अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
एकत्रिंशोऽध्यायः (225)
रामपादाब्जसेवार्थं कृतद्वारमथ स्मरन् ।।10।।
जपन्नयुतमेकान्ते महारोगान् बहून्यपि।
क्षयापस्मारकुष्ठादीन्नाशयत्येव तत्क्षणात् ।।11।।
श्रीराम के चरणकमल की सेवा करने के लिए द्वार बनाकर अवस्थित श्री
लक्ष्मण का ध्यान करते हुए एकान्त में जप करते हुए साधक अनेक महारोगों को
जीत लेते हैं।
त्रिमासं नियताहारो जपेत् सप्तसहस्रकम्।
दिने दिने विधानेन युगपद् विजितेन्द्रियः ।।12।।
अष्टोत्तरशतैः पुष्पैः निश्छिद्रैः शतपत्रकैः।
पायसं शर्करोपेतं नैवेद्यं विधिवन्मुने।।13।।
घनसारसमायुक्तं चन्दनेनावलिप्य च।
देवोद्देशेन नित्यं च सम्पूज्यैव द्विजोत्तम ।।14।।
कुष्ठरोगात् प्रमुच्येत दुःचिकित्स्यादनेकंशः।
दुर्दोषाजा बहुविधा मण्डलादिप्रभेदतः ।।15।।
ते सर्वे नाशमायान्ति दुःचिकित्स्या अपि क्षणे।
तीन मास तक संयमित भोजन करते हुए प्रतिदिन सात हजार जप
विधानपूर्वक कर के साथ साथ छिद्र रहित एक सौ आठ कमल के फूलों से तथा
शक्कर के साथ पायस (खीर) नैवेद्य समर्पित कर, कर्पूर के साथ चन्दन से देवता
का लेपन कर प्रतिदिन पूजा करके साधक कुष्ठ रोग से मुक्त हो जाता है। अन्य
अनेक असाध्य रोग, मण्डल आदि अनेक प्रकार के रोग जो बुरे दोषों से उत्पन्न
होते हैं वे सभी क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं।
एकान्ते नियताहारः षण्मासान् विजितेन्द्रियः ।।16।।
जपन्नेवं विधानेन क्षयरोगात्प्रमुच्यते।
एकान्त में संयमित आहार लेकर छह मास तक इन्द्रियों को वश में कर के
इस प्रकार जप करते हुए क्षय रोग से मुक्ति मिलती है।
मासं पूपादिनैवेद्यैः जपन्मन्त्रं समाहितः ।।17।।
वातरोगात्प्रमुच्येत बहुभेदादपि क्षणात्।
(226) अगस्त्य-संहिता
एक मास तक पुआ आदि नैवेद्य समर्पित करते हुए एकाग्र होकर जप करने
से अनेक प्रकार के बात रोगों से क्षण भर में मुक्ति मिल जाती है।
अभिमन्त्र्य जलं नित्यं मन्त्रेण त्रिः समाहितः ।।18।।
पीत्वा सन्ध्यासु भक्त्या वै मुच्यते सर्वरोगतः।
दारिद्र्यं नाशयित्वा तु श्रियमाप्नोति सुव्रत ।।19।।
मूल मन्त्र से अभिमन्त्रित कर प्रतिदिन तीन बार ध्यानस्थ होकर तीनों
सन्ध्याओं में भक्तिपूर्वक पीने से सभी रोगों से मुक्ति मिल जाती है। वह अपनी
दरिद्रता का नाश कर लक्ष्मी प्राप्त करता है।
विषादिदोषसंस्पर्शो न भवेच्च कदाचन।
प्रक्षाल्यैवं प्रतिदिनं मुखं भक्त्या समाहितः ।।20।।
मुखनेत्रादिसम्भूतान् जयेद्रोगान् सुदारुणान्।
पीत्वाभिमन्त्रितं वारि कुक्षिरोगान् जयेद् बहून् ।।21।।
उसे विष आदि दोषों का स्पर्श भी नहीं होता। इस अभिमन्त्रित जल से जो
प्रतिदिन भक्तिपूर्वक अपने मुख का प्रक्षालन करते हैं, वे मुख। नेत्र आदि के
अनेक रोगों की जीत लेते हैं और उस अभिमन्त्रित जल को पीकर कोख सम्बन्धी
रोगों को जीत लेते हैं।
देवस्य प्रतिमादानं कृत्वा भक्त्या विधानतः।
सर्वेभ्योप्यथ रोगेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ।।22।।
भक्तिपूर्वक तथा विधानों के साथ देवता की प्रतिमा का दान करनेवाले
सभी रोगों से मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं।
कन्यार्थी चोर्मिलापाणिग्रहणासक्तमानसम्।
लक्ष्मणमनुर्जप्त्वा हुत्वा लाजैर्दशांशकम् ।।23।।
ईप्सितां प्राप्नुयात् कन्यां शीघ्रमेव तपोधन।
पत्नी की इच्छा रखनेवाले साधक उर्मिला का पाणिग्रहण करने के लिए
आसक्त चित्त वाले लक्ष्मण का ध्यान कर धान के खील (लाबा) से उसका दशांश
हवन कर शीघ्र ही अभीष्ट पत्नी को प्राप्त करते हैं।
एकत्रिंशोऽध्यायः (227)
दीक्षितं स्तम्भनास्त्राणां१ मन्त्रेषु नियतव्रतः ।।२४।।
संस्मरन् विधिवन्नित्यं मासत्रयममन्यधीः।
पूजापुरस्सरं सप्तसहस्त्रं विजितेन्द्रियः ।।२५।।
जपन्नखिलविद्यानां तत्त्वज्ञो भवति ध्रुवम्।
'स्तम्भन' नामक अस्त्र के सन्धान में दीक्षित श्रीराम का स्मरण करते हुए
नियमपूर्वक, जितेन्द्रिय होकर तीन मास तक पूजन करते हुए मन्त्र का सात हजार
जप करता हुआ साधक सभी विद्याओं का तत्त्वज्ञ बन जाता है।
विश्वामित्रक्रतुवरे कृताद्भुतपराक्रमम् ।।२६।।
