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सर्वकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 312
  • अध्याय १३१ * २८५
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प्रथम जयचक्र—

१०९७१२४१११५२४१८४२७२४
अआइईउऊऋॠऌएऐओ
औअंअःकखगघङचछजझ
ञटठडढणतथदधनप
फबभमयरलवशषसह

उदाहरण—जैसे किसीका नाम देवदत्त है, इस नामके अक्षरों तथा ए स्वरके अनुसार अङ्क-क्रमसे १८+४+२४+१८+ १५=७९ (उन्यासी) योग हुआ। इसमें सातका भाग दिया $\frac{\text{७९}}{\text{७}}$ = ११ लब्धि तथा २ शेष हुआ। शेषके अनुसार सूर्यसे गिननेपर चन्द्रका भाग हुआ, अतः संधि होगी। इससे यह निश्चय हुआ कि 'देवदत्त' नामका व्यक्ति संग्राममें कभी पराजित नहीं हो सकता। इसी तरह और नामके अक्षर तथा मात्राके अनुसार जय-पराजयका ज्ञान करना चाहिये।

(अब द्वितीय जयचक्रका निर्णय करते हैं—) पूर्वसे पश्चिमतक बारह रेखाएँ लिखे और छः रेखाएँ याम्योत्तर करके लिखी जायँ। इस तरह यह 'जयचक्र' बन जायगा। उसके सर्वप्रथम ऊपरवाले कोष्ठमें १४। २७। २। १२। १५। ६। ४। ३। १७। ८। ८—इन अङ्कोंको लिखे और कोष्ठोंमें 'अकार' आदि स्वरोंसे लेकर 'ह' तकके अक्षरोंका क्रमशः न्यास करे। तत्पश्चात् नामके अक्षरोंद्वारा बने हुए पिण्डमें आठसे भाग दे तो एक आदि शेषके अनुसार वायस, मण्डल, रासभ, वृषभ, कुञ्जर, सिंह, खर, धूम्र—ये आठ शेषोंके नाम होते हैं। इसमें वायससे प्रबल मण्डल और मण्डलसे प्रबल रासभ—यों उत्तरोत्तर बली जानना चाहिये। संग्राममें यायी तथा स्थायीके नामाक्षरके अनुसार मण्डल बनाकर एक-दूसरेसे बली तथा दुर्बलका ज्ञान करना चाहिये॥ १६-२०॥

द्वितीय जयचक्र—

१४२७२१२१५६४३१७८८
अआइईउऊऋॠऌॡए
ऐओऔकखगघचछजझ
टठडढतथदधनपफ
बभमयरलवशषसह

उदाहरण—जैसे यायी रामचन्द्र तथा स्थायी रावण— इन दोनोंमें कौन बली है—यह जानना है। अतः रामचन्द्रके अक्षर तथा स्वरके अनुसार र्=१५, आ=२७, म्=२, अ=१४, च्=३, अ=१४, न्=१७, द्=४, र्=१५, अ=१४—इनका योग १२५ हुआ। इसमें ८ का भाग दिया तो शेष ५ रहा। तथा रावणके अक्षर और स्वरके अनुसार र्=१५, आ=२७, व्=४, अ=१४, ण्=१७, अ=१४—इनका योग हुआ ९१। इसमें ८ से भाग देनेपर ३ शेष हुआ। ३ शेषसे ५ बली है, अतः रामचन्द्र-रावणके संग्राममें रामचन्द्र ही बली हो रहे हैं।

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'घातचक्रोंका वर्णन' नामक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३१॥