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अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

(200) अगस्त्य-संहिता
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श्रीरामनवमी का दिन आने पर जो मूर्ख मनुष्य उपवास नहीं करते हैं, वे
कुम्भीपाक नरक में पचते हैं।
यत्किंचिद् रामममुद्दिश्य नो ददातिस्वशक्तितः।
रौरवेषु स मूढात्मा पच्यते नात्र संशयः।।10।।
अपनी शक्ति के अनुसार जो कुछ श्रीराम को लक्ष्य कर अपनी शक्ति के
अनुसार दान नहीं करता है, वह मूर्ख रौरव नरक में पचता है, इसमें सन्देह नहीं।
सुतीक्ष्ण उवाच
यामाष्टकेषु पूजा वै त्वया प्रोक्ता महामुने।
मूलमन्त्रेण चेत्युक्तं तत्कथं वद सुव्रत।।11।।
हे महामुनि सुतीक्ष्ण! आपने आठो यामों में पूजा की जो विधि बतलायी है
और यह भी कहा है कि मूलमन्त्र से यह पूजा की जानी चाहिए। हे सुव्रत! अगस्त्य
अब बतलाइये कि मूलमन्त्र से कैसे पूजा होगी?
अगस्त्य उवाच
सर्वेषां राममन्त्राणां मन्त्रराजं षडक्षरम्।
तारकं ब्रह्म वेदोक्तं तेन पूजा प्रशस्यते।।12।।
(अगस्त्य बोले- ) सभी राम-मन्त्रों में छह अक्षरों का मन्त्रराज वेद में
तारक ब्रह्म का स्वरूप कहा गया है। इससे पूजा प्रशस्त होती है।
दशमाध्यायविधिना¹ पूजा कार्या प्रयत्नतः।
द्वारपीठाङ्गदेवानामावृतीनां तथैव च।।13।।
आदावेव प्रकुर्वीत देवस्य प्रतिमां ततः।।
उपचारैः षोडशभिः पूजां कुर्याद्यथाविधि।।14।।
प्रयत्नपूर्वक दशम अध्याय में उक्त विधि से षोडशोपचार से द्वार देवता, पीठ
देवता, अंग देवता तथा अन्य आवरण-देवताओं की पूजा विधान से करनी चाहिए।
आवाहनं स्थापनं च संनिधापनमेव च।
संनिरोधनमेव स्यादवगुण्ठनमञ्जसा।।15।।
तत्तन्मुद्राभिरेवं स्याद् देवं संप्रार्थ्य भक्तितः।
शङ्खपूजां प्रकुर्वीत पूर्वोक्तविधिना मुने।।16।।