ध्यायन्नयुतजापेन भयेभ्यो मुच्यतेऽचिरात् ।
सन्ध्यां चोपास्य विधिवन्मूलमन्त्रेण मन्त्रवित् ।।२७।।
त्रिकालं नियतो भूत्वा कृतनित्यविधिः स्वयं।
दीक्षायुतो यथान्यायं गुर्वनुज्ञापुरस्सरम् ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो याति विष्णोः परं पदम् ।।२८।।
विश्वामित्र मुनि के विशाल यज्ञ में अद्भुत पराक्रम दिखानेवाले श्रीराम का
ध्यान करते हुए दस हजार जप करने से सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाते हैं।
विधान पूर्वक मूलमन्त्र से तीनों समयों में सन्ध्यावन्दन कर मन्त्रज्ञानी नित्यकर्मों
को सम्पन्न कर गुरु की आज्ञा से जप करते हुए सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं तथा
विष्णु के परम स्थान को प्राप्त करते हैं।
ऐहिकाननपेक्ष्यैव निष्कामो योऽर्चयेद्धरिम्।
दीक्षां प्राप्य विधानेन गुरोर्विगतकल्मषात् ।।२९।।
आचारनियताद् गृहस्थाद् विजितेन्द्रियात् ।
तदनुज्ञानमात्रेण पुरश्चर्यां यथाविधिः ।।३०।।
स सर्वान् पुण्यपापौघान् जित्वा निर्मलमानसः ।
पुनरावृत्तिरहितं शाश्वतं पदमवाप्नुयात् ।।३१।।
जो अपने आचार में दृढ़, जितेन्द्रिय, निष्पाप गृहस्थ गुरु से दीक्षा प्राप्त
कर उनकी आज्ञा से सांसारिक विषयों की कामना न करते हुए हरि की अर्चना
करते हैं और विधि के अनुसार पुरश्चरण करते हैं, वे सभी पुण्यों और पापों के
समूह को जीतकर निर्मल मन से पुनर्जन्म से रहित शाश्वत स्थान को प्राप्त करते हैं।
- घ. जृम्भणास्त्राणां।
(228) अगस्त्य-संहिता
सकामो वाञ्छितान् लब्ध्वा भुक्तभोगान् मनोहरान्।
जातिस्मरश्चिरं भूत्वा याति विष्णोः परं पदम्।।32।।
किन्तु सकाम साधक इस संसार में सभी सुन्दर भोगों को प्राप्त कर अपने
जन्म को स्मरण करते हुए विष्णु के परम स्थान को प्राप्त करते हैं।
यथा श्रीराममन्त्राणां प्रयोक्तुः पापसम्भवः।
तथा न लक्ष्मणमनोः किन्तु यान्ति परां गतिम्।।33।।
जिस प्रकार सांसारिक कामना के लिए श्रीराम के मन्त्र का प्रयोग करनेवाले
को पाप की सम्भावना हो सकती है, उस प्रकार लक्ष्मण के मन्त्र में पाप की
सम्भावना नहीं है, किन्तु वे परम गति को प्राप्त करते हैं।
मन्त्रोऽयं ब्रह्मणा पूर्वं तुष्टेन तपसा चिरम्।
सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे मह्यं दत्तो हि सादरम्।।34।।
प्राचीन समय में ब्रह्मा ने मेरी तपस्या से सन्तुष्ट होकर कुरुक्षेत्र में
सूर्यग्रहण के समय यह मन्त्र मुझे दिया था।
मयाप्युपासितोऽयं वै भक्तियुक्तेन चेतसा।
गुरुभक्तिं समालोक्य मामेवास्याकरोदृषिम्।।35।।
प्रकाशितो मयाप्यस्मिंल्लोके गुर्वाज्ञया पुनः।
मैंने भी भक्तियुक्त मन से इस मन्त्र की उपासना की। तब मेरी गुरु
भक्ति से सन्तुष्ट होकर उन्होंने इस मन्त्र का ऋषि मुझे ही बना दिया। फिर मैंने
गुरु की आज्ञा से इसे लोक में प्रकाशित किया।
उपास्य बहवो लोके मनुमेतदनेकशः।।36।।
संप्राप्य वाञ्छितार्थानगमद्धाम वैष्णवम्।
अनेन सदृशो मन्त्रो मया दृष्टो न कुत्रचित्।।37।।
इस मन्त्र की उपासना कर अनेक लोग इच्छित सांसारिक कामनाओं को
प्राप्त कर विष्णु के परम धाम को प्राप्त कर चुके हैं। इसके समान मन्त्र मैंने दूसरा
कही नहीं देखा।
शैववैष्णवसौरेषु गाणत्येषु वा मुने।
केचिन्मुक्त्यर्थमेव स्युः केचिदैहिकसाधनाः।।38।।
भुक्तिमुक्तिकरश्चायमेको विजयते परम्।।39।।
द्वात्रिंशोऽध्यायः (229)
शैव, वैष्णव, सौर और गाणपत्य मन्त्रों में से कुछ केवल मुक्ति देनेवाले हैं
तथा कुछ केवल सांसारिक कामनाओं के साधक हैं, किन्तु यह मन्त्र भोग और
मोक्ष दोनों प्रदान करनेवाला है, अतः यह परम जयशील श्रेष्ठ है।
इत्यस्त्यसंहितायां परमरहस्ये लक्ष्मणादिमन्त्रकथनं नाम
एकत्रिशोऽध्यायः ।। 31 ।।
द्वात्रिंशोऽध्यायः
सुतीक्ष्ण उवाच
सर्ववेदार्थतत्त्वज्ञो ननु निश्चलमानसः।
सम्यक् संशिक्षितश्चाहं बहुनापि कृपानिधे ।। 1 ।।
त्वया कारुण्यनिधिना पूर्वमज्ञास्तथा जहुः।
त्वत्प्रसादेन संजातं ज्ञानं विगतकल्मषम् ।। 2 ।।
हे करुणा के सागर! मुनि अगस्त्य! प्राचीन काल में आपकी सहायता से
लोगों ने अपने अज्ञान को त्याग दिया था, वह निष्कलुष ज्ञान आपकी कृपा से
