर राहुका मुख भ्रमण करेगा। इसी तरह शुक्लपक्षकी प्रत्येक तिथियोंपर राहुका मुख आता रहेगा। जहाँपर राहुका मुख रहे, उस तिथिमें उस दिशामें यात्रा करना ठीक नहीं होता है। ककारादि अक्षरोंसे स्वरका भी सम्बन्ध लिया गया है। जैसे पूर्वोक्त स्वरचक्रमें किस स्वरका कौन वर्ण है, यह लिखा गया है; अतः जिस तिथिपर जो वर्ण है, वह जिस स्वरसे सम्बन्ध रखता हो, उस स्वरवाले भी उस दिशामें यात्रा न करें।

२७० * अग्निपुराण *
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राहुचक्र नीचे दिया जा रहा है—

राहुचक्र

(पूर्व)(कृष्णतिथि)
फपनघदथत
७६५४३२११५ ण
ब ८१४ ढ
भ ९१३ ड
म १०१२ ठदक्षिण
उत्तर य ११११ ट(रा.)
र १२१० ञ
ल १३९ झ
व १४८ ज
३०<br>ह्१<br>क२<br>ख३<br>ग४<br>घ५<br>ङ६<br>च७<br>छ(स ष श)
(पश्चिम)(शुक्लतिथि)

होता है ॥ १०-१२॥

(अब तिथिके अनुसार भद्रा-निवासकी दिशाका वर्णन करते हैं—) पौर्णमासी तिथिको भद्राका नाम 'विष्टि' होता है और वह अग्निकोणमें रहती है। तृतीया तिथिको भद्राका नाम 'कराली' होता है और वह पूर्व दिशामें वास करती है। सप्तमी तिथिको भद्राका नाम 'घोरा' होता है और वह दक्षिण दिशामें निवास करती है। सप्तमी तथा दशमी तिथियोंको भद्रा क्रमसे ईशानकोण तथा उत्तर दिशामें, चतुर्दशी तिथिको वायव्य कोणमें, चतुर्थी तिथिको पश्चिम दिशामें, शुक्लपक्षकी अष्टमी तथा एकादशीको दक्षिण दिशामें रहती है। इसका प्रत्येक शुभ कार्योंमें सर्वथा त्याग करना चाहिये ॥ १३-१४॥

(अब पंद्रह मुहूर्तोंका नाम एवं नामानुकूल कार्योंका वर्णन कर रहे हैं—) रौद्र, श्वेत, मैत्र, सारभट, सावित्र, विरोचन, जयदेव, अभिजित्, रावण, विजय, नन्दी, वरुण, यम, सौम्य, भव—ये पंद्रह मुहूर्त हैं। 'रौद्र' मुहूर्तमें भयानक कार्य करना चाहिये। 'श्वेत' मुहूर्तमें स्नानादिक कार्य करना चाहिये। 'मैत्र' मुहूर्तमें कन्याका विवाह शुभ होता है। 'सारभट' मुहूर्तमें शुभ कार्य करना चाहिये। 'सावित्र' मुहूर्तमें देवोंका स्थापन, 'विरोचन' मुहूर्तमें राजकीय कार्य, 'जयदेव' मुहूर्तमें विजय-सम्बन्धी कार्य तथा 'रावण' मुहूर्तमें संग्रामका कार्य करना चाहिये। 'विजय' मुहूर्तमें कृषि तथा व्यापार, 'नन्दी' मुहूर्तमें षट्कर्म, 'वरुण' मुहूर्तमें तड़ागादि और 'यम' मुहूर्तमें विनाशवाला कार्य करना चाहिये। 'सौम्य' मुहूर्तमें सौम्य कार्य करना चाहिये। 'भव' मुहूर्तमें दिन-रात शुभ लग्न ही रहता है, अतः उसमें सभी शुभ कार्य किये जा सकते हैं। इस प्रकार ये पंद्रह योग

* अध्याय १२३ *२७१

अपने नामानुसार ही शुभ तथा अशुभ होते हैं* ॥ १५–२०॥

(अब राहुके दिशा-संचारका वर्णन कर रहे हैं—) (दैनिक राहु) राहु पूर्वदिशासे वायुकोणतक, वायुकोणसे दक्षिण दिशातक, दक्षिण दिशासे ईशानकोणतक, ईशानकोणसे पश्चिमतक, पश्चिमसे अग्निकोणतक एवं अग्निकोणसे उत्तरतक तीन-तीन दिशा करके चार घटियोंमें भ्रमण करता है॥ २१-२२॥

(अब ओषधियोंके लेपादिद्वारा विजयका वर्णन कर रहे हैं—) चण्डी, इन्द्राणी (सिंधुवार), वाराही (वाराहीकंद), मुशली (तालमूली), गिरिकर्णिका (अपराजिता), बला (कुट), अतिबला (कंघी), क्षीरी (सिरखोला), मल्लिका (मोतिया), जाती (चमेली), यूथिका (जूही), श्वेतार्क (सफेद मदार), शतावरी, गुरुच, वागुरी—इन यथाप्राप्त दिव्य ओषधियोंको धारण करना चाहिये। धारण करनेपर ये युद्धमें विजय-दायिनी होती हैं॥ २३-२४॥

'ॐ नमो भैरवाय खड्गपरशुहस्ताय ॐ हूं विघ्नविनाशाय ॐ हूं फट्।'—इस मन्त्रसे शिखा बाँधकर यदि संग्राम करे तो विजय अवश्य होती है। (अब संग्राममें विजयप्रद) तिलक, अञ्जन, धूप, उपलेप, स्नान, पान, तैल, योगचूर्ण—इन पदार्थोंका वर्णन करता हूँ, सुनो—

सुभगा (नीलदूर्वा), मनःशिला (मैनसिल), ताल (हरताल)—इनको लाखारसमें मिलाकर, स्त्रीके दूधमें घोंटकर ललाटमें तिलक करनेसे शत्रु वशमें हो जाता है। विष्णुक्रान्ता (अपराजिता), सर्पाक्षी (महिषकंद), सहदेवी (सहदेइया), रोचना (गोरोचन)—इनको बकरीके दूधमें पीसकर लगाया हुआ तिलक शत्रुओंको वशमें करनेवाला होता है। प्रियंगु (नागकेसर), कुङ्कुम, कुष्ठ, मोहिनी (चमेली), तगर, घृत—इनको मिलाकर लगाया हुआ तिलक वश्यकारक होता है। रोचना (गोरोचन), रक्तचन्दन, निशा (हल्दी), मनःशिला (मैनसिल), ताल (हरताल), प्रियंगु (नागकेसर), सर्षप (सरसों), मोहिनी (चमेली), हरिता (दूर्वा), विष्णुक्रान्ता (अपराजिता), सहदेवी, शिखा (जटामाँसी)—इनको मातुलुङ्ग (बिजौरा नीबू)के रसमें पीसकर ललाटमें किया हुआ तिलक वशमें करनेवाला होता है। इन तिलकोंसे इन्द्रसहित समस्त देवता वशमें हो जाते हैं, फिर क्षुद्र मनुष्योंकी तो बात ही क्या है। मञ्जिष्ठ, रक्तचन्दन, कटुकन्दा (सहिजन), विलासिनी, पुनर्नवा (गदहपूर्णा)—इनको मिलाकर लेप करनेसे सूर्य भी वशमें हो जाते हैं। मलयचन्दन, नागपुष्प (चम्पा), मञ्जिष्ठ, तगर, वच, लोध्र, प्रियंगु (नागकेसर), रजनी (हल्दी), जटामाँसी—इनके सम्मिश्रणसे बना हुआ तैल वशमें करनेवाला होता है॥ २५–३४॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'युद्धजयार्णवसम्बन्धी विविध योगोंका वर्णन' नामक
एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२३॥


* दिनमानके ३० दण्ड होनेपर दिनमानका १५ वाँ भाग २ दण्डका होगा; अतः उक्त पंद्रह मुहूतोंका मान मध्यम मानसे २ दण्डका ही प्रतिदिन माना गया है। इसे ही 'शिवद्विघटिका' मुहूर्त कहते हैं। उदयसे सायंकालतक २ दण्डके मानसे प्रत्येक मुहूर्तका मान होता है। इसमें नामानुकूल शुभ या अशुभ कार्य करना चाहिये। इसी तरह 'मुहूर्तचिन्तामणि' में १५ मुहूर्त विवाह-प्रकरण (५२)-में कहे गये हैं, जैसे—

गिरिशभुजगमित्रामित्र्यवस्त्वम्बुविश्वेऽभिजिदथ च विधातापीन्द्र इन्द्रानलौ च॥
निर्ऋतिरुदकनाथोऽप्यर्थमाथो भगः स्युः क्रमश इह मुहूर्ता वासरे बाणचन्द्राः।

२७२ * अग्निपुराण *

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एक सौ चौबीसवाँ अध्याय

युद्धजयार्णवीय ज्योतिषशास्त्रका सार

अग्निदेव कहते हैं— अब मैं युद्धजयार्णव-प्रकरणमें ज्योतिषशास्त्रकी सारभूत वेला (समय), मन्त्र और औषध आदि वस्तुओंका उसी प्रकार वर्णन करूँगा, जिस तरह शंकरजीने पार्वतीजीसे कहा था॥ १॥

पार्वतीजीने पूछा— भगवन्! देवताओंने (देवासुर-संग्राममें) दानवोंपर जिस उपायसे विजय पायी थी, उसका तथा युद्धजयार्णवोक्त शुभाशुभ-विवेकादि रूप ज्ञानका वर्णन कीजिये॥ २॥