  1. ग. एवं घ. दशाक्षरविधानेन।

सप्तविंशोऽध्यायः (201)
देवता का आवाहन, स्थापन, संनिधापन, संनिरोधन अवगुंठन उन उन
मुद्राओं से करें तथा भक्तिपूर्वक उनकी प्रार्थना कर शंखपूजा पूर्व में कही गयी
विधि से करें।
कलशं वामभागस्थं पूजाद्रव्याणि चादरात्।
पात्रं च प्रोक्षयेद् भक्त्या चात्मानं मन्त्रमुच्चरन्।।17।।
वाम भाग में स्थित कलश, पूजा-सामग्रियों, पात्रों एवं स्वयं का प्रोक्षण
भक्तिपूर्वक मन्त्र का उच्चारण करते हुए करें।
प्रतिमां शंखपूजां च कुर्याद्देवमनुस्मरन्।
पात्रासादनमप्येवं कुर्याद् देवमतन्द्रितः।।18।।
प्रतिमा का प्रोक्षण तथा शंख की पूजा भी इसी प्रकार श्रीराम का स्मरण
करते हुए करें तथा वाम भाग में पात्रों को यथास्थान रखने का कार्य भी आलस्य
छोड़कर इसी प्रकार करें।
पीताम्बराणि देवाय प्रार्थितान्यर्पयेत् सुधीः।
स्वर्णयज्ञोपवीतानि दद्याद् देवाय शक्तितः।।19।।
नानारत्नविचित्राणि दद्यादाभरणानि च।
विद्वान् यजमान पीले वस्त्रों की प्रार्थना कर देवता को अर्पित करे। स्वर्ण-
निर्मित यज्ञोपवीत आदि भी देवता को समर्पित करे। नाना प्रकार के रत्नों से जड़े
हुए आभूषण भी समर्पित करें।
हिमाम्बुघृष्टरुचिरघनसारसमन्वितम् ।।20।।
गन्धं दद्यात्प्रयत्नेन चागरुं च सकुङ्कुमम्।
मूलमन्त्रेण सकलानुपाचारान्प्रकल्पयेत्।।21।।
बर्फ के पानी में घिसा हुआ सुन्दर कपूर, कुंकुम तथा अगर से युक्त गन्ध
समर्पित करें। सभी उपचार मूलमन्त्र से कल्पित करें।
कह्लारकेतकीजातीपुन्नागाद्यैः प्रपूजयेत्।
चम्पकैः शतपत्रैश्च सुगन्धैः सुमनोहरैः।।22।।
सुगन्धित एवं सुन्दर कमल, केतकी, जाती, नागकेसर, चम्पा, शतपत्र के
पुष्पों से पूजन करें।

(202) अगस्त्य-संहिता
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घण्टां च वादयन् धूपं दीपं चास्मै समर्पयेत्।
भक्ष्यभोज्यादिकं भक्त्या देवाय विधिनाऽर्पयेत् ।।२३।।
घण्टा बजाते हुए धूप, दीप, भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थ देवता को विधिपूर्वक
समर्पित करें।
एवं सोपस्करं देवं दत्वा पापैः प्रमुच्यते।
जन्मकोटिकृतैः घोरैर्नानारूपैः सुदारुणैः ।।२४।।
विमुक्तस्तत्क्षणादेव राम एव भवेन्मुने।
इस प्रकार उपकरणों के साथ देवता को समर्पित कर अनेक प्रकार के
दारुण, करोड़ों जन्मों में किये गये पापों से वह उसी समय मुक्त होकर श्रीराम का
स्वरूप प्राप्त कर लेता है।
श्रद्दधानस्य ते प्रोक्तं श्रीरामनवमीव्रतम् ।।२५।।
सर्वलोकहितार्थाय पवित्रं पापनाशनम्।
हे मुनि! आप श्रद्धावान् हैं, इसलिए मैंने सभी लोगों के कल्याण के लिए
पवित्र और पापों का नाश करनेवाले श्रीरामनवमी व्रत के बारे में बतलाया।
लौहेन निर्मितं चापि शिलया दारुणापि वा ।।२६।।
येन केन प्रकारेण यस्मै कस्मै क्रमान्मुने।
चैत्रशुक्लनवम्यां तु दत्वा विप्राय भक्तितः ।।२७।।
सर्वपापविनिर्मुक्तो भवेदेव न संशयः।
लोहा, पत्थर अथवा काष्ठ की बनी हुई प्रतिमा जिस किसी भी प्रकार से
जिस किसी ब्राह्मण को विधानपूर्वक चैत्र शुक्ल नवमी तिथि को दान कर सभी
पापों से मुक्त होता ही है, इसमें सन्देह नहीं।
तस्मिन् दिने महापुण्ये स्नानदानादिकं मुने ।।२८।।
कृतं सर्वप्रयत्नेन यत्किंचिदपि भक्तितः।
महादानादितुल्यं स्याद्रामोद्देशेन कल्पितम्।
वित्तशाठ्यमकृत्वैव सर्वं कुर्यात् स्वशक्तितः ।।
उस महान् पुण्यमय दिन में जो कुछ भी स्नान, दान आदि भक्ति एवं
यत्नपूर्वक किया जाता है, वह अक्षय्य होता है। श्रीराम के उद्देश्य से जो कुछ भी
किया जाता है वह महादान आदि के समान फलदायी होता है। अपनी सम्पत्ति
की अनदेखी न करते हुए अपनी शक्ति के अनुसार सबकुछ करना चाहिए।
Rarest Archiver