आज प्रकट हुआ।
रामात्मनि परं ब्रह्मण्यासक्तमनसं च माम्।
लक्ष्मणे हि तथा रामे किञ्चिद् भेदोऽस्ति नैव हि ।। 3 ।।
श्रीराम के स्वरूप परम ब्रह्म मैं आसक्त हूँ, किन्तु अब ज्ञात हुआ कि
लक्ष्मण और श्रीराम में किंचिद् भेद नहीं है।
हनुमन्मन्त्र इत्युक्तस्त्वया वै मुनिपुङ्गव ।
तस्यानुष्ठानमेवाहं ज्ञातुमिच्छामि तन्त्रभो ।। 4 ।।
त्वयि प्रसन्ने सकलमाचक्ष्वाशु दयानिधे।
आपने हनुमान् का जो मन्त्र कहा, उसकी अनुष्ठान-विधि मैं जानना
चाहता हूँ। जब आप प्रसन्न हों, तब मुझे यह सबकुछ बतलायें।
अगस्त्य उवाच
स्मारितः सम्यगेवाहं त्वया श्रद्धावता मुने ।। 5 ।।
आञ्जनेयमनुल्लोके भुक्तिमुक्त्यैकसाधनम्।
Rarest Archiver
(230) अगस्त्य-संहिता
प्रकाशितं शङ्करेण लोकानां हितमिच्छता ।।6।।
भूतप्रेतपिशाचादिडाकिनीयक्षराक्षसाः ।
दृष्ट्वा च प्रपलायन्ते मन्त्रानुष्ठानतत्परम् ।।7।।
अगस्त्य बोले- हे मुनि सुतीक्ष्ण! आप तो श्रद्धा से भरे हुए हैं। आपने ठीक
ही याद दिलाया कि हनुमान् का मन्त्र इस संसार में भोग और मोक्ष दोनों का
अचूक साधन है। संसार का भला चाहनेवाले भगवान् शंकर के द्वारा यह मन्त्र
प्रकट किया गया है। मन्त्र के अनुष्ठान में लगे साधक को देखते ही भूत, प्रेत,
पिशाच, डाकिनी, यक्ष और राक्षस सब भाग जाते हैं।
ऋषिरीश्वर एव स्यादनुष्टुप् छन्द उच्यते।
हनुमान् देवता प्रोक्तो हं बीजं शक्तिरंतजौ ।।8।।
कीलकं हात्रयं प्रोक्तं वेधकं तु हसौ पुनः।
हनुमत्प्रीणनं चैव फलमाद्यमुदीरितम् ।।9।।
सर्वेप्सितानां दातृत्वमस्यैवास्ति न चान्यतः।
इस मन्त्र के ऋषि स्वयं ईश्वर शिव हैं, छन्द अनुष्टुप् है, हनुमान् देवता कहे
गये हैं, ‘हं’ यह बीज है और अन्त के दो बीजवर्ण शक्ति हैं। तीन बार ‘हा’ का
उच्चारण कीलक है ‘हसौ’ वेधक है। हनुमान् की प्रीति इस मन्त्र का मुख्य फल है।
सभी कामनाओं की पूर्ति की शक्ति इसी मन्त्र में है, दूसरे मन्त्र से नहीं होती है।
प्रणवं पूर्वमुच्चार्य नमो भगवते पदम्।
ङेन्तं प्रकटसंयुक्तं पराक्रमपदं ततः ।।10।।
तदाक्रान्तपदोपेतं दिङ्मण्डलमुदीरयेत्।
यशोवितानधवलीकृतजगत्त्रितयाय च ।।11 ।।
वज्रदेहेति चोक्त्वा हं रुद्रावतारपदं तथा।
संबुद्ध्यन्तं पदं लङ्कापुरी दहनमीरयेत् ।।12 ।।
उदधिर्ल्लङ्घनं चापि दशग्रीवकृतान्तकः।
सीताश्वासनेतिपदमञ्जनीगर्भसम्भव ।।13।।
श्रीरामलक्ष्मणानन्दकारिन् कपिसैन्यप्राकारक।
सुग्रीवसन्नद्धपदं पर्वतोत्पाटनं तथा।।14।।
बालब्रह्मचारिन्निति गम्भीरशब्दपदं तथा।
सर्वग्रहविनाशनसर्वज्वरहरं तथा।।15।।
द्वात्रिंशोऽध्यायः (231)
डाकिनीविध्वंसनपदं स्ततस्तारमुदीरयेत्।
भयहात्रयमुच्चार्य हसावेहि वदत्ततः।।16।।
सर्वविषं हर परबलं क्षोभय द्विरुच्चरेत्।
सर्वकार्याणि साधयेति तथैवात्र द्विरुच्चरेत्।।17।।
हुं फट् स्वाहेति मन्त्रोऽयं मालाख्यः सर्वकामधुक्।
पहले प्रणव (ॐ) का उच्चारण कर 'नमो भगवते' यह पद जोड़ें।
चतुर्थ्यन्त 'प्रकट' सहित 'पराक्रम' (प्रकटपराक्रमाय) पद जोड़े। तब 'आक्रान्त'
पद के साथ 'दिङ्मण्डल' यह पद भी जोड़े। तब 'यशोवितानधवलीकृतजगत्त्रितयाय'
यह कहें। 'वज्रदेह' ऐसा कहकर 'हं' और 'रुद्रावतार' भी चतुर्थ्यन्त पद के रूप में
कहें। इसके बाद सम्बोधनान्त पद 'लंकापुरीदहन' का उच्चारण करें। तब
'उदधिल्लङ्घन', दशग्रीवकृतान्तक! सीताश्वासन! अञ्जनीगर्भसम्भव!
श्रीरामलक्ष्मणानन्दकारिन्! कपिसैन्यप्राकारक! 'सुग्रीवसन्नद्ध', 'पर्वतोत्पाटन',
'बालब्रह्मचारिन्', 'गम्भीरशब्द' 'सर्वग्रहविनाशन', 'सर्वज्वरहर' एवं 'डाकिनीविध्वंसन'
पद बोलकर तार (ॐ) का उच्चारण करें। इसके बाद तीन बार 'भयहा' बोलकर
'हसौ' बोलें। तब 'सर्वविषं हर' 'परबलं' कहकर 'क्षोभय' यह दो बार कहें।
सर्वकार्याणि के बाद 'साधय' भी दो बार बोलें। इसके बाद 'हुं फट् स्वाहा' यह
बोलें।
ॐ नमो भगवते प्रकटपराक्रमाय आक्रान्तदिङ्मण्डलाय यशोवितान-
धवलीकृतजगत्त्रितयाय वज्रदेहाय हं रुद्रावताराय लङ्कापुरीदहन! उदधिल्लङ्घन!
दशग्रीवकृतान्तक! सीताश्वासन! अञ्जनीगर्भसम्भव! श्रीरामलक्ष्मणानन्दकारिन्!
कपिसैन्यप्राकारक! सुग्रीवसन्नद्ध! पर्वतोत्पाटन! बालब्रह्मचारिन्! गम्भीरशब्द!