शंकरजी बोले— मूलदेव (परमात्मा)-की इच्छासे पंद्रह अक्षरवाली एक शक्ति पैदा हुई। उसीसे चराचर जीवोंकी सृष्टि हुई। उस शक्तिकी आराधना करनेसे मनुष्य सब प्रकारके अर्थोंका ज्ञाता हो जाता है। अब पाँच मन्त्रोंसे बने हुए मन्त्रपीठका वर्णन करूँगा। वे मन्त्र सभी मन्त्रोंके जीवन-मरणमें अर्थात् 'अस्ति' तथा 'नास्ति' रूप सत्तामें स्थित हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद—इन चारों वेदोंके मन्त्रोंको प्रथम मन्त्र कहते हैं। सद्योजातादि मन्त्र द्वितीय मन्त्र हैं एवं ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र—ये तृतीय मन्त्रके स्वरूप हैं। ईश (मैं), सात शिखावाले अग्नि तथा इन्द्रादि देवता—ये चौथे मन्त्रके स्वरूप हैं। अ, इ, उ, ए, ओ—ये पाँचों स्वर पञ्चम मन्त्रके स्वरूप हैं। इन्हीं स्वरोंको मूलब्रह्म भी कहते हैं॥ ३—६॥

(अब पञ्च स्वरोंकी उत्पत्ति कह रहे हैं—) जिस तरह लकड़ीमें व्यापक अग्निकी प्रतीति बिना जलाये नहीं होती है, उसी तरह शरीरमें विद्यमान शिव-शक्तिकी प्रतीति ज्ञानके बिना नहीं होती है। महादेवी पार्वती! पहले ॐकारस्वरसे विभूषित शक्तिकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् बिन्दु 'एकार' रूपमें परिणत हुआ। पुनः ओंकारमें शब्द पैदा हुआ, जिससे 'उकार' का उद्गम हुआ। यह 'उकार' हृदयमें शब्द करता हुआ विद्यमान रहता है। 'अर्धचन्द्र' से मोक्ष-मार्गको बतानेवाले 'इकार' का प्रादुर्भाव हुआ। तदनन्तर भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला अव्यक्त 'अकार' उत्पन्न हुआ। वही 'अकार' सर्वशक्तिमान् एवं प्रवृत्ति तथा निवृत्तिका बोधक है॥ ७—१०॥

(अब शरीरमें पाँचों स्वरोंका स्थान कह रहे हैं—) 'अ' स्वर शरीरमें प्राण अर्थात् श्वासरूपसे स्थिर होकर विद्यमान रहता है। इसीका नाम 'इड़ा' है। 'इकार' प्रतिष्ठा नामसे रहकर रसरूपमें तथा पालक-स्वरूपमें रहता है। इसे ही 'पिङ्गला' कहते हैं। 'ई' स्वरको 'कूरा शक्ति' कहते हैं। 'हर-बीज' (उकार) स्वर शरीरमें अग्निरूपसे रहता है। यही 'समान-बोधिका विद्या' है। इसे 'गान्धारी' कहते हैं। इसमें 'दहनात्मिका' शक्ति है। 'एकार' स्वर शरीरमें जलरूपसे रहता है। इसमें शान्ति-क्रिया है तथा 'ओकार' स्वर शरीरमें वायुरूपसे रहता है। यह अपान, व्यान, उदान आदि पाँच स्वरूपोंमें होकर स्पर्श करता हुआ गतिशील रहता है। पाँचों स्वरोंका सम्मिलित सूक्ष्म रूप जो 'ओंकार' है, वह 'शान्त्यतीत' नामसे बोधित होकर शब्द-गुणवाले आकाश-रूपमें रहता है। इस तरह पाँचों स्वर (अ, इ, उ, ए, ओ) हुए, जिनके स्वामी क्रमसे मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि ग्रह हुए। ककारादि वर्ण इन स्वरोंके नीचे होते हैं। ये ही संसारके मूल कारण हैं। इन्हींसे चराचर सब पदार्थोंका ज्ञान होता है॥ ११—१४$\frac{१}{२}$॥

अब मैं विद्यापीठका स्वरूप बतलाता हूँ, जिसमें 'ओंकार' शिवरूपसे कहा गया है और 'उमा' स्वयं सोम अर्थात् अमृतरूपसे है।

* अध्याय १२५ * २७३

इन्हींको वामा, ज्येष्ठा तथा रौद्री शक्ति भी कहते हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र—क्रमशः ये ही तीनों गुण हैं एवं सृष्टिके उत्पादक, पालक तथा संहारक हैं। शरीरके अंदर तीन रत्न नाड़ियाँ हैं, जिनका नाम स्थूल, सूक्ष्म तथा पर है। इनका श्वेत वर्ण है। इनसे सदैव अमृत टपकता रहता है, जिससे आत्मा सदैव आप्लावित रहता है। इस प्रकार उसका दिन-रात ध्यान करते रहना चाहिये। देवि! ऐसे साधकका शरीर अजर हो जाता है तथा उसे शिव-सायुज्यकी प्राप्ति हो जाती है। प्रथमतः अङ्गुष्ठ आदिमें, नेत्रोंमें तथा देहमें भी अङ्गन्यास करे, तत्पश्चात् मृत्युंजयकी अर्चना करके यात्रा करनेवाला संग्राम आदिमें विजयी होता है। आकाश शून्य है, निराधार है तथा शब्द-गुणवाला है। वायुमें स्पर्श गुण है। वह तिरछा झुककर स्पर्श करता है। रूपकी अर्थात् अग्निकी ऊर्ध्वगति बतलायी गयी है तथा जलकी अधोगति होती है। सब स्थानोंको छोड़कर गन्ध-गुणवाली पृथ्वी मध्यमें रहकर सबके आधार-रूपमें विद्यमान है॥ १५—२०$\frac{१}{२}$॥

नाभिके मूलमें अर्थात् मेरुदण्डकी जड़में कंदके स्वरूपमें श्रीशिवजी सुशोभित हैं। वहींपर शक्ति-समुदायके साथ सूर्य, चन्द्रमा तथा भगवान् विष्णु रहते हैं और पञ्चतन्मात्राओंके साथ दस प्रकारके प्राण भी रहते हैं। कालाग्निके समान देदीप्यमान वह शिवजीकी मूर्ति सदैव चमकती रहती है। वही चराचर जीवलोकका प्राण है। उस मन्त्रपीठके नष्ट होनेपर वायुस्वरूप जीवका नाश समझना चाहिये*॥ २१—२३॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'युद्धजयार्णव-सम्बन्धी ज्योतिष शास्त्रका सार-कथन' नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२४॥


एक सौ पचीसवाँ अध्याय

युद्धजयार्णव-सम्बन्धी अनेक प्रकारके चक्रोंका वर्णन

शंकरजीने कहा—'ॐ ह्रीँ कर्णमोटनि बहुरूपे बहुदंष्ट्रे हूं फट्, ॐ हः, ॐ ग्रस ग्रस, कृन्त कृन्तच्छक च्छक हूं फट् नमः।' इस मन्त्रका नाम 'कर्णमोटी महाविद्या' है। यह सभी वर्णोंमें रक्षा करनेवाली है। इस मन्त्रको केवल पढ़नेसे ही मनुष्य क्रोधाविष्ट हो जाता है तथा उसके नेत्र लाल हो जाते हैं। यह मन्त्र मारण, पातन, मोहन एवं उच्चाटनमें उपयुक्त होता है॥ १-२॥

अब स्वरोदयके साथ पाँच प्रकारके वायुका स्थान तथा उसका प्रयोजन कहता हूँ। नाभिसे लेकर हृदयतक जो वायुका संचार होता रहता है, उसको 'मारुतचक्र' कहते हैं। जप तथा होम-कार्यमें लगा हुआ क्रोधी साधक उससे संग्रामादि कार्योंमें उच्चाटन-कर्म करता है। कानसे लेकर नेत्रतक जो वायु है, उससे प्रभेदन-कार्य करे एवं हृदयसे गुदामार्गतक जो वायु है, उससे ज्वर-दाह तथा शत्रुओंका मारण-कार्य करना चाहिये। इसी वायुका नाम 'वायुचक्र' है। हृदयसे लेकर कण्ठतक जो वायु है, उसका नाम 'रस' है। इसे ही 'रसचक्र' कहते हैं। उससे शान्तिका प्रयोग किया जाता है तथा पौष्टिक रसके समान उसका गुण है। भौंहसे लेकर नासिकाके अग्रभागतक जो वायु है, उसका नाम 'दिव्य' है। इसे ही 'तेजश्चक्र' कहते हैं। गन्ध इसका गुण है तथा


* यह विषय इस अध्यायके पूर्व अध्यायमें 'स्वरचक्र'के अन्तर्गत आ गया है।

२७४ * अग्निपुराण *


इससे स्तम्भन और आकर्षण-कार्य होता है। नासिकाग्रमें मनको स्थिर करके साधक निस्संदेह स्तम्भन तथा कीलन कर्म करता है। उपर्युक्त वायुचक्रमें चण्डघण्टा, कराली, सुमुखी, दुर्मुखी, रेवती, प्रथमा तथा घोरा—इन शक्तियोंका अर्चन करना चाहिये। उच्चाटन करनेवाली शक्तियाँ तेजश्चक्रमें रहती हैं। सौम्या, भीषणी, देवी, जया, विजया, अजिता, अपराजिता, महाकोटी, महारौद्री, शुष्ककाया, प्राणहरा—ये ग्यारह शक्तियाँ रसचक्रमें रहती हैं॥ ३—९$\frac{१}{२}$॥

विरूपाक्षी, परा, दिव्या, ११ आकाश-मातृकाएँ, संहारी, जातहारी, दंष्ट्राला, शुष्करेवती, पिपीलिका, पुष्टिहरा, महापुष्टि, प्रवर्धना, भद्रकाली, सुभद्रा, भद्रभीमा, सुभद्रिका, स्थिरा, निष्ठा, दिव्या, निष्कम्पा, गदिनी और रेवती—ये बत्तीस मातृकाएँ कहे हुए चारों चक्रों (मारुत, वायु, रस, दिव्य)-में आठ-आठके क्रमसे स्थित रहती हैं॥ १०—१२$\frac{१}{२}$॥