अष्टाविंशोऽध्यायः (203)
— — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — —
तस्मिन् दिने महापुण्ये प्रातरारभ्य भक्तितः।।29।।
जपेदेकान्त आसीनो यावत्स्याद्दशमीदिनम्।
उस महापुण्यमय दिन में प्रातःकाल से आरम्भ कर एकान्त में बैठकर
जबतक दशमी तिथि रहे, तबतक जप करें।
तेनैव स्यात् पुरश्चर्या दशम्यां भोजयेद् द्विजान्।।30।।
भक्ष्यभोज्यैर्बहुविधैर्दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम्।
कृतकृत्यो भवेत्तेन सद्यो रामः प्रसीदति।।31।।
उसी मन्त्र से पुरश्चरण किया जाना चाहिए, दशमी में अनेक प्रकार के
भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से ब्राह्मण-भोजन करना चाहिए और शक्ति के अनुसार
दक्षिणा दी जानी चाहिए। इससे वह व्यक्ति कृतकृत्य हो जाता है; उसपर श्रीराम
तुरत प्रसन्न होते हैं।
तद्दिने तु नरो याति पुनरावृत्तिवर्जितः।
द्वादशाब्दशतेनापि यत्पापं नापमृज्यते।।32।।
विलयं याति तत्सर्वं श्रीरामनवमीदिने।
जपेन राममन्त्राणां योऽयं जानाति तस्य तु।।33।।
रामनवमी के दिन यह सब करने से मनुष्य पुनर्जन्म से रहित मोक्ष प्राप्त कर
लेते हैं। बारह वर्षों में भी जो पाप नहीं कटता, वे सारे पाप श्रीरामनवमी के दिन श्रीराम
के मन्त्र के जप से नष्ट होते हैं, साथ ही, जो इसे जानते हैं, उनके भी पाप नष्ट हो जाते हैं।
उपोष्य च स्मरन् रामं न्यासपूर्वमनन्यधीः।
गुरोर्लब्धमनुर्यस्तु तस्य न्यासपुरस्सरम्।।34।।
यामे यामे च विधिवद्रामपूजां समाहितः।¹
उपवास कर श्रीराम का स्मरण करते हुए एकाग्रचित्त हो गुरु से प्राप्त मन्त्र
का न्यासपूर्वक जप करना चाहिए तथा पहर-पहर पर ध्यान लगाकर विधिवत्
श्रीराम की पूजा करनी चाहिए।
मुमुक्षवोऽपि च सदा श्रीरामनवमीव्रतम्।।35।।
¹न त्यजन्ति सुरश्रेष्ठो देवेन्द्रोऽपि विशेषतः।
हमेशा मोक्ष की कामना करनेवाले भी श्रीरामनवमी का व्रत नहीं छोड़ते
हैं। विशेष रूप से देवताओं में श्रेष्ठ देवराज इन्द्र भी रामनवमी व्रत नहीं छोड़ते हैं।