सर्वग्रहविनाशन! सर्वज्वरहर! डाकिनीविध्वंसन! ॐ भयहा! भयहा! भयहा! हसौ एहि
सर्वविषं हर परबलं क्षोभय क्षोभय सर्वकार्याणि साधय साधय हुं फट् स्वाहा। यह
मन्त्र सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है।
ॐ नमो भगवते चाञ्जनेयायेत्यङ्गुष्ठाभ्यामुदीरितः।।18।।
रुद्रमूर्त्तय इत्येवं तर्जनीभ्यामनन्तरम्।
वायुसुतायापि तथा मध्यमाभ्यामपि स्फुटम्।।19।।
अग्निगर्भाय च तथानामिकाभ्यां प्रविन्यसेत्।
रामदूताय च पुनः कनिष्ठिकाभ्यां विचक्षणः।।20।।
(232) अगस्त्य-संहिता
ब्रह्मास्त्रनिवारणाय चास्त्रमन्त्रसमीरितः।
षडङ्गं च मुने कृत्वा ध्यायेद्देवमनन्यधीः॥२१॥
अब करन्यास कहते हैं। 'ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय' इससे दोनों हाथों
के अंगूठे में न्यास कहा गया है। 'रुद्रमूर्तये' इससे दोनों तर्जनी में न्यास करें।
'वायुसुताय' इसका दोनों मध्यमा में स्पष्ट रूप से न्यास करें। 'अग्निगर्भाय' इससे
दोनों अनामिका में न्यास करें। तब 'रामदूताय' से दोनों कनिष्ठिका में न्यास
करें। 'ब्रह्मास्त्रनिवारणाय' यह अस्त्रमन्त्र कहा गया है। इस प्रकार षडंगन्यास कर
एकाग्र होकर भगवान् हनुमान् का ध्यान करें।
ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय इत्यङ्गुष्ठाभ्याम्।
ॐ नमो भगवते रुद्रमूर्त्तये इति तर्जनीभ्याम्।
ॐ नमो भगवते वायुसुताय इति मध्यमाभ्याम्।
ॐ नमो भगवते अग्निगर्भाय इत्यनामिकाभ्याम्
ॐ नमो भगवते रामदूताय इति कनिष्ठिकाभ्याम्
ॐ नमो भगवते ब्रह्मास्त्रनिवारणाय हुं अस्त्राय फट्।
स्फटिकाभं स्वर्णकान्तिं द्विभुजं च कृताञ्जलिम्।
कुण्डलद्वयसंशोभिमुखाम्भोजं मुहुर्मुहुः ।। २२ ।।
स्फटिक के समान चमकते हुए, स्वर्ण के समान कान्तिवाले, दो भुजाओं
वाले, अंजलि बाँधे हुए, दो कुण्डलों से शोभित मुखकमल वाले हनुमान् का ध्यान
बार बार करता हूँ।
अयुतं च पुरश्चर्या रामस्याग्रे शिवस्य वा।
पूजां तु वैष्णवे पीठे शैवे वा विदधीत वै ।। २३ ।
हनुमान् का पुरश्चरण श्रीराम के आगे या शिव के आगे दस हजार मन्त्रों
का होता है। पूजा वैष्णव या शैव पीठ पर करें।
अवृत्तिभिर्विना नित्यं नक्ताशी विजितेन्द्रियः।
क्षुद्ररोगनिवृत्त्यर्थमष्टोत्तरशतं जपेत् ।। २४ ।।
जप्त्वा त्रिदिनमेकान्ते तेभ्यो मुच्येत तत्क्षणात्।
निराहार न रहकर प्रतिदिन केवल रात्रि में भोजन कर जितेन्द्रिय होकर
छोटे छोटे रोगों से छुटकारा पाने के लिए एक सौ आठ बार जप करें। इस प्रकार
एकान्त में तीन दिन जप करने से उन रोगों से तत्क्षण मुक्ति मिल जाती है।
द्वातृंशोऽध्यायः (233)
क्षुद्रभूतेऽपि शान्त्यर्थमष्टोत्तरशतं जपेत्।।25।।
दिनत्रयमथो जप्त्वा भूतानां मुच्यते भयात्।
छोटे-छोटे भूत-प्रेतों का प्रकोप होने पर शान्ति के लिए एक सौ आठ जप
करें। तीन दिनों तक इस प्रकार जप कर भूतों-प्रेतों के भय से मुक्त हो जाता है।
भूतप्रेतपिशाचादि शान्तयेष्टोत्तरं शतम्।।26।।
प्रजप्वैतद्भयान्मुक्तो भवेदेव न संशयः।
भूत, प्रेत, पिशाच आदि की शान्ति के लिए एक सौ आठ जप कर उनके
भय से मुक्त हो ही जाता है, इसमें सन्देह नहीं।
महारोगादिशान्त्यर्थमष्टोत्तरसहस्रकम् ।।27।।
जप्त्वा तस्मात् प्रमुच्येत निश्चितं नियताशनः।
महान् रोग आदि की शान्ति के लिए एक हजार आठ बार संयमित भोजन
करते हुए जप कर उन रोगादि से निश्चित रूप से मुक्त हो जाता है।
जयाभिकांक्षिणां राज्ञामस्मादन्यो न विद्यते।।28।।
ध्यायन् राक्षसहन्तारमयुतं नियतात्मना।
जपनियमवाँश्चैव जयेद् दुर्जयमप्यरीन्।।29।।
युद्ध में जीतने की अभिलाषा रखनेवाले राजाओं के लिए इससे भिन्न कुछ
भी नहीं है। चित्त एकाग्र कर राक्षसों का वध करनेवाले हनुमान् का ध्यान करते
हुए विधिपूर्वक जप करनेवाले साधक दुर्जय शत्रुओं को भी जीत लेते हैं।
सन्धानाय तु सुग्रीवं संतारं संस्मरन्नपि।
अयुतेनैव बलिना संधिमाप्नोत्यसंशयः।।30।।
मैत्री के लिए विशालकाय सुग्रीव को भी हनुमान् के साथ स्मरण करते हुए
दस हजार जप करने से बलवान् व्यक्ति के साथ मैत्री हो जाती है, इसमें सन्देह नहीं।
लंकाया दाहकं ध्यात्वा जपेदयुतमञ्जसा।
शत्रुराष्ट्रं दहेदेव दुग्धाब्धिमपि चानघ।।31।।
जयार्थी रिपुसंघानामस्मादन्यो न विद्यते।
लंका को जलानेवाले हनुमान् का ध्यान कर दस हजार की संख्या के
परिमाण में जप करने से शत्रु के राष्ट्र को तो जला ही देता है बल्कि क्षीर-समुद्र
को भी जला डालता है। इस प्रकार विजय प्राप्ति की कामना रखनेवाले जप करें।
इसके अतिरिक्त दूसरा साधन नहीं है।
- ग. आवृतीभिर्विना।
(234) अगस्त्य-संहिता
यस्तु गेहे हनूमन्तं सर्वदैव प्रपूजयेत्।।३२।।
अर्चयेतेन मन्त्रेण तस्य लक्ष्मीरचंचला।