सूर्य तथा चन्द्रमा एक ही हैं तथा उनकी शक्तियाँ भी भूतभेदसे एक-एक ही हैं। जैसे भूतलपर नदीके जलकी स्थानभेदसे 'तीर्थ' संज्ञा हो जाती है, शरीरके अस्थिपञ्जरमें रहनेवाला एक ही प्राण कई मण्डलों (चक्रों)-से विभक्त हो जाता है। जैसे वाम तथा दक्षिण अङ्गके योगसे वही वायु दस प्रकारका हो जाता है, वैसे ही वही वायु तत्त्वरूपी वस्त्रमें छिपकर विचित्र बिन्दुरूपी मुण्डके द्वारा कपालरूपी ब्रह्माण्डके अमृतका पान करता है॥ १३—१५॥

अब पञ्चवर्गके बलसे जिस प्रकार युद्धमें विजय होती है, उसे सुनो—'अ, आ, क, च, ट, त, प, य, श'—यह प्रथम वर्ग कहा गया है। 'इ, ई, ख, छ, ठ, थ, फ, र, ष'—यह द्वितीय वर्ग है। 'उ, ऊ, ग, ज, ड, द, ब, ल, स'—यह तृतीय वर्ग है। 'ए, ऐ, घ, झ, ढ, ध, भ, व, ह'—यह चौथा वर्ग है। 'ओ, औ, अं, अः, ङ, ञ, ण, न, म'—यह पञ्चम वर्ग है। ये पैंतालीस अक्षर मनुष्योंके अभ्युदयके लिये हैं। इन वर्गोंके क्रमसे बाल, कुमार, युवा, वृद्ध और मृत्यु—ये पाँच नाम हैं॥ १६—१९$\frac{१}{२}$॥

(अब तिथि, वार और नक्षत्रोंके योगसे काल-ज्ञानका वर्णन करते हैं—) आत्मपीड़, शोषक, उदासीन—ये तीन प्रकारके काल होते हैं। मङ्गलवारको प्रतिपदा तिथि तथा कृत्तिका नक्षत्र हों तो वे प्राणीके लिये लाभदायक होते हैं। मङ्गलवारको षष्ठी तिथि तथा मघा नक्षत्र हों तो पीड़ाकारक होते हैं। मङ्गलवारको एकादशी तिथि और आर्द्रा नक्षत्र हों तो वे मृत्युदायक होते हैं। बुधवार, द्वितीया तिथि तथा मघा नक्षत्रका योग एवं बुधवार, सप्तमी तिथि और आर्द्रा नक्षत्रका योग लाभदायक होते हैं। बुधवार और भरणी नक्षत्रका योग हानिकारक होता है। इसी प्रकार बुधवार तथा श्रवण नक्षत्रके योगमें 'कालयोग' होता है। बृहस्पतिवार, तृतीया तिथि और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रका योग लाभकारक होता है। बृहस्पतिवार, अष्टमी तिथि, धनिष्ठा तथा आर्द्रा नक्षत्र एवं गुरुवार, त्रयोदशी तिथि, आश्लेषा नक्षत्र—ये योग मृत्युकारक होते हैं। शुक्रवार, चतुर्थी तिथि और पूर्वभाद्रपदा नक्षत्रका योग श्रीवृद्धि करता है। शुक्रवार, नवमी तिथि और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र—यह योग दुःखप्रद होता है। शुक्रवार, द्वितीया तिथि और भरणी नक्षत्रका योग यमदण्डके समान हानिकर होता है। शनिवार, पञ्चमी तिथि और कृत्तिका नक्षत्रका योग लाभके लिये कहा गया है। शनिवार, दशमी तिथि और आश्लेषा नक्षत्रका योग पीड़ाकारक होता है। शनिवार, पूर्णिमा तिथि और मघा नक्षत्रका योग मृत्युकारक कहा गया है॥ २०—२६॥

(अब दिशा-तिथि-दिनके योगसे हानि-लाभ कहते हैं—) पूर्व, उत्तर, अग्नि, नैर्ऋत्य, दक्षिण,

* अध्याय १२५ * २७५


वायव्य, पश्चिम, ऐशान्य — ये इनमेंसे एक-दूसरेको देखते हैं। प्रतिपदा तथा नवमी आदि तिथियोंमें मेषादि राशियोंके साथ ही रवि आदि वारको भी मिलाये। यह योग कार्यसिद्धिके लिये होता है। जैसे पूर्व दिशा, प्रतिपदा तिथि, मेष लग्न, रविवार — यह योग पूर्व दिशाके लिये युद्ध आदि कार्योंमें सिद्धिदायक होता है। ऐसे और भी समझने चाहिये। मेषसे चार राशियाँ अर्थात् मेष, वृष, मिथुन, कर्क एवं कुम्भ — ये लग्न पूर्ण विजयके लिये होते हैं। शेष राशियाँ मृत्युके लिये होती हैं। सूर्यादि ग्रह तथा रिक्ता, पूर्णा आदि तिथियोंका इसी तरह क्रमशः न्यास करना चाहिये, जैसा कि पहले दिशाओंके साथ कहा गया है। सूर्यके सम्बन्धसे युद्धमें कोई उत्तम फल नहीं होता। सोमका सम्बन्ध संधिके लिये होता है। मङ्गलके सम्बन्धसे कलह होता है। बुधके सम्बन्धसे संग्राम करनेसे अभीष्टसाधनकी प्राप्ति होती है। गुरुके सम्बन्धसे विजयलाभ होता है। शुक्रके सम्बन्धसे अभीष्ट सिद्ध होता है एवं शनिके सम्बन्धसे युद्धमें पराजय होती है॥ २७-३० ॥

(पिङ्गला (पक्षि)-चक्रसे शुभाशुभ कहते हैं—) एक पक्षीका आकार लिखकर उसके मुख, नेत्र, ललाट, सिर, हस्त, कुक्षि, चरण तथा पंखमें सूर्यके नक्षत्रसे तीन-तीन नक्षत्र लिखे। पैरवाले तीन नक्षत्रोंमें रण करनेसे मृत्यु होती है तथा पंखवाले तीन नक्षत्रोंमें धनका नाश होता है। मुखवाले तीन नक्षत्रोंमें पीड़ा होती है और सिरवाले तीन नक्षत्रोंमें कार्यका नाश होता है। कुक्षिवाले तीन नक्षत्रोंमें रण करनेसे उत्तम फल होता है॥ ३१-३२$\frac{१}{२}$॥

(अब राहुचक्र कहते हैं—) पूर्वसे नैर्ऋत्यकोणतक, नैर्ऋत्यकोणसे उत्तर दिशातक, उत्तर दिशासे अग्निकोणतक, अग्निकोणसे पश्चिमतक, पश्चिमसे ईशानतक, ईशानसे दक्षिणतक, दक्षिणसे वायव्यकोणतक, वायव्यकोणसे उत्तरतक चार-चार दण्डतक राहुका भ्रमण होता है। राहुको पृष्ठकी ओर रखकर रण करना विजयप्रद होता है तथा राहुके सम्मुख रहनेसे मृत्यु हो जाती है॥ ३३-३४$\frac{३}{४}$॥

प्रिये! मैं तुमसे अब तिथि-राहुका वर्णन करता हूँ। पूर्णिमाके बाद कृष्णपक्षकी प्रतिपदासे अग्निकोणसे लेकर ईशानकोणतक अर्थात् कृष्णपक्षकी अष्टमी तिथितक राहु पूर्व दिशामें रहता है। उसमें युद्ध करनेसे जय होती है। इसी तरह ईशानसे अग्निकोणतक और नैर्ऋत्यकोणसे वायव्यकोणतक राहुका भ्रमण होता रहता है। मेषादि राशियोंको पूर्वादि दिशामें रखना चाहिये। इस तरह रखनेपर मेष, सिंह, धनु राशियाँ पूर्वमें; वृष, कन्या, मकर — ये दक्षिणमें; मिथुन, तुला, कुम्भ — ये पश्चिममें; कर्क, वृश्चिक, मीन — ये उत्तरमें हो जाती हैं। सूर्यकी राशिसे सूर्यकी दिशा जानकर सम्मुख सूर्यमें रण करना मृत्युकारक होता है॥ ३५-३७ ॥

(भद्राकी तिथिका निर्णय बताते हैं—) कृष्णपक्षमें तृतीया, सप्तमी, दशमी तथा चतुर्दशीको 'भद्रा' होती है। शुक्लपक्षमें चतुर्थी, एकादशी, अष्टमी और पूर्णिमाको 'भद्रा' होती है। भद्राका निवास अग्निकोणसे वायव्यकोणतक रहता है। अ, क, च, ट, त, प, य, श — ये आठ वर्ग होते हैं, जिनके स्वामी क्रमसे सूर्य, चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु ग्रह होते हैं। इन ग्रहोंके वाहन क्रमसे गृध्र, उलूक, बाज, पिङ्गल, कौशिक (उलूक), सारस, मयूर, गोरङ्क नामके पक्षी हैं। पहले हवन करके मन्त्रोंको सिद्ध कर लेना चाहिये। उच्चाटनमें मन्त्रोंका प्रयोग पल्लवरूपसे करना चाहिये॥ ३८-४०$\frac{१}{२}$॥

वश्य, ज्वर एवं आकर्षणमें पल्लवका प्रयोग

२७६ * अग्निपुराण *


सिद्धििकारक होता है। शान्ति तथा मोहन-प्रयोगोंमें 'नमः' कहना ठीक होता है। पुष्टिमें तथा वशीकरणमें 'वौषट्' एवं मारण तथा प्रीतिविनाशके प्रयोगमें 'हुम्' कहना ठीक होता है। विद्वेषण तथा उच्चाटनमें 'फट्' कहना चाहिये। पुत्रादि-प्राप्तिके प्रयोगमें तथा दीप्ति आदिमें 'वषट्' कहना चाहिये। इस तरह मन्त्रोंकी छः जातियाँ होती हैं॥ ४१-४२ $\frac{१}{२}$ ॥