  1. ग. यामेन विधिवत् सर्वं कुर्यात् पूजां समाहितः।

(204) अगस्त्य-संहिता

तस्मात्सर्वात्मना सर्वे कृत्वैव नवमीव्रतम्।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।।36।।
अतः सबलोग सभी प्रकार से नवमी व्रत करके ही सभी पापों से मुक्त हो
जाते हैं और सनातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये रामनवमीव्रतविधानं नाम
सप्तविंशोऽध्यायः।
अष्टाविंशोऽध्यायः
अगस्त्य उवाच
चैत्रमासे नवम्यां तु जातो रामः स्वयं हरिः।
पुनर्वस्वृक्षसहिता सा तिथिः सर्वकामदा।।1।।
श्रीरामनवमी प्रोक्ता कोटिसूर्यग्रहाधिका।
चैत्रशुद्धे तु नवमी पुनर्वसुयुता यदि।।2।।
चैत्र मास की नवमी तिथि को स्वयं विष्णु श्रीराम के रूप में उत्पन्न हुए।
पुनर्वसु नक्षत्र के साथ वह तिथि सभी कामनाएँ पूर्ण करती है। यह श्रीरामनवमी
कही गयी है, जो करोड़ों सूर्यग्रहण के से अधिक पुण्यदायिनी है, यदि चैत्र मास के
शुक्लपक्ष की नवमी तिथि में पुनर्वसु नक्षत्र का योग रहे।
पुनर्वस्वृक्षसंयोगः स्वल्पोऽपि यदि दृश्यते।
चैत्रशुद्धनवम्यां तु सा तिथिः सर्वकामदा।।3।।
पुनर्वसु नक्षत्र का संयोग यदि थोड़ा भी दिखायी दे, तो चैत्र शुक्ल नवमी
की वह तिथि सभी कामनाएँ पूर्ण करती है।
अस्मिन् दिने महापुण्ये राममुद्दिश्य भक्तितः।
यत्किञ्चित् क्रियते कर्म तद्भवक्षयकारकम्।।4।।
उस महापुण्यमय दिन में श्रीराम को लक्ष्य कर भक्ति से जो कुछ भी कर्म
किये जाते हैं, वे पुनर्जन्म का नाश करते हैं।
उपोषणं जागरणं पितॄनुद्दिश्य तर्पणम्।
तस्मिन् दिने तु कर्त्तव्यं ब्रह्मप्राप्तिमभीप्सुभिः।।5।।

  1. ग. यहाँ से चार चरण अनुपलब्ध।

अष्टाविंशोऽध्यायः (205)
उपवास, जागरण पितर को लक्ष्य कर तर्पण उस दिन सनातन ब्रह्म की
प्राप्ति के लिए करना चाहिए।
राम एव परं ब्रह्म तद्दिने रामतोषकम्।
उपोषणं जागरणं तस्मात्कुर्याद् विशेषतः¹॥६॥
यस्तु रामनवम्यां तु भुङ्क्ते मोहाद् विमूढधीः।
कुम्भीपाकेषु घोरेषु पच्यते नात्र संशयः॥७॥
यस्तु रामनवम्यांतु नियतस्तर्पयेत् पितॄन्।
ते सर्वे तत्क्षणादेव यान्ति विष्णोः परं पदम्॥८॥
श्रीराम परब्रह्म श्रीराम को प्रसन्न करनेवाले उपवास और जागरण आदि
करना चाहिए। जो मूर्ख मोहवश रामनवमी के दिन भोजन करते हैं, वह घोर
कुम्भीपाक आदि नरकों में दग्ध होते हैं, इसमें सन्देह नहीं। जो रामनवमी के दिन
नियमपूर्वक पितरों का तर्पण करते हैं, वे उस समय से विष्णु के परम पद को प्राप्त
करते हैं।
यस्तु रामनवम्यां तु दद्याद् वित्तानुसारतः।
यत्किंचिदपि तत्सर्वं महादानसमं भवेत्॥९॥
जो रामनवमी के दिन अपने विभव के अनुसार जो कुछ भी दान करते हैं,
उन्हें महादान के समान फल मिलता है।
यस्तु रामनवम्यां तु कुर्याद्रामव्रतं यदि।
तुलापुरुषदानादि फलं प्राप्नोति मानवः॥१०॥
जो रामनवमी में श्रीराम का व्रत करता है, वह मनुष्य तुलापुरुष आदि
दान का फल पाता है।
सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे महादानैः कृतैर्मुहुः।
यत्फलं तदवाप्नोति श्रीरामनवमीव्रतात्॥११॥
कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय बार बार महादान करने का फल श्रीरामनवमी
व्रत करने से मनुष्य प्राप्त करता है।
कुर्याद्रामनवम्यां तु उपोषणमतन्द्रितः।
मातुर्गर्भमवाप्नोति नैव रामो भवेत्स्वयम्॥१२॥