दीर्घमायुर्ल्लभेदेव सर्वतो विजयी भवेत्।।३३।।
मायादिभूतसंक्षोभस्तस्य देशे न जायते।
नान्यत्साधनमस्त्येव मन्त्रात्तस्माद्धनूमतः।।३४।।
चौरादिव्याधिभूतानामयमेव परायणम्।
परापहृतराज्यानां¹ घर्षितानां परैः पुनः।।३५।।
सन्नाहभाजां युद्धेषु बद्धानां परसैनिकैः।
शत्रवः सर्वदा मित्रभावेनैवासते सदा।।३६।।
जो अपने घर में इस मन्त्र से प्रतिदिन हनुमान् की पूजा करते हैं उसके घर
लक्ष्मी स्थिर होकर रहती है। वह दीर्घायु तो होता ही है, सभी जगत उसकी जीत
होती है। माया आदि तथा भूतों का प्रकोप और कफ, पित्त और वायु का दोष
नहीं होता। हनुमान् के उस मन्त्र को छोड़कर उनके लिए दूसरा साधन है ही
नहीं। चोर, मानसिक सन्ताप, व्याधि और भूतों का भी यहीं पलायनु है। दूसरे ने
जिनका राज्य छीन लिया हो या दूसरे ने कुचल डाला हो या जो कवच पहनकर
युद्धों में लड़ रहे हों या शत्रु के सैनिकों ने पकड़ लिया हो ऐसे संकट में पड़े लोगों
के शत्रु हमेशा मित्र की भाँति व्यवहार करने लगते हैं।
शैवानां वैष्णवानां वै षट्कर्मार्त्र प्रदर्शितम् ।।²
वैष्णवों एवं शैवों के लिए यहाँ केवल छह कर्म प्रदर्शित किए गये हैं।
यात्राकाले हनूमन्तं स्मरन् यस्तु स्वकाद् गृहात्।।३७।।
निर्गच्छति स वेगेन इष्टार्थमपि गच्छति।
यात्रा के समय जो हनुमान् का स्मरण कर अपने घर से निकलते हैं, वे
शीघ्र ही अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँचते हैं।
स्वापकाले स्मरन्नित्यं चौरभूतादिकं जपेत्।।३८।।
यद्वयं वासुदेवाय हनूमन्तपदन्ततः।
फलेति च फलि पदं धगेति धगितेति च।।३९।।
आयुरा ख फ डा डे हि सद्यः प्रत्ययकारकः।
चतुर्विंशत्यक्षरकोऽमोघमन्त्रोऽयं प्लीहरोगनुत्।।४०।।
- ग. पगपद्रतराज्यानां। 2. बंगाल की प्रति में इसी स्थल पर ग्रन्थ की समाप्ति हो
जाती है।
५. पञ्चरात्र सिद्धान्त, ज्ञान-योग व उपसंहार
द्वातत्रिंशोऽध्यायः (235)
नागवल्लीदलं चैवमष्टप्रगुणितं शुभम्।
वंशजं सकलं स्थाप्य क्रमात् प्लीहोदरोपरि।।41।।
जप्त्वारण्योपलाग्नौ च दर्भमुष्टिं प्रजापयेत्।
मन्त्रेणानेनाभिमन्त्र्य सप्तवारं तथा पुनः।।42।।
तथाभिमन्त्रयेदेवं सप्तभिस्तु विचक्षणः।
स्फोटद्वारा भवेत् प्लीहो भस्मीभूतो न संशयः।।43।।
सोते समय नित्य हनुमान् का ध्यान करते हुए चौरभूतादि मन्त्र का जप
करें। ‘वासुदेवाय हनूमते फल फलि धग धगि आयुराखफडाडे’ इस चौबीस अक्षरों
के इस मन्त्र के जप से प्लीहा से ग्रस्त उदर पर रखकर बाँस का पत्ता उसपर क्रम
से रखकर जंगली पत्थर से उत्पन्न आग जलाकर एक मूँठ कुश को इस मन्त्र से
सात बार गर्म करें और उससे पेट पर सात बार अभिमन्त्रित करें। इससे फोड़ा
बनकर प्लीहा भस्म हो जाएगा। इसमें सन्देह नहीं।
तारं हकारोऽग्निसमः षड्दीर्घस्वरविन्दुमान्।
प्रणवान्ततोऽष्टाक्षरको मूलमन्त्र उदाहृतः।।44।।
तारक (ॐ) के बाद अग्नि समान हकार छह दीर्घ स्वरों के साथ बोलें
अन्त में पुनः प्रणव (ॐ) बोलें। यह हनुमान् अष्टाक्षर मन्त्र है।
ताराद्यं वज्रकायेति वज्रतुण्डेति ह्युद्धरेत्।
कपिलपिङ्गलप्रोक्ता ऊर्ध्वकेशं महाबलम्।।45।।
रक्तमुखतडिजिह्वा महारौद्रपदं ततः।
महादृढप्रहारश्च लंकेश्वरवधाय च।।46।।
महासेतुबन्धपदं महाशैलप्रवाह च।
गगने चर एह्येहि भगवंस्त्वं महापदम्।
बलपराक्रमपदं भैरवाज्ञां जयेति च।।47।।
एह्येहि महारौद्र दीर्घपुच्छेन वेष्टय।
वैरिणं भञ्जयपदं द्विरुक्तो हं फडन्तकः।।48।।
पंचविंशत्याह्यधिकः प्रोक्तो मन्त्रः शताक्षरः।
मालाख्योऽयं ज्वरादीनां रोगानामन्तकः स्मृतः।।49।।
(236) अगस्त्य-संहिता
तार (ॐ) आदि में बोलकर 'वज्रकायं, 'वज्रतुण्ड' कहें। तब 'कपिलपिंगल'
यह कहकर 'ऊर्ध्वकेश' और 'महाबल' कहें। 'रक्त मुखतडिज्जिह्वा' कहकर 'महारौद्र'
पद कहें। तब 'महादृढप्रहार' और लंकेश्वरवधाय' कहें। इसके बाद 'महासेतुबन्ध'
पद कहकर 'महाशैलप्रवाह' कहें। इसके बाद 'गगने चर', एहि एहि, भगवँस्त्वं
और 'महा' कहें। तब 'बलपराक्रम' यह कहकर 'भैरवाज्ञां जय' ऐसा कहकर 'एहि
एहि महारौद्र दीर्घपुच्छेन वेष्टय' और वैरिणं भञ्जय' यह शब्द बोलकर दो बार
'हुं' कहकर 'फट्' शब्द से अन्त करें। इस प्रकार यह मन्त्र होगा- ॐ वज्रकाय
वज्रतुण्ड कपिलपिंगल ऊर्ध्वकेश महाबल रक्तमुखतडिज्जिह्वा महारौद्र महादृढप्रहार
लंकेश्वरवधाय महासेतुबन्ध महाशैलप्रवाह गगने चर एहि एहि भगवँस्त्वं
महाबलपराक्रम भैरवाज्ञां जय एहि एहि महारौद्र दीर्घपुच्छेन वेष्टय वैरिणं भञ्जय
भञ्जय हुं फट् । पचीस पदों से अधिक का यह शताक्षर मन्त्र है, जो ज्वर आदि
रोगों का नाश करनेवाला हनुमन् का मालामन्त्र है।
आदौ षट्कोणमुद्धृत्य ततो वृत्तं लिखेन्मुने ।
दलानि विलिखेदष्टौ ततः स्वाच्चतुरस्रकम् ॥ ५० ॥