अब हर तरहसे रक्षा करनेवाली ओषधियोंका वर्णन करूँगा—महाकाली, चण्डी, वाराही (वाराहीकंद), ईश्वरी, सुदर्शना, इन्द्राणी (सिंधुवार)—इनको शरीरमें धारण करनेसे ये धारककी रक्षा करती हैं। बला (कुट), अतिबला (कंघी), भीरु (शतावरी अथवा कंटकारी), मुसली (तालमूली), सहदेवी, जाती (चमेली), मल्लिका (मोतिया), यूथी (जूही), गारुड़ी, भृङ्गराज (भटकटैया), चक्ररूपा—ये महौषधियाँ धारण करनेसे युद्धमें विजयदायिनी होती हैं। महादेवि! ग्रहण लगनेपर पूर्वोक्त ओषधियोंका उखाड़ना शुभदायक होता है॥ ४३-४६॥

हाथीकी सर्वाङ्गसम्पन्न मिट्टीकी मूर्ति बनाकर, उसके पैरके नीचे शत्रुके स्वरूपको रखकर, स्तम्भन-प्रयोग करना चाहिये। अथवा किसी पर्वतके ऊपर, जहाँपर एक ही वृक्ष हो, उसके नीचे, अथवा जहाँपर बिजली गिरी हो, उस प्रदेशमें, वल्मीककी मिट्टीसे एक स्त्रीकी प्रतिकृति बनाये। फिर 'ॐ नमो महाभैरवाय विकृतदंष्ट्रोग्ररूपाय पिंगलाक्षाय त्रिशूलखड्गधराय वौषट्।' हे देवि! इस मन्त्रसे उस मृत्तिकामयी देवीकी पूजा करके (शत्रुके) शस्त्रसमूहका स्तम्भन करना चाहिये॥ ४७-४९ $\frac{१}{२}$ ॥

अब संग्राममें विजय दिलानेवाले अग्निकार्यका वर्णन करूँगा—रातमें श्मशानमें जाकर नंग-धड़ंग, शिखा खोलकर, दक्षिणमुख बैठकर जलती हुई चितामें मनुष्यका मांस, रुधिर, विष, भूसी और हड्डीके टुकड़े मिलाकर नीचे लिखे मन्त्रसे आठ सौ बार शत्रुका नाम लेकर हवन करे—'ॐ नमो भगवति कौमारि लल लल लालय लालय घण्टादेवि! अमुकं मारय मारय सहसा नमोऽस्तु ते भगवति विद्ये स्वाहा।'—इस विद्यासे हवन करनेपर शत्रु अंधा हो जाता है॥ ५०-५३॥

(सब प्रकारकी सफलताके लिये हनुमान्जीका मन्त्र कहते हैं—) 'ॐ वज्रकाय वज्रतुण्ड कपिलपिङ्गल करालवदनोर्ध्वकेश महाबल रक्तमुख तडिज्जिह्व महारौद्र दंष्ट्रोत्कट कटकरालिन् महादृढप्रहार लङ्केश्वरसेतुबन्ध शैलप्रवाह गगनचर, एह्येहि भगवन्महाबलपराक्रम भैरवो ज्ञापयति, एह्येहि महारौद्र दीर्घलाङ्गूलेन अमुकं वेष्टय वेष्टय जम्भय जम्भय खन खन वैते हूं फट्।' देवि! इस मन्त्रको ३८०० बार जप कर लेनेपर श्रीहनुमान्जी सब प्रकारके कार्योंको सिद्ध कर देते हैं। कपड़ेपर हनुमान्जीकी मूर्ति लिखकर दिखानेसे शत्रुओंका विनाश होता है॥ ५४-५५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'युद्धजयार्णव-सम्बन्धी विविध चक्रोंका वर्णन' नामक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२५॥

* अध्याय १२६ * २७७

एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय

नक्षत्र-सम्बन्धी पिण्डका वर्णन

शंकरजी कहते हैं— देवि! अब मैं प्राणियोंके शुभाशुभ फलकी जानकारीके लिये नाक्षत्रिक पिण्डका वर्णन करूँगा। (जिस राजा या मनुष्यके लिये शुभाशुभ फलका ज्ञान करना हो, उसकी प्रतिकृतिरूपसे एक मनुष्यका आकार बनाकर) सूर्य जिस नक्षत्रमें हों, उससे तीन नक्षत्र उसके मस्तकमें, एक मुखमें, दो नेत्रोंमें, चार हाथ और पैरमें, पाँच हृदयमें और पाँच जानुमें लिखकर आयु-वृद्धिका विचार करना चाहिये। सिरवाले नक्षत्रोंमें संग्राम (कार्य) करनेसे राज्यकी प्राप्ति होती है। मुखवाले नक्षत्रमें सुख, नेत्रवाले नक्षत्रोंमें सुन्दर सौभाग्य, हृदयवाले नक्षत्रोंमें द्रव्यसंग्रह, हाथवाले नक्षत्रोंमें चोरी और पैरवाले नक्षत्रोंमें मार्गमें ही मृत्यु—इस तरह क्रमशः फल होते हैं॥ १—३ ½ ॥

(अब 'कुम्भ-चक्र' कह रहे हैं—) आठ कुम्भको पूर्वाद आठ दिशाओंमें स्थापित करना चाहिये। प्रत्येक कुम्भमें तीन-तीन नक्षत्रोंकी स्थापना करनेपर आठ कुम्भोंमें चौबीस नक्षत्रोंका निवेश हो जानेपर चार नक्षत्र शेष रह जायँगे। इन्हें ही 'सूर्यकुम्भ' कहते हैं। यह सूर्यकुम्भ अशुभ होता है। शेष पूर्वाद दिशाओंवाले कुम्भ-सम्बन्धी नक्षत्र शुभ होते हैं। (इसका उपयोग नाम-नक्षत्रसे दैनिक नक्षत्रतक गिनकर उसी संख्यासे करना चाहिये।)॥ ४ ½ ॥

अब मैं संग्राममें जय-पराजयका विवेक प्रदान करनेवाले सर्पाकार राहुचक्रका वर्णन करता हूँ।

प्रथम अट्ठाईस बिन्दुओंको लिखे, उसमें तीन-तीनका विभाग कर दे, इस तरह आठ विभाग कर देनेपर चौबीस नक्षत्रोंका निवेश हो जायगा। चार शेष रह जायँगे। उसपर रेखा करे। इस तरह करनेपर 'सर्पाकार चक्र' बन जायगा। जिस नक्षत्रमें राहु रहे, उसको सर्पके फणमें लिखे। उसके बाद उसी नक्षत्रसे प्रारम्भ करके क्रमशः सत्ताईस नक्षत्रोंका निवेश करे॥ ५—७ ॥

(सर्पाकार राहुचक्रका फल—) मुखवाले सात नक्षत्रोंमें संग्राम करनेसे मरण होता है, स्कन्धवाले सात नक्षत्रोंमें युद्ध करनेसे पराजय होती है, पेटवाले सात नक्षत्रोंमें युद्ध करनेसे सम्मान तथा विजयकी प्राप्ति होती है, कटिवाले नक्षत्रोंमें संग्राम करनेसे शत्रुओंका हरण होता है, पुच्छवाले नक्षत्रोंमें संग्राम करनेसे कीर्ति होती है और राहुसे दृष्ट नक्षत्रमें संग्राम करनेसे मृत्यु होती है। इसके बाद फिर सूर्यसे राहतक ग्रहोंके बलका वर्णन करूँगा॥ ८—१० ॥

(अर्धयामेशका वर्णन करते हैं—) जैसे चार प्रहरका एक दिन होता है तो एक दिनमें आठ अर्धप्रहर होंगे। यदि दिनमान बत्तीस दण्डका हो तो एक अर्ध प्रहरका मान चार दण्डका होगा। दिनमान-प्रमाणमें आठसे भाग देनेपर जो लब्धि होगी, वही एक अर्धप्रहरका मान होता है। रवि आदि सात वारोंमें प्रत्येक अर्धप्रहरका कौन ग्रह स्वामी होगा—इसपर विचार करते हुए केवल रविवारके दिन प्रत्येक अर्धप्रहरके स्वामियोंको बता रहे हैं। जैसे रविवारमें एकसे लेकर आठ अर्धप्रहरोंके स्वामी क्रमशः सूर्य, शुक्र, बुध, सोम, शनि, गुरु, मङ्गल और राहु ग्रह होते हैं। (इनमें जिस विभागका स्वामी शनि होता है, वह समय शुभ कार्योंमें त्याज्य है और उसे ही 'वारवेला' कहते हैं।)

(विशेष—रविवारके अर्धयामेशोंको देखनेसे यह अनुमान होता है कि रविवारके अतिरिक्त जिस दिनका अर्धयामेश जानना हो तो प्रथम

२७८ * अग्निपुराण *


अर्धयामेश तो दिनपति ही होगा और बादके अर्धयामोंके स्वामी छः संख्यावाले ग्रह होंगे। इसी आधारपर रविवारसे लेकर शनिवारतकके अर्धयामोंके स्वामी नीचे चक्रमें दिये जा रहे हैं*—

वारसू०चं०मं०बु०बृ०शु०श०
४ दण्डसू०चं०मं०बु०बृ०शु०श०
४ दण्डशु०श०सू०चं०मं०बु०बृ०
४ दण्डबु०बृ०शु०श०सू०चं०मं०
४ दण्डसो०मं०बु०बृ०शु०श०सू०
४ दण्डश०सू०चं०मं०बु०बृ०शु०
४ दण्डबु०शु०श०सू०चं०मं०बु०
४ दण्डमं०बु०बृ०शु०श०सू०चं०
४ दण्डरा०रा०रा०रा०रा०रा०रा०

शनि, सूर्य तथा राहुको यत्नसे पीठ पीछे करके जो संग्राम करता है, वह सैन्यसमुदायपर विजय प्राप्त करता है तथा जूआ, मार्ग और युद्धमें सफल होता है॥ ११-१२॥