  1. ग. तस्मात् कुर्यात् प्रयत्नतः।

(206) अगस्त्य-संहिता
रामनवमी के दिन आलस्य छोड़कर उपवास करे, तो वह पुनः माता का
गर्भ प्राप्त नहीं करता है और श्रीराम-स्वरूप हो जाता है।
नवमी चाष्टमी विद्धा त्याज्या रामपरायणैः।¹
उपोषणं नवम्यां वै दशम्यामेव पारणम्।।13।।
श्रीराम में परायण भक्तों के द्वारा अष्टमीविद्धा नवमी का त्याग करना
चाहिए और नवमी में उपवास कर दशमी में पारणा करनी चाहिए।
नीलोत्पलदलश्यामं पीताम्बरधरं विभुम्।
द्विभुजं कञ्जनयनं दिव्यसिंहासने स्थितम्।।14।।
वसिष्ठाद्यैश्च परितो वृतं रत्नकिरीटिनम्।
सीतासंलापचतुरं दिव्यगन्धादिशोभितम्।।15।।
चापद्वयकरेणारात्² सेवितं लक्ष्मणेन च।
शत्रुघ्नभरताभ्यां च पार्श्वयोरथ सेवितम्।।16।।
ध्यायन्ननन्यहृद्रामं द्वादशाक्षरमन्वहम्।
प्रजपेद् दीक्षितो नित्यं श्रीरामन्यासपूर्वकम्।।17।।
मन्त्रसन्ध्यां विधायैव त्रिकालं पूजयेत् सदा।।18।।
नीलकमल के समान श्यामल वर्ण वाले, पीताम्बरधारी, दो हाथों वाले,
कमलनयन, दिव्य सिंहासन पर स्थित, वसिष्ठ आदि पार्षदों से चारो ओर से घिरे
हुए, रत्न का मुकुट धारण करनेवाले, श्रीसीता के साथ आलाप करने में चतुर,
दिव्य चन्दन आदि से शोभित दो धनुष हाथ में लिए हुए लक्ष्मण द्वारा दूर से
सेवित, दोनों पार्श्वों में शत्रुघ्न और भरत से सेवित प्रभु श्रीराम का हृदय में
अनन्य भाव से ध्यान करते हुए प्रतिदिन श्रीराम के द्वादशाक्षर मन्त्र का जप श्रीराम
का न्यास कर, मन्त्र सन्ध्या करके ही करें और तीनों कालों में हमेशा पूजा करें।
सुतीक्ष्ण उवाच
भगवन् योगिनां श्रेष्ठ सर्वशास्त्रविशारद।
किं तत्त्वं किं परं जाप्यं किं ध्यानं मुक्तिसाधनम्।
ज्ञातुमिच्छामि तत्सर्वं ब्रूहि मे मुनिसत्तम।।19।।
सुतीक्ष्ण ने पूछा- हे भगवान् अगस्त्य! आप योगियों में श्रेष्ठ हैं, सभी
शास्त्रों का ज्ञान रखते हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! मैं जानना चाहता हूँ कि तत्त्व क्या है? जप का
परम मन्त्र क्या है ध्यान क्या है और मुक्ति का उपाय क्या है? यह सब मुझे कहें।

  1. यह श्लोक धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में 'विष्णुपरायणैः' पाठान्तर के साथ उपलब्ध है।
  2. ग. चापबाणकरेणारात्।