सर्वलक्षणसंव्यक्तं साध्याख्याकर्मगर्भितम् । '
तद्बीजं विलिखेद् भूयस्तत् क्रोडीकृतमान्मथम् ॥ ५१ ॥
ततस्तत् पंचबीजानि पुनरावर्तयेन्मुने ।
पुनर्दशाक्षरेणैव तदेव परिवेष्टयेत् ॥ ५२ ॥
षडङ्गानग्निकोणादिकोणेष्वेव क्रमाल्लिखेत् ।
तथा कोणकपोलेषु ह्रीं श्रीं द्वे विलिखेत्ततः ॥ ५३ ॥
हुं बीजं प्रतिकोणाग्रे केसराग्रेषु च स्वरान् ।
मालामन्त्रस्य वर्णाः स्युश्चत्वारिंशच्च सप्त च ॥ ५४ ॥
वर्णाः सप्तदलेष्वेव षट्पञ्चाष्टमके दले ।
पूर्वतो वेष्टयेत् काद्यैस्तत्सर्वं च तपोधन ॥ ५५ ॥
दिग्विदिनु लिखेद बीजे नारसिंह वराहयोः ।
क्रौं हुं चेति पूर्वादिभूगृहे चतुरस्रके ॥ ५६ ॥
यन्त्रेऽस्मिन् सम्यगाराध्य भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ।
द्वात्रिंशोऽध्यायः (237)
सबसे पहले षट्कोण लिखें, तब उसके बाहर एक वृत्त लिखें। इसके बाद
आठ दल लिखें। तब चतुर्भुज बनावें। इस यन्त्र के मध्यभाग में सभी लक्षणों को
स्पष्ट करते हुए साध्य का नाम बीच में लिखकर दोनों ओर क्रिया लिखें। तब
उसका बीज बार कामबीज (क्लीं) के सम्पुटित कर लिखें। तब उन पाँच बीजाक्षरों
को फिर दुहरावें। पुनः दशाक्षर मन्त्र से उसे वेष्टित करें। अग्निकोण से आरम्भ
कर क्रम में लिखें। कोणों के दोनों कपोलों पर 'ह्रीं श्रीं' दो बार लिखें। प्रत्येक
कोण के अग्रभाग में 'हुं' बीज लिखें और केसरों के अग्रभाग में सोलह स्वर लिखें।
मालामन्त्र में सैंतालीस वर्ण हैं, जिनमें छह छह वर्ण सात दलों में और पाँच आठवें
दल में लिखें। पूर्व दिशा से आरम्भ कर 'क' से ह तक व्यंजनों से सबको वेष्टित
करें। दिशाओं और दिक्कोणों में नरसिंह (औं) और वराह के बीज (ह्रौं) लिखें।
पूर्व दिशा से आरम्भ कर चतुर्भुज भू-पुर पर 'क्रौं हुं' यह लिखें। इस मन्त्र पर
सम्यक् रूप से आराधना कर साधक भोग और मोक्ष प्राप्त करते हैं।
एतद्यन्त्रं समालिख्य सौवर्णे राजते पटे।।57।।
भूर्जे वा सम्यगालिख्य गुलिकीकृत्य धारयेत् ।।58।।
अपुत्रो लभते पुत्रान् अधनो धनमाप्नुयात्।
किमत्र बहुनोक्तेन सर्वसिद्धिप्रदं नृणाम्।।59।।
यन्त्रमेतत्समाख्यातं धारणात् पातकापहम्।
इस यन्त्र को सोना, चाँदी, कपड़ा या भोजपत्र पर लिखकर गोली बनाकर
धारण करें। इससे अपुत्र पुत्र प्राप्त करते हैं, निर्धन धन पाते हैं अधिक क्या
कहना! यह मनुष्यों के लिए सभी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। इसे धारण करने से
पापों को नाश होता है। यह यन्त्र इस प्रकार कहा गया।
षट्कोणादिमनोहरान्तं यन्त्रं लिखित्वा तस्य मध्ये साध्याख्या
कर्मगर्भितं रामबीजं लिखेत्। तत्सर्वं मन्मथेन क्रोडीकृत्य
अवशिष्टैर्मन्त्रार्णैर्मन्मथेन वेष्टयेत्।।60।। अष्टदलाद्बहिर्द्वारं
दशाक्षरवेष्टनम्। इति वसिष्ठ कल्पभेदः। शेषं स्पष्टम्। षट्कोणादिरथ
पूर्ववद् विलिखेत्। अथ तस्य मध्ये लिखेत्कर्म षट्सुकोणेष्वपि
क्रमात्।।61।।
(238) अगस्त्य-संहिता
षट्कोण से सुन्दर भूपूर तक यन्त्र लिखकर उसके बीच में साध्य का नाम
लिखना चाहिए और क्रिया से सम्पुटित कर रामबीज (रां) लिखें। सबको कामबीज
से सम्पुटित कर मन्त्र के शेष वर्णों से और कामबीज से वेष्टित करें। अष्टदल के
बाहर द्वार बनाकर दशाक्षर मन्त्र से वेष्ठित करें- यह वसिष्ठ कल्प में भिन्नता है।
शेष स्पष्ट है। षट्कोणादि भी पूर्वोक्त विधि से लिखें। इसके बाद षट्कोण के मध्य
में अभीष्ट कार्य लिखें और छह कोणों में भी क्रमशः लिखें।
मूलमन्त्राक्षराण्य़ेव सन्धिष्वङ्गं च मन्मथम्।
माया गण्डेषु किञ्जल्के स्वराणां लेखनं मतम्।।62।।
रेखाओं की सन्धियों पर मूलमन्त्र और रेखाओं पर कामबीज (क्लीं)
लिखें। कोण के कपोलों पर माया (ह्रीं) और केसरों पर सोलह स्वर लिखें।
पत्रेषु पूर्ववन्मालामन्त्रो लेख्यः। क्रमेण हि दशाक्षरेण संवेष्ट्य
काद्यानि व्यञ्जनानि च।।63।।
पत्रों पर पूर्वोक्त रीति से मालामन्त्र लिखें। क्रमशः दशाक्षर मन्त्रों से
वेष्ठित कर 'क' आदि व्यञ्जनों से वेष्टित करें।
दिग्वि दिक्षु लिखेद् बीजे नारसिंहवराहयोः।
एतद् यन्त्रवरं चात्र साङ्गावरणमर्चयेत्।।63।।
सौवर्णे राजते भूर्जे लिखित्वाचनमाचरेत्।
फलं तु पूर्ववज्ज्ञेयं यन्त्रस्यास्य विचक्षणैः।।64।।
दिशाओं और कोणों में नरसिंह (क्ष्रौं) और वराह का बीजमन्त्र (फट्)
लिखें। यह यन्त्रराज है, इसका पूजन अंग और आवरण के साथ करें। सोना,
चाँदी या भोजपत्र पर लिखकर इसका पूजन करें। इस यन्त्र की आराधना का
फल विद्वान् वहीं जानें जो पूर्व में कहा गया है।
अगस्त्य उवाच
वक्ष्यामि रामचन्द्रस्य यन्त्रं कवचसंज्ञितम्।
धारणात् तस्य मर्त्यानां जायन्ते सर्वसिद्धयः।।65।।