(नक्षत्रोंकी स्थिरादि संज्ञा तथा उसका प्रयोजन कहते हैं—) रोहिणी, तीनों उत्तराएँ, मृगशिरा—इन पाँच नक्षत्रोंकी 'स्थिर' संज्ञा है। अश्विनी, रेवती, स्वाती, धनिष्ठा, शतभिषा—इन पाँचों नक्षत्रोंकी 'क्षिप्र' संज्ञा है। इनमें यात्रार्थीको यात्रा करनी चाहिये। अनुराधा, हस्त, मूल, मृगशिरा, पुष्य, पुनर्वसु—इनमें प्रत्येक कार्य हो सकता है। ज्येष्ठा, चित्रा, विशाखा, तीनों पूर्वाएँ, कृत्तिका, भरणी, मघा, आर्द्रा, आश्लेषा—इनकी 'दारुण' संज्ञा है। स्थिर कार्योंमें स्थिर संज्ञावाले नक्षत्रोंको लेना चाहिये। यात्रामें 'क्षिप्र' संज्ञक नक्षत्र उत्तम माने गये हैं। 'मृदु' संज्ञक नक्षत्रोंमें सौभाग्यका काम तथा 'उग्र' संज्ञक नक्षत्रोंमें उग्र काम करना चाहिये। 'दारुण' संज्ञक नक्षत्र दारुण (भयानक) कामके लिये उपयुक्त होते हैं॥ १३-१६½॥

(अब अधोमुख, तिर्यङ्मुख आदि नक्षत्रोंका नाम तथा प्रयोजन कहता हूँ—) कृत्तिका, भरणी, आश्लेषा, विशाखा, मघा, मूल, तीनों पूर्वाएँ—ये अधोमुख नक्षत्र हैं। इनमें अधोमुख कर्म करना चाहिये। उदाहरणार्थ कूप, तड़ाग, विद्याकर्म, चिकित्सा, स्थापन, नौका-निर्माण, कूपोंका विधान, गड्ढा खोदना आदि कार्य इन्हीं अधोमुख नक्षत्रोंमें करना चाहिये। रेवती, अश्विनी, चित्रा, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, अनुराधा, मृगशिरा, ज्येष्ठा—ये नौ नक्षत्र तिर्यङ्मुख हैं। इनमें राज्याभिषेक, हाथी तथा घोड़ेको पट्टा बाँधना, बाग लगाना, गृह तथा प्रासादका निर्माण, प्राकार बनाना, क्षेत्र, तोरण, ध्वजा, पताका लगाना—इन सभी कार्योंको करना चाहिये। रविवारको द्वादशी, सोमवारको एकादशी, मङ्गलवारको दशमी, बुधवारको तृतीया, बृहस्पतिवारको षष्ठी, शुक्रवारको द्वितीया, शनिवारको सप्तमी हो तो 'दग्धयोग' होता है॥ १७-२३॥

(अब त्रिपुष्कर योग बतलाते हैं—) द्वितीया, द्वादशी, सप्तमी—तीन तिथियाँ तथा रवि, मङ्गल, शनि—तीन वार—ये छः 'त्रिपुष्कर' हैं तथा विशाखा, कृत्तिका, दोनों उत्तराएँ, पुनर्वसु, पूर्वाभाद्रपदा—ये छः नक्षत्र भी 'त्रिपुष्कर' हैं। अर्थात् रवि, शनि, मङ्गलवारोंमें द्वितीया, सप्तमी, द्वादशीमेंसे कोई तिथि हो तथा उपर्युक्त नक्षत्रोंमेंसे कोई नक्षत्र हो तो 'त्रिपुष्कर-योग' होता है। त्रिपुष्कर योगमें लाभ, हानि, विजय, वृद्धि, पुत्रजन्म, वस्तुओंका नष्ट एवं विनष्ट होना—ये सब त्रिगुणित हो जाते हैं॥ २४-२६॥

(अब नक्षत्रोंकी स्वक्ष, मध्याक्ष, मन्दाक्ष और अन्धाक्ष संज्ञा तथा प्रयोजन कहते हैं—) अश्विनी, भरणी, आश्लेषा, पुष्य, स्वाती, विशाखा, श्रवण, पुनर्वसु—ये दृढ़ नेत्रवाले नक्षत्र हैं और दसों


* प्रत्येक दिनकी अर्धयामेश-संख्या आठ है तथा दिनपति रविसे लेकर शनितक सात ही हैं। अतः आठवें अर्धयामको ग्रन्थान्तरोंमें 'निरीश' माना गया है। जैसे—
रविवारादिशून्यन्तं गुलिकादिर्निरूप्यते। अष्टमांशो निरीशः स्याच्छन्यंशो गुलिकः स्मृतः॥
किंतु यहाँ अग्निपुराणमें प्रतिदिन राहुको अष्टमांशका स्वामी मान रहे हैं—यह विशेष बात है।

  • अध्याय १२७ * २७९

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दिशाओंको देखते हैं। (इनकी संज्ञा 'स्वक्ष' है।) इनमें गयी हुई वस्तु तथा यात्रामें गया हुआ व्यक्ति विशेष पुण्यके उदय होनेपर ही लौटते हैं। दोनों आषाढ़ नक्षत्र, रेवती, चित्रा, पुनर्वसु—ये पाँच नक्षत्र 'केकर' हैं, अर्थात् 'मध्याक्ष' हैं। इनमें गयी हुई वस्तु विलम्बसे मिलती है। कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, पूर्वाफाल्गुनी, मघा, मूल, ज्येष्ठा, अनुराधा, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा — ये नक्षत्र 'चिपिटाक्ष' अर्थात् 'मन्दाक्ष' हैं। इनमें गयी हुई वस्तु तथा मार्ग चलनेवाला व्यक्ति कुछ ही विलम्बमें लौट आता है। हस्त, उत्तराभाद्रपदा, आर्द्रा, पूर्वाषाढा—ये नक्षत्र 'अन्धाक्ष' हैं। इनमें गयी हुई वस्तु शीघ्र मिल जाती है, कोई संग्राम नहीं करना पड़ता॥ २७—३२॥

अब नक्षत्रोंमें स्थित 'गण्डान्त'का निरूपण करता हूँ—रेवतीके अन्तके चार दण्ड और अश्विनीके आदिके चार दण्ड 'गण्डान्त' होते हैं। इन दोनों नक्षत्रोंका एक प्रहर शुभ कार्योंमें प्रयत्नपूर्वक त्याग देना चाहिये। आश्लेषाके अन्तका तथा मघाके आदिके चार दण्ड 'द्वितीय गण्डान्त' कहे गये हैं। भैरवि! अब 'तृतीय गण्डान्त'को सुनो—ज्येष्ठा तथा मूलके बीचका एक प्रहर बहुत ही भयानक होता है। यदि व्यक्ति अपना जीवन चाहता हो तो उसे इस कालमें कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिये। इस समयमें यदि बालक पैदा हो तो उसके माता-पिता जीवित नहीं रहते॥ ३३—३६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नक्षत्रोंके निर्णयका प्रतिपादन' नामक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२६॥


एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय

विभिन्न बलोंका वर्णन

शंकरजी कहते हैं—'विष्कम्भ योग'की तीन घड़ियाँ, 'शूल योग'की पाँच 'गण्ड' तथा 'अतिगण्ड योग'की छः 'व्याघात' तथा 'वज्र योग' की नौ घड़ियोंको सभी शुभ कार्योंमें त्याग देना चाहिये। 'परिघ', 'व्यतीपात' और 'वैधृति' योगोंमें पूरा दिन त्याज्य बतलाया गया है। इन योगोंमें यात्रा-युद्धादि कार्य नहीं करने चाहिये॥ १-२॥

देवि! अब मैं मेषादि राशि तथा ग्रहोंके द्वारा शुभाशुभका निर्णय बताता हूँ—जन्म-राशिके चन्द्रमा तथा शुक्र वर्जित होनेपर ही शुभदायक होते हैं। जन्म-राशि तथा लग्नसे दूसरे स्थानमें सूर्य, शनि, राहु अथवा मङ्गल हो तो प्राप्त द्रव्यका नाश और अप्राप्तका अलाभ होता है तथा युद्धमें पराजय होती है। चन्द्रमा, बुध, गुरु, शुक्र—ये दूसरे स्थानमें शुभप्रद होते हैं। सूर्य, शनि, मङ्गल, शुक्र, बुध, चन्द्रमा, राहु—ये तीसरे घरमें हों तो शुभ फल देते हैं। बुध, शुक्र चौथे भावमें हों तो शुभ तथा शेष ग्रह भयदायक होते हैं। बृहस्पति, शुक्र, बुध, चन्द्रमा—ये पञ्चम भावमें हों तो अभीष्ट लाभकी प्राप्ति कराते हैं। देवि! अपनी राशिसे छठे भावमें सूर्य, चन्द्र, शनि, मङ्गल, बुध—ये ग्रह शुभ फल देते हैं; किंतु छठे भावका शुक्र तथा गुरु शुभ नहीं होता। सप्तम भावके सूर्य, शनि, मङ्गल, राहु हानिकारक होते हैं तथा बुध, गुरु, शुक्र सुखदायक होते हैं। अष्टम भावके बुध और शुक्र—शुभ तथा शेष ग्रह हानिकारक होते हैं। नवम भावके बुध, शुक्र शुभ तथा शेष ग्रह अशुभ होते हैं। दशम भावके शुक्र, सूर्य लाभकर होते हैं तथा शनि, मङ्गल, राहु, चन्द्रमा-बुध शुभकारक होते हैं। ग्यारहवें भावमें प्रत्येक ग्रह शुभ फल देता है, परंतु दसवें बृहस्पति त्याज्य हैं। द्वादश भावमें बुध-शुक्र शुभ तथा शेष ग्रह अशुभ होते हैं। एक दिन-रातमें द्वादश राशियाँ भोग करती हैं। अब मैं उनका