नश्यन्ति सर्वपापानि विपदो यान्ति संक्षयम्।
भूतप्रेतपिशाचाद्याः पलायन्ते च दर्शनात्।।66।।
द्वातत्रिंशोऽध्यायः (239)
मित्राणि स्थिरतां यान्ति शत्रवो यान्ति मित्रताम्।
ग्रहाः प्रसादमायान्ति दास्यं यान्ति महीभृतः।।67।।
किमत्र बहुनोक्तेन नास्त्यनेन सुदुर्ल्लभम्।
यन्त्रेण रामचन्द्रस्य वज्रपञ्जरसंज्ञितम्।।68।।
अब मैं श्रीराम का वह यन्त्र बतलाता हूँ, जिसे कवच कहा गया है। इस
यन्त्र के धारण करने से मनुष्यों को सभी सिद्धियाँ मिल जाती हैं। सभी पाप नष्ट
हो जाते हैं, सारी विपत्तियाँ नष्ट हो जाती है। भूत, प्रेत पिशाच आदि देखने से
ही भाग जाते हैं। उनकी मित्रता स्थिर होती है, शत्रु भी मित्र हो जाते हैं, ग्रह
प्रसन्न होते हैं और राजागण उस व्यक्ति के दास बन जाते हैं। अधिक क्या
कहना! श्रीरामचन्द्र के वज्रपंजर नामक यन्त्र के धारण करने से कुछ भी दुर्लभ
नहीं रहता।
कोष्ठैः सहैकविंशत्या पंक्तिद्वयविभूषितम्।
विन्यसेदुत्तमं चक्रमेतस्मिन् कवचं लिखेत्।।69।।
इक्कीस कोष्ठों के साथ दो पंक्तियों में सुसज्जित उत्तम चक्र लिखें और इसमें
कवच लिखें।
द्वादशाक्षरवर्णानि गृहाद्यन्त्रेषु विन्यसेत्।
अनुलोमविलोमाभ्यां प्राग्दाक्षिण्यक्रमेण च।।70।।
भू-पुर से यन्त्र तक द्वादशाक्षर मन्त्र अनुलोम और प्रतिलोम की विधि से
पूर्व-दक्षिण क्रम से लिखें।
राघवादीनि नामानि नमस्कारेण योजयेत्।
मे शिरः पात्विति च स्यात् सर्वतो वाक्ययोजना।।71।।
राघव आदि नाम नमस्कार के साथ लिखकर 'मे शिरः पातु' इत्यादि सभी
स्थलों पर वाक्य योजना होगी।
साध्याख्यसंयुतां षष्ठ्यां स्वाहेत्येकादशे गृहे।
स्वकामशक्तिवाग्वर्म नारसिंहमतः परम्।।72।।
लक्ष्मीपाशाङ्कुशार्णानि वाराहं फट्स्वरूपके।
स्वाहेति रामभद्रस्य द्वादशाक्षरमीरितम्।।73।।
(240) अगस्त्य-संहिता
छठे कोष्ठ में साध्य का नाम लिखकर ग्यारहवें कोष्ठ में स्वाहा लिखें। तब
स्वबीज (रं) , इसके बाद कामबीज (क्लीं), शक्ति( ह्रीं), वाग्बीज( ऐं), वर्म(हुं)
तथा नरसिंह बीज (ह्रौं), लक्ष्मीबीज (श्रीं), पाश (आं), अंकुश (क्रौं) और
वाराहबीज (फट्) लिखकर स्वाहा लिखे। यह श्रीराम का द्वादशाक्षर मन्त्र कहा
गया है- रं क्लीं ह्रीं ऐं हुं ह्रौं श्रीं आं क्रौं फट् स्वाहा।
सौवर्णे राजते पात्रे भूर्जे वा सम्यगालिखेत्।
अथवा ताम्रपत्रे च गुलिकीकृत्य धारयेत्।।74।।
सोना, चाँदी, भोजपत्र या ताँबा के पत्र भलीभाँति लिखें और गोली बना
कर धारण करें।
यावज्जीवं तु सौवर्णे रौप्ये विंशतिवर्षकम्।
भूर्जे द्वादशवर्षाणि तदर्द्धे ताम्रपत्रके।।75।।
सोना पर लिखा हुआ जीवनपर्यन्त, चाँदी पर बीस वर्ष, भोजपत्र पर
बारह वर्ष और ताँबा पर लिखा हुआ छह वर्ष तक यन्त्र प्रभावशाली रहता है।
एवं लिख्य विशेषेण यन्त्रशक्तिं प्रतिष्ठिताम्¹।
एतां ²रामबलोपेतामित्यादिश्लोकषट्कम्।।76।।
यन्त्राद् बहिःप्रदेशे तु वृत्ताकारं यथालिखेत्।
- क. यंत्रशक्तिंप्रतिष्ठिता।
- ये छह श्लोक बुधकौशिक-प्रोक्त रामरक्षास्तोत्र में इस प्रकार उपलब्ध होते
हैं- एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्। स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी
विनयी भवेत्।।10।। पाताल-भूतल-व्योमचारिणश्छद्मचारिणः। न द्रष्टुमपि
शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः।।11।। रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।।12।। जगज्जैत्रैकमन्त्रेण
रामनाम्नाभिरक्षितम्। यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः।।13।।
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्। अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्।14।।
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः। तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो
बुधकौशिकः।।15।। (रामरक्षास्तोत्र श्लोक सं.10-15)
द्वात्रिंशोऽध्यायः (241)
इस प्रकार विशेष रूप से लिखकर यन्त्रशक्ति के रूप में 'एतां रामबलोपेतां'
आदि छह श्लोक लिखकर प्रतिष्ठित करें। यन्त्र के बाहर वृत्त बनावें।
सर्वदुष्टोपशमनं सर्वोपद्रवनाशनम् ।।77।।
आयुरारोग्यमैश्वर्यंपुत्रपौत्रप्रवर्द्धनम् ।
सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोकं¹ च गच्छति।।78।।
यह यन्त्र सभी दुष्टों को शान्त करता है, सभी उपद्रवों का नाश करता है,
आयु आरोग्य, ऐश्वर्य, पुत्र, पौत्र आदि की वृद्धि करता है। इसे धारण करनेवाले
सभी कामनाओं को प्राप्त करते हैं और विष्णुलोक भी जाते हैं।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये श्रीरामकवचोद्धारकथनं नाम
द्वात्रिंशोऽध्यायः।²
समाप्तश्चायं ग्रन्थः