२८० * अग्निपुराण *


वर्णन कर रहा हूँ॥ ३-१२॥
(राशियोंका भोगकाल एवं चरादि संज्ञा तथा प्रयोजन कह रहे हैं—) मीन, मेष, मिथुन—इनमें प्रत्येकके चार दण्ड; वृष, कर्क, सिंह, कन्या—इनमें प्रत्येकके छः दण्ड; तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ—इनमें प्रत्येकके पाँच दण्ड भोगकाल हैं। सूर्य जिस राशिमें रहते हैं, उसीका उदय होता है और उसी राशिसे अन्य राशियोंका भोगकाल प्रारम्भ होता है। मेषादि राशियोंकी क्रमशः 'चर', 'स्थिर' और 'द्विस्वभाव' संज्ञा होती है। जैसे—मेष, कर्क, तुला, मकर—इन राशियोंकी 'चर' संज्ञा है। इनमें शुभ तथा अशुभ स्थायी कार्य करने चाहिये। वृष, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ—इन राशियोंकी 'स्थिर' संज्ञा है। इनमें स्थायी कार्य करना चाहिये। इन लग्नोंमें बाहर गये हुए व्यक्तिसे शीघ्र समागम नहीं होता तथा रोगीको शीघ्र रोगसे मुक्ति नहीं प्राप्त होती। मिथुन, कन्या, धनु, मीन—इन राशियोंकी 'द्विस्वभाव' संज्ञा है। ये द्विस्वभावसंज्ञक राशियाँ प्रत्येक कार्यमें शुभ फल देनेवाली हैं। इनमें यात्रा, व्यापार, संग्राम, विवाह एवं राजदर्शन होनेपर वृद्धि, जय तथा लाभ होते हैं और युद्धमें विजय होती है। अश्विनी नक्षत्रकी बीस ताराएँ हैं और घोड़ेके समान उसका आकार है। यदि इसमें वर्षा हो तो एक राततक घनघोर वर्षा होती है। यदि भरणीमें वर्षा आरम्भ हो तो पंद्रह दिनतक लगातार वर्षा होती रहती है॥ १३-१९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विभिन्न बलोंका वर्णन' नामक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२७॥


एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय

कोटचक्रका वर्णन

शंकरजी कहते हैं— अब मैं 'कोटचक्र' का वर्णन करता हूँ—पहले चतुर्भुज लिखे, उसके भीतर दूसरा चतुर्भुज, उसके भीतर तीसरा चतुर्भुज और उसके भीतर चौथा चतुर्भुज लिखे। इस तरह लिख देनेपर 'कोटचक्र' बन जाता है। कोटचक्रके भीतर तीन मेखलाएँ बनती हैं, जिनका नाम क्रमसे 'प्रथम नाड़ी', 'मध्यनाड़ी' और 'अन्तनाड़ी' है। कोटचक्रके ऊपर पूर्वादि दिशाओंको लिखकर मेषादि राशियोंको भी लिख देना चाहिये। (कोटचक्रमें नक्षत्रोंका न्यास कहते हैं—) पूर्व भागमें कृत्तिका, अग्निकोणमें आश्लेषा, दक्षिणमें मघा, नैर्ऋत्यमें विशाखा, पश्चिममें अनुराधा, वायुकोणमें श्रवण, उत्तरमें धनिष्ठा, ईशानमें भरणीको लिखे। इस तरह लिख देनेपर बाह्य नाड़ीमें अर्थात् प्रथम नाड़ीमें आठ नक्षत्र हो जायँगे। इसी तरह पूर्वादि दिशाओंके अनुसार रोहिणी, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, स्वाती, ज्येष्ठा, अभिजित्, शतभिषा, अश्विनी—ये आठ नक्षत्र, मध्यनाड़ीमें हो जाते हैं। कोटके भीतर जो अन्तनाड़ी है, उसमें भी पूर्वादि दिशाओंके अनुसार पूर्वमें मृगशिरा, अग्निकोणमें पुनर्वसु, दक्षिणमें उत्तराफाल्गुनी, नैर्ऋत्यमें चित्रा, पश्चिममें मूल, वायव्यमें उत्तराषाढ़ा, उत्तरमें पूर्वाभाद्रपदा और ईशानमें रेवतीको लिखे। इस तरह लिख देनेपर अन्तनाड़ीमें भी आठ नक्षत्र हो जाते हैं। आर्दा, हस्त, पूर्वाषाढ़ा तथा उत्तराभाद्रपदा—ये चार नक्षत्र कोटचक्रके मध्यमें स्तम्भ होते हैं।* इस तरह चक्रको लिख देनेपर बाहरका स्थान दिशाके स्वामियोंका होता


* आर्दा हस्तस्तथाषाढा तुर्यमुत्तरभाद्रकम्। मध्ये स्तम्भचतुष्कं तु दद्यात् कोटस्य कोटरे॥ (अग्निपु० १२८।९)
ग्रन्थान्तरमें भी ऐसा ही वर्णन है।
'नृपतिजयचर्या' नामक ग्रन्थमें समचतुरस्र कोटचक्रके प्रकरणमें २३ वें श्लोकमें स्तम्भ-चतुष्टयका वर्णन इस प्रकार किया गया है—
पूर्वे रौद्रं यमे हस्तं पूर्वाषाढा च वारुणे। उत्तरे चोत्तराभाद्रा एतत् स्तम्भचतुष्टयम्॥

* अध्याय १२८ *२८१

है*। आगन्तुक योद्धा जिस दिशामें जो नक्षत्र है, उसी नक्षत्रमें उसी दिशासे कोटमें यदि प्रवेश करता है तो उसकी विजय होती है। कोटके बीचमें जो नक्षत्र हैं, उन नक्षत्रोंमें जब शुभ ग्रह आये, तब युद्ध करनेसे मध्यवालेकी विजय तथा चढ़ाई करनेवालेकी पराजय होती है। प्रवेश करनेवाले नक्षत्रमें प्रवेश करना तथा निर्गमवाले नक्षत्रमें निकलना चाहिये। शुक्र, मङ्गल और बुध—ये जब नक्षत्रके अन्तमें रहें, तब यदि युद्ध आरम्भ किया जाय तो आक्रमणकारीकी पराजय होती है। प्रवेशवाले चार नक्षत्रोंमें यदि युद्ध छेड़ा जाय तो वह दुर्ग वशमें हो जाता है—इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है॥ १—१३॥ (विशेष—प्रथम नाड़ीके आठ नक्षत्र दिशाके नक्षत्र हैं, उन्हींको 'बाह्य' भी कहते हैं। मध्य तथा अन्त नाड़ीवाले नक्षत्रोंको कोटके मध्यका समझना चाहिये।)

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोटचक्रका वर्णन' नामक
एक सौ अट्ठाइसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२८॥


* दिशाओंके स्वामीके लिये रामाचार्य 'मुहूर्त-चिन्तामणि' नामक ग्रन्थके यात्रा-प्रकरणमें लिखते हैं—
सूर्यः सितो भूमिसुतोऽथ राहुः शनिः शशी ज्ञश्च बृहस्पतिश्च। प्राच्यादितो दिक्षु विदिक्षु चापि दिशामधीशाः क्रमशः प्रदिष्टाः ॥ (११।४७)
‘पूर्वके सूर्य, अग्निकोणके शुक्र, दक्षिणके मङ्गल, नैर्ऋत्यके राहु, पश्चिमके शनि, वायव्यके चन्द्र, उत्तरके बुध, ईशानके बृहस्पति—इस प्रकार क्रमशः दिशाओंके स्वामी कहे गये हैं।

                                कोटचक्रम्
                                  पूर्व
                               मे.  वृ.  मि.
 ईशान ┌─────────────────────────────────────────────────────────┐ अग्नि
       │ भरणी                    कृत्तिका                आश्लेषा │
       │     ┌─────────────────────────────────────────────┐     │
       │     │ अश्विनी            रोहिणी              पुष्य│     │
       │     │     ┌─────────────────────────────────┐     │     │
       │     │     │ रेवती        मृगशिरा     पुनर्वसु│     │     │
       │     │     │     ┌─────────────────────┐     │     │     │
       │     │     │     │        आर्द्रा       │     │     │     │
 उत्तर │धनिष्ठा│शतभिषा│पू. भा.│ उ.भा.         हस्त │उ. फा.│पूर्वाफा.│ मघा │ दक्षिण
म. कु. मी.    │     │     │        पू. षा.      │     │     │     │ क. सिं. क.
       │     │     │     └─────────────────────┘     │     │     │
       │     │     │ उ. षा.         मूल         चित्रा │     │     │
       │     │     └─────────────────────────────────┘     │     │
       │     │ अभि.                ज्येष्ठा            स्वाती│     │
       │     └─────────────────────────────────────────────┘     │
       │ श्रवण                   अनुराधा                 विशाखा │
  वायु └─────────────────────────────────────────────────────────┘ नैर्ऋति
                                तु.  वृ.  ध.
                                  पश्चिम

विशेष— भरणी, कृत्तिका, आश्लेषा, मघा, विशाखा, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा—ये आठ नक्षत्र बाह्य (प्रथम नाड़ी) हैं। अश्विनी, रोहिणी, पुष्य, पू० फा०, स्वाती, ज्येष्ठा, अभि०, शतभिषा—ये मध्यनाड़ीके आठ नक्षत्र हैं। रेवती, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, चित्रा, मूल, उत्तराषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा—ये आठ नक्षत्र अन्तनाड़ीके हैं। मध्य तथा अन्तनाड़ीके नक्षत्रोंको 'मध्यके नक्षत्र' कहते हैं। दिशाके नक्षत्रको 'प्रवेशक' कहते हैं। उसके विरुद्ध दिशाके नक्षत्रको 'निर्गम' कहते हैं। जैसे पूर्व प्रवेश तो पश्चिम निर्गम होगा।

२८२ * अग्निपुराण *

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एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय

अर्घकाण्डका प्रतिपादन

शंकरजी कहते हैं— अब मैं वस्तुओंकी महँगी तथा सस्तीके सम्बन्धमें विचार प्रकट कर रहा हूँ। जब कभी भूतलपर उल्कापात, भूकम्प, निर्घात (वज्रपात), चन्द्र और सूर्यके ग्रहण तथा दिशाओंमें अधिक गरमीका अनुभव हो तो इस बातका प्रत्येक मासमें लक्ष्य करना चाहिये। यदि उपर्युक्त लक्षणोंमेंसे कोई लक्षण चैत्रमें हो तो अलंकार-सामग्रियों (सोना-चाँदी आदि)-का संग्रह करना चाहिये। वह छः मासके बाद चौगुने मूल्यपर बिक सकता है। यदि वैशाखमें हो तो वस्त्र, धान्य, सुवर्ण, घृतादि सब पदार्थोंका संग्रह करना चाहिये। वे आठवें मासमें छःगुने मूल्यपर बिकते हैं। यदि ज्येष्ठ तथा आषाढ़ मासमें मिले तो जौ, गेहूँ और धान्यका संग्रह करना चाहिये। यदि श्रावणमें मिले तो घृत-तैलादि रस-पदार्थोंका संग्रह करना चाहिये। यदि आश्विनमें मिले तो वस्त्र तथा धान्य दोनोंका संग्रह करना चाहिये। यदि कार्तिकमें मिले तो सब प्रकारका अन्न खरीदकर रखना चाहिये। अगहन तथा पौषमें यदि मिले तो कुङ्कुम तथा सुगन्धित पदार्थोंसे लाभ होता है। माघमें यदि उक्त लक्षण मिले तो धान्यसे लाभ होता है। फाल्गुनमें मिले तो सुगन्धित पदार्थोंसे लाभ होता है। लाभकी अवधि छः या आठ मास समझनी चाहिये ॥ १–५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अर्घकाण्डका प्रतिपादन' नामक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२९॥


एक सौ तीसवाँ अध्याय

विविध मण्डलोंका वर्णन

शंकरजी कहते हैं— भद्रे! अब मैं विजयके लिये चार प्रकारके मण्डलका वर्णन करता हूँ। कृत्तिका, मघा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, विशाखा, भरणी, पूर्वाभाद्रपदा—इन नक्षत्रोंका 'आग्नेय मण्डल' होता है, उसका लक्षण बतलाता हूँ। इस मण्डलमें यदि विशेष वायुका प्रकोप हो, सूर्य-चन्द्रका परिवेश लगे, भूकम्प हो, देशकी क्षति हो, चन्द्र-सूर्यका ग्रहण हो, धूमज्वाला देखनेमें आये, दिशाओंमें दाहका अनुभव होता हो, केतु अर्थात् पुच्छल तारा दिखायी पड़ता हो, रक्तवृष्टि हो, अधिक गरमीका अनुभव हो, पत्थर पड़े, तो जनतामें नेत्रका रोग, अतिसार (हैजा) और अग्निभय होता है। गायें दूध कम कर देती हैं। वृक्षोंमें फल-पुष्प कम लगते हैं। उपज कम होती है। वर्षा भी स्वल्प होती है। चारों वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) दुःखी रहते हैं। सारे मनुष्य भूखसे व्याकुल रहते हैं। ऐसे उत्पातोंके दीख पड़नेपर सिन्ध-यमुनाकी तलहटी, गुजरात, भोज, बाह्लीक, जालन्धर, काश्मीर और सातवाँ उत्तरापथ—ये देश विनष्ट हो जाते हैं। हस्त, चित्रा, मघा, स्वाती, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, अश्विनी—इन नक्षत्रोंका 'वायव्य मण्डल' कहा जाता है। इसमें यदि पूर्वोक्त उत्पात हों तो विक्षिप्त होकर हाहाकार करती हुई सारी प्रजाएँ नष्टप्राय हो जाती हैं। साथ ही डाहल (त्रिपुर), कामरूप, कलिङ्ग, कोशल, अयोध्या, उज्जैन, कोङ्कण तथा आन्ध्र—ये देश नष्ट हो जाते हैं। आश्लेषा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, रेवती, शतभिषा तथा उत्तराभाद्रपदा—इन नक्षत्रोंको 'वारुण मण्डल' कहते हैं। इसमें यदि पूर्वोक्त उत्पात हों तो गायोंमें दूध-घीकी

* अध्याय १३१ * \hfill २८३


वृद्धि और वृक्षोंमें पुष्प तथा फल अधिक लगते हैं। प्रजा आरोग्य रहती है। पृथ्वी धान्यसे परिपूर्ण हो जाती है। अन्नोंका भाव सस्ता तथा देशमें सुकालका प्रसार हो जाता है, किंतु राजाओंमें परस्पर घोर संग्राम होता रहता है॥ १-१४॥

ज्येष्ठा, रोहिणी, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, उत्तराषाढ़ा, सातवाँ अभिजित्—इन नक्षत्रोंका नाम 'माहेन्द्र मण्डल' है। इसमें यदि पूर्वोक्त उत्पात हों तो प्रजा प्रसन्न रहती है, किसी प्रकारके रोगका भय नहीं रह जाता। राजा लोग आपसमें संधि कर लेते हैं और राजाओंके लिये हितकारक सुभिक्ष होता है॥ १५-१६ $\frac{१}{२}$॥

'ग्राम' दो प्रकारका होता है—पहलेका नाम 'मुखग्राम' है और दूसरेका नाम 'पुच्छग्राम' है। चन्द्र, राहु तथा सूर्य जब एक राशिमें हो जाते हैं, तब उसे 'मुखग्राम' कहते हैं। राहुसे सातवें स्थानको 'पुच्छग्राम' कहते हैं। सूर्यके नक्षत्रसे पंद्रहवें नक्षत्रमें जब चन्द्रमा आता है, उस समय तिथि-साधनके अनुसार 'सोमग्राम' होता है अर्थात् पूर्णिमा तिथि होती है*॥ १७-१९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विविध मण्डलोंका वर्णन' नामक
एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३०॥


एक सौ इकतीसवाँ अध्याय

घातचक्र आदिका वर्णन

शंकरजी कहते हैं—पूर्वादि दिशाओंमें प्रदक्षिणक्रमसे अकारादि स्वरोंको लिखे। उसमें शुक्लपक्षकी प्रतिपदा, पूर्णिमा, त्रयोदशी, चतुर्दशी, केवल शुक्लपक्षकी एक अष्टमी (कृष्णपक्षकी अष्टमी नहीं), सप्तमी, कृष्णपक्षमें प्रतिपदासे लेकर त्रयोदशीतक (अष्टमीको छोड़कर) द्वादश तिथियोंका न्यास करे। इस चैत्र-चक्रमें पूर्वादि दिशाओंमें स्पर्श-वर्णोंको लिखनेसे जय-पराजयका तथा लाभका निर्णय होता है। विषम दिशा, विषम स्वर तथा विषम वर्णमें शुभ होता है और सम दिशा आदिमें अशुभ होता है॥ १-३॥

$$\text{चैत्रचक्रम्}$$

$$\begin{array}{ccc}
& \text{क ट न ल अ आ} & \
\begin{array}{c} \text{अं अः ईशान} \ \text{र ध झ कृ. १२।१३ ति.} \end{array} & \begin{array}{c} \text{पूर्व} \ \hline \text{शुक्ल १।१३।१४।१५} \end{array} & \begin{array}{c} \text{अग्नि. शु. प. ७।८ ति.} \ \text{इ ई ख ठ प व} \end{array} \
\
\begin{array}{c} \text{ओ औ} \ \text{य ज द} \quad \text{उत्तर} \ \text{कृ. १०।११ ति.} \end{array} & \begin{array}{|c|} \hline \hspace{10em} \ \phantom{\vdots} \ \phantom{\vdots} \ \hline \end{array} & \begin{array}{c} \text{दक्षिण कृ० १।२ ति.} \ \ \text{उ ऊ ग ड फ श} \end{array} \
\
\begin{array}{c} \text{वायु०} \ \text{ए कृ० ७।९ ति.} \ \text{ह छ थ म} \end{array} & \begin{array}{c} \hline \text{पश्चिम} \ \text{कृ. ५।६ ति.} \ \text{लृ ॡ} \ \text{च. त. भ. स.} \end{array} & \begin{array}{c} \text{नैर्ऋ०} \ \text{कृ. ३।४ ति.} \ \text{ऋ ॠ} \ \text{घ ढ ब ष} \end{array}
\end{array}$$

इस चक्रमें शुक्लपक्षकी १।७।८।१३।१४।१५ ये तिथियाँ ली गयी हैं। कृष्णपक्षमें अष्टमी छोड़कर १।२।३।४।५।६।७।९।१०।११।१२।१३ ये तिथियाँ ली गयी हैं।


* सूर्यके साथ चन्द्रमा जब रहेगा, तब अमावास्या तिथि होगी। सूर्यके नक्षत्रसे पंद्रहवें नक्षत्रमें चन्द्रमा आयेगा तो सूर्यसे सातवीं राशिमें चन्द्रमा रहेगा; क्योंकि सवा दो नक्षत्रकी एक राशि होती है। जब सूर्यसे सातवीं राशिमें चन्द्रमा रहता है, तब पूर्णिमा ही तिथि होती है। उसे ही 'सोमग्राम' कहते हैं।

२८४ * अग्निपुराण *


(अब युद्धमें जय-पराजयका लक्षण बतलाते हैं—) युद्धारम्भके समय सेनापति पहले जिसका नाम लेकर बुलाता है, उस व्यक्तिके नामका आदि-अक्षर यदि 'दीर्घ' हो तो उसकी घोर संग्राममें भी विजय होती है। यदि नामका आदि-वर्ण 'ह्रस्व' हो तो निश्चय ही मृत्यु होती है। जैसे—एक सैनिकका नाम 'आदित्य' और दूसरेका नाम है—'गुरु'। इन दोनोंमें प्रथमके नामके आदिमें 'आ' दीर्घ स्वर है और दूसरेके नामके आदिमें 'उ' ह्रस्व स्वर है; अतः यदि दीर्घ स्वरवाले व्यक्तिको बुलाया जायगा तो विजय और ह्रस्ववालेको बुलानेपर हार तथा मृत्यु होगी॥ ४—७॥