- क. विष्णुलोके। 2. क. हनुमन्मन्त्रयंत्रश्रीरामकवचोद्धारकथनं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः।
परिशिष्ट 1
हेमाद्रि-कृत 'चतुर्वर्गचिन्तामणि' में उद्धृत 'अगस्त्य-संहिता'
(कमलाकर भट्ट-कृत 'निर्णय-सिन्धु' में उद्धृत)
उपोषणं जागरणं पितॄनुद्दिश्य तर्पणम्। A.S.-28.5a-b
तस्मिन् दिने तु कर्तव्यं ब्रह्मप्राप्तिमभीप्सुभिः।। A.S.-28.5c-d
सर्वेषामप्ययं धर्मो भुक्तिमुक्त्यैकसाधनः। A.S.- 26.11a-b
अशुचिर्वापि पापिष्ठः कृत्वेदं व्रतमुत्तमम्। A.S.-26.11c-d
पूज्यः स्यात् सर्वभूतानां यथा रामस्तथैव सः। A.S.-26.12a-b
यस्तु रामनवम्यान्तु भुङ्क्ते मोहाद् विमूढधीः। A.S.-26. 12c-d
कुम्भीपाकेषु घोरेषु पच्यते नात्र संशयः।। A.S.-26.13a-b
अकृत्वा रामनवमीव्रतं सर्वव्रतोत्तमम्। A.S.-26.15 a-b
व्रतान्यन्यानि कुरुते न तेषां फलभाग् भवेत्।। A.S. -26.12c-d
प्राप्ते श्रीरामनवमीदिने मर्त्यो विमूढधीः। A.S.-27.9a-b
उपोषणं न कुरुते कुम्भीपाकेषु पच्यते।। A.S.-27.9c-d
आचार्यं चैव सम्पूज्य वृणुयात्प्रार्थयेन्निशि। A.S. 26.25 a-b
श्रीरामप्रतिमादानं करिष्येऽहं द्विजोत्तम। A.S.-26.25c-d
भक्त्याचार्यो भव प्रीतः श्रीरामोऽसि त्वमेव च।। A.S.-26.25e-f
तथा-
स्वगृहे चोत्तरे देशे दानस्योज्जवलमण्डपम्।
शङ्खचक्रहनूमद्भिः प्राग्द्वारे समलंकृतम्।। A.S.-26.35a-b
गरुत्मच्छाङ्गिबाणैश्च दक्षिणे समलंकृतम्। A.S.-26.35c-d
गदाखड्गाङ्गदैश्चैव पश्चिमे सुविभूषितम्।। A.S.26.36a-b
पद्मस्वस्तिकनीलैश्च कौबेरे समलंकृतम्। A.S- 26.36c-d
मध्ये हस्तचतुष्काढ्यं वेदिकायुक्तमायतम् ।। A.S.26.37a-b
ततः संकल्पयेद्देवं राममेव स्मरन्मुने। A.S.-26.38a-b
अस्यां रामनवम्यां च रामाराधनतत्परः ।। A.S.-26.39a-b
उपोष्याष्टसु यामेषु पूजयित्वा यथाविधि। A.S.-26.39c-d
इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां च प्रयत्नतः। A.S.-26.40a-b
श्रीरामप्रीतये दास्ये रामभक्ताय धीमते। A.S.-26.40c-d
प्रीतो रामो हरत्वाशु पापानि सुबहूनि मे ।। A.S.-26.41a-b
अनेकजन्मसंसिद्धान्यभ्यस्तानि महान्ति च। A.S.-26.41c-d
ततः स्वर्णमयीं रामप्रतिमां पलमात्रतः ।। A.S.-26.42a-b
निर्मितां द्विभुजां दिव्यां वामाङ्कस्थितजानकीम्। A.S.-26.42c-d
बिभ्रतीं दक्षिणकरे ज्ञानमुद्रां महामुने ।। A.S.-26.43a-b
वामेनाधःकरेणाराद्देवीमालिङ्ग्य संस्थिताम्। A.S.-26.43c-d
सिंहासने राजतेऽत्र पलद्वयविनिर्मिते ।।' A.S.-26.44a-b
तथा-
‘अशक्तो यो महाभागः स तु वित्तानुसारतः। A.S.-27.2a-b
पलेनार्धतदर्धेन तदर्धार्धेन वा मुने ।। A.S.-27.2c-d
सौवर्णं राजतं वापि कारयेद्रघुनन्दम्। A.S.-28.25c-d
पार्श्वे भरतशत्रुघ्नौ धृतच्छत्रकरावुभौ ।। A.S.-28.26a-b
चापद्वयसमायुक्तं लक्ष्मणं चापि कारयेत्। A.S.-28.26c-d
दक्षिणाङ्गे दशरथं पुत्रावेक्षणतत्परम् ।।
मातुरङ्कगतं राममिन्द्रनीलसमप्रभम्। A.S.-28.27a-b
पञ्चामृतस्नानपूर्वे संपूज्य विधिवत्ततः ।।
कौसल्यामन्त्रस्तु-
‘रामस्य जननी चासि रामरूपमिदं जगत्।
अतस्त्वां पूजयिष्यामि लोकमातर्नमोऽस्तु ते ।।
नमो दशरथायेति पूजयेत् पितरं ततः ।।'
अत्र दशावरणपञ्चावरणादिपूजाऽन्यत्र ज्ञेया।
'अशोककुसुमैर्युक्तमर्घ्यं दद्याद्विचक्षणः।
दशाननवधार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ।। A.S.-28.36a-b
राक्षसानां विनाशाय दैत्यानां निधनाय च। A.S.-28.36c-d
परित्राणाय साधूनां जातो रामः स्वयं हरिः ।। A.S.-28.37a-b
(244) अगस्त्य-संहिता
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं भ्रातृभिः सहितोऽनघ।| A.S.-28.37c-d
पुष्पाञ्जलिं पुनर्दत्त्वा यामे यामे प्रपूजयेत्।।
दिवैवं विधिवत्कृत्वा रात्रौ जागरणं ततः।
ततः प्रातः समुत्थाय स्नानसन्ध्यादिकाः क्रियाः।। A.S.-26.51a-b
समाप्य विधिवद्रामं पूजयेद्विधिवन्मुने। A.S.-26.51c-d
ततो होमं प्रकुर्वीत मूलमन्त्रेण मन्त्रवित्।। A.S.-26.52a-b
पूर्वोक्तपद्मकुण्डे वा स्थण्डिले वा समाहितः। A.S.-26.52c-d
लौकिकाग्नौ विधानेन शतमष्टोत्तरं ततः।। A.S.-26.53a-b
साज्येन पायसेनेव स्मरन् राममनन्यधीः। A.S.-26.53c-d
ततो भक्त्या सुसंतोष्य आचार्यं पूजयेन्मुने।। A.S.-26.54a-b
ततो रामं स्मरन् दद्यादेवं मन्त्रमुदीरयेत्। A.S.-26.55c-d
“इमां स्वर्णमयीं रामप्रतिमां समलंकृताम्।। A.S.-26.56a-b
चित्रवस्त्रयुगच्छन्नां रामोऽहं राघवाय ते। A.S.-26.56c-d
श्रीरामप्रीतये दास्ये तुष्टो भवतु राघवः।।” A.S.-26.57a-b
इति दत्त्वा विधानेन दद्याद्वै दक्षिणां भुवम्। A.S.-26.58c-d
ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः।।” A.S.-26.60c-d
इति।