(अब 'नरचक्र' के द्वारा घाताङ्गका निर्णय करते हैं—) नक्षत्र-पिण्डके आधारपर नर-चक्रका वर्णन करता हूँ। पहले एक मनुष्यका आकार बनावे। तत्पश्चात् उसमें नक्षत्रोंका न्यास करे। सूर्यके नक्षत्रसे नामके नक्षत्रतक गिनकर संख्या जान ले। पहले तीनको नरके सिरमें, एक मुखमें, दो नेत्रमें, चार हाथमें, दो कानमें, पाँच हृदयमें और छः पैरोंमें लिखे। फिर नाम-नक्षत्रका स्पष्ट रूपसे चक्रके मध्यमें न्यास करे। इस तरह लिखनेपर नरके नेत्र, सिर, दाहिना कान, दाहिना हाथ, दोनों पैर, हृदय, ग्रीवा, बायाँ हाथ और गुह्याङ्गमेंसे जहाँ शनि, मङ्गल, सूर्य तथा राहुके नक्षत्र पड़ते हों, युद्धमें उसी अङ्गमें घात (चोट) होता है॥ ८—१२॥

नर चक्र

(अब जयचक्रका निर्णय करते हैं—) पूर्वसे पश्चिमतक तेरह रेखाएँ बनाकर पुनः उत्तरसे दक्षिणतक छः तिरछी रेखाएँ खींचे। (इस तरह लिखनेपर जयचक्र बन जायगा।) उसमें अ से ह तक अक्षरोंको लिखे और १०।९।७।१२।४। ११।१५।२४।१८। ४।२७।२४—इन अङ्कोंका भी न्यास करे। अङ्कोंको ऊपर लिखकर अकारादि अक्षरोंको उसके नीचे लिखे। शत्रुके नामाक्षरके स्वर तथा व्यञ्जन वर्णके सामने जो अङ्क हों, उन सबको जोड़कर पिण्ड बनाये। उसमें सातसे भाग देनेपर एक आदि शेषके अनुसार सूर्यादि ग्रहोंका भाग जाने। १ शेषमें सूर्य, २ में चन्द्र, ३ में भौम, ४ में बुध, ५ में गुरु, ६ में शुक्र, ७ में शनिका भाग होता है—यों समझना चाहिये। जब सूर्य, शनि और मङ्गलका भाग आये तो विजय होती है तथा शुभ ग्रहके भागमें संधि होती है॥ १३—१५$\frac{१}{२}$॥

  • अध्याय १३१ * २८५
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प्रथम जयचक्र—

१०९७१२४१११५२४१८४२७२४
अआइईउऊऋॠऌएऐओ
औअंअःकखगघङचछजझ
ञटठडढणतथदधनप
फबभमयरलवशषसह

उदाहरण—जैसे किसीका नाम देवदत्त है, इस नामके अक्षरों तथा ए स्वरके अनुसार अङ्क-क्रमसे १८+४+२४+१८+ १५=७९ (उन्यासी) योग हुआ। इसमें सातका भाग दिया $\frac{\text{७९}}{\text{७}}$ = ११ लब्धि तथा २ शेष हुआ। शेषके अनुसार सूर्यसे गिननेपर चन्द्रका भाग हुआ, अतः संधि होगी। इससे यह निश्चय हुआ कि 'देवदत्त' नामका व्यक्ति संग्राममें कभी पराजित नहीं हो सकता। इसी तरह और नामके अक्षर तथा मात्राके अनुसार जय-पराजयका ज्ञान करना चाहिये।

(अब द्वितीय जयचक्रका निर्णय करते हैं—) पूर्वसे पश्चिमतक बारह रेखाएँ लिखे और छः रेखाएँ याम्योत्तर करके लिखी जायँ। इस तरह यह 'जयचक्र' बन जायगा। उसके सर्वप्रथम ऊपरवाले कोष्ठमें १४। २७। २। १२। १५। ६। ४। ३। १७। ८। ८—इन अङ्कोंको लिखे और कोष्ठोंमें 'अकार' आदि स्वरोंसे लेकर 'ह' तकके अक्षरोंका क्रमशः न्यास करे। तत्पश्चात् नामके अक्षरोंद्वारा बने हुए पिण्डमें आठसे भाग दे तो एक आदि शेषके अनुसार वायस, मण्डल, रासभ, वृषभ, कुञ्जर, सिंह, खर, धूम्र—ये आठ शेषोंके नाम होते हैं। इसमें वायससे प्रबल मण्डल और मण्डलसे प्रबल रासभ—यों उत्तरोत्तर बली जानना चाहिये। संग्राममें यायी तथा स्थायीके नामाक्षरके अनुसार मण्डल बनाकर एक-दूसरेसे बली तथा दुर्बलका ज्ञान करना चाहिये॥ १६-२०॥

द्वितीय जयचक्र—

१४२७२१२१५६४३१७८८
अआइईउऊऋॠऌॡए
ऐओऔकखगघचछजझ
टठडढतथदधनपफ
बभमयरलवशषसह

उदाहरण—जैसे यायी रामचन्द्र तथा स्थायी रावण— इन दोनोंमें कौन बली है—यह जानना है। अतः रामचन्द्रके अक्षर तथा स्वरके अनुसार र्=१५, आ=२७, म्=२, अ=१४, च्=३, अ=१४, न्=१७, द्=४, र्=१५, अ=१४—इनका योग १२५ हुआ। इसमें ८ का भाग दिया तो शेष ५ रहा। तथा रावणके अक्षर और स्वरके अनुसार र्=१५, आ=२७, व्=४, अ=१४, ण्=१७, अ=१४—इनका योग हुआ ९१। इसमें ८ से भाग देनेपर ३ शेष हुआ। ३ शेषसे ५ बली है, अतः रामचन्द्र-रावणके संग्राममें रामचन्द्र ही बली हो रहे हैं।

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'घातचक्रोंका वर्णन' नामक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३१॥

२८६ * अग्निपुराण *


एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय

सेवाचक्र आदिका निरूपण

शंकरजी कहते हैं— अब मैं ‘सेवाचक्र’ का प्रतिपादन कर रहा हूँ, जिससे सेवकको सेव्यसे लाभ तथा हानिका ज्ञान होता है। पिता, माता तथा भाई एवं स्त्री-पुरुष—इन लोगोंके लिये इसका विचार विशेषरूपसे करना चाहिये। कोई भी व्यक्ति पूर्वोक्त व्यक्तियोंमेंसे किससे लाभ प्राप्त कर सकेगा—इसका ज्ञान वह उस ‘सेवाचक्र’ से कर सकता है॥ १-२॥

(सेवाचक्रका स्वरूप वर्णन करते हैं—) पूर्वसे पश्चिमको छः रेखाएँ और उत्तरसे दक्षिणको आठ तिरछी रेखाएँ खींचे। इस तरह लिखनेपर पैंतीस कोष्ठका ‘सेवाचक्र’ बन जायगा। उसमें ऊपरके कोष्ठोंमें पाँच स्वरोंको लिखकर पुनः स्पर्श-वर्णोंको लिखे। अर्थात् ‘क’ से लेकर ‘ह’ तकके वर्णोंका न्यास करे। उसमें तीन वर्णों (ङ, ञ, ण)-को छोड़कर लिखे। नीचेवाले कोष्ठोंमें क्रमसे सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध, शत्रु तथा मृत्यु—इनको लिखे। इस तरह लिखनेपर सेवाचक्र सर्वाङ्गसम्पन्न हो जाता है। इस चक्रमें शत्रु तथा मृत्यु नामके कोष्ठमें जो स्वर तथा अक्षर हैं, उनका प्रत्येक कार्यमें त्याग कर देना चाहिये। किंतु सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध, शत्रु तथा मृत्यु नामवाले कोष्ठोंमेंसे किसी एक ही कोष्ठमें यदि सेव्य तथा सेवकके नामका आदि-अक्षर पड़े तो वह सर्वथा शुभ है। इसमें द्वितीय कोष्ठ पोषक है, तृतीय कोष्ठ धनदायक है, चौथा कोष्ठ आत्मनाशक है, पाँचवाँ कोष्ठ मृत्यु देनेवाला है। इस चक्रसे मित्र, नौकर एवं बान्धवसे लाभकी प्राप्तिके लिये विचार करना चाहिये। अर्थात् हम किससे मित्रताका व्यवहार करें कि मुझे उससे लाभ हो तथा किसको नौकर रखें, जिससे लाभ हो एवं परिवारके किस व्यक्तिसे मुझे लाभ होगा—इसका विचार इस चक्रसे करे। जैसे—अपने नामका आदि-अक्षर तथा विचारणीय व्यक्तिके नामका आदि-अक्षर सेवाचक्रके किसी एक ही कोष्ठमें पड़ जाय तो वह शुभ है, अर्थात् उस व्यक्तिसे लाभ होगा—यह जाने। यदि पहलेवाले तीन कोष्ठोंमेंसे किसी एकमें अपने नामका आदि-वर्ण पहलेवाले तीन कोष्ठों (सि०, सा०, सु०) मेंसे किसी एकमें पड़े और विचारणीय व्यक्तिके नामका आदि-अक्षर चौथे तथा पाँचवें पड़े तो अशुभ होता है। चौथे तथा पाँचवें कोष्ठोंमें किसी एकमें सेव्यके तथा दूसरेमें सेवकके नामका आदि-वर्ण पड़े तो अशुभ ही होता है॥ ३-८½॥

सेवाचक्रका स्वरूप—

अइउएओ
कखगघच
छजझटठ
डढतथद
धनपफब
भमयरल
वशषसह
सिद्धसाध्यसुसिद्धशत्रुमृत्यु
१२३४५

अब अकारादि वर्गों तथा ताराओंके द्वारा सेव्य-सेवकका विचार कर रहे हैं—अवर्ग (अ इ उ ए ओ)-का स्वामी देवता है, कवर्ग (क ख ग घ ङ)-का स्वामी दैत्य है, चवर्ग (च छ ज झ ञ)-का स्वामी नाग है, टवर्ग (ट ठ ड ढ ण)-का स्वामी गन्धर्व है, तवर्ग (त थ द ध न)-का स्वामी ऋषि है, पवर्ग (प फ ब भ म)-का स्वामी राक्षस है, यवर्ग (य र ल व)-का स्वामी पिशाच है, शवर्ग (श ष स ह)-का स्वामी मनुष्य है। इनमें देवतासे बली दैत्य है, दैत्यसे बली सर्प है, सर्पसे बली गन्धर्व है,