अष्टाविंशोऽध्यायः (207)
अगस्त्य उवाच
सुतीक्ष्ण त्वं महाभाग शृणु वक्ष्यामि तत्त्वतः।
यत्परं यद्गुणातीतं यज्ज्योतिरमलं शुभम् ।।20।।
तदेव परमं तत्त्वं कैवल्यपदकारणम्।
अगस्त्य बोले- हे सुतीक्ष्ण! आप महान् भाग्यशाली हैं। मैं वास्तविक रूप
से कहता हूँ, इसे सुनें। जो परम सत्ता है, सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीनों गुणों
से भी ऊपर जो निर्मल और शुभ ज्योति है, वही परम तत्त्व है और मोक्षप्राप्ति का
साधन भी है।
श्रीरामेति परं जाप्यं तारकं ब्रह्मसंज्ञितम् ।।21।।
ब्रह्महत्यादिपापघ्नमिति वेदविदो विदुः।
श्रीराम राम रामेति ये वदन्त्यपि सर्वदा ।।22।।
तेषां भुक्तिश्च मुक्तिश्च भविष्यति न संशयः।
'श्रीराम' यह पद जप का परम मन्त्र है। इसे उद्धार करनेवाला तथा ब्रह्म
कहा गया है। वेदज्ञानी इसे ब्रह्महत्या आदि पापों का नाशक कहते हैं। 'श्रीराम
राम राम' इसे जो प्रतिदिन बोलते भी हैं, उन्हें संसार में धन-सम्पत्ति का भोग
और देहान्त के बाद मोक्ष मिलता है, इसमें सन्देह नहीं।
नमस्कृत्य प्रवक्ष्यामि रामं कृष्णमनामयम् ।।23।।
अयोध्यानगरे रम्ये रत्नमण्डपमध्यगे।
स्मरेत् कल्पतरोर्मूले रत्नसिंहासनं शुभम् ।।24।।
अब मैं श्रीराम को प्रणाम कर कृष्णवर्ण के पुण्यमय श्रीराम के ध्यान को
कहता हूँ। अयोध्या नगर में सुन्दर रत्नमण्डप के बीच में कल्पवृक्ष की जड़ में
स्थित रत्नमय शुभ सिंहासन का स्मरण करना चाहिए।
तन्मध्येऽष्टदलं पद्मं नानारत्नप्रवेष्टितम् ।
सौवर्णं राजतं वापि कारयेद् रघुनन्दनम् ।।25।।
पार्श्वे भरतशत्रुघ्नौ ध्वजच्छत्रधरावुभौ।
चापद्वयसमायुक्तं लक्ष्मणं कारयेत् सुधीः ।।26।।
इस मण्डप के बीच नाना प्रकार के रत्नों से जड़े अष्टदल कमल पर
श्रीराम की सुवर्ण अथवा चाँदी से निर्मित प्रतिमा स्थापित करें दोनों पाश्र्वों में छत्र
और ध्वज धारण किए हुए भरत और शत्रुघ्न तथा दो धनुष थामे हुए लक्ष्मण की
प्रतिमा का निर्माण कराना चाहिए।

(208) _ _ _ _ _ अगस्त्य-संहिता _ _ _ _ _ _
मातुरङ्कगतं राममिन्द्रनीलसमप्रभम्।
कोमलाङ्गं विशालाक्षं विद्युद्वर्णसमावृतम् ।।27।।
भानुकोटिप्रतीकाशं किरीटेन विराजितम्।
रत्नग्रैवेयकेयूररत्नकुण्डलमण्डितम् ।।28।।
रत्नकङ्कणमञ्जीरकटिसूत्रैरलंकृतम् ।
श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं मुक्ताहारोपशोभितम् ।।29।।
सौवर्णे राजते पात्रे षट्कोणञ्च समं लिखेत्।
अलाभे बिल्वपीठे वा स्थापयेद्रघुनन्दनम् ।।30।।
माता कौशल्या की गोद में स्थित, नीलम के समान कान्ति वाले, कोमल
अंगों वाले, विशाल आँखों वाले, बिजली के समान आभा से घिरे हुए, करोड़ों सूर्य
के समान, मुकुटधारी, रत्नमय हार, बाजूबंद तथा रत्नमय कुण्डल से सुशोभित,
रत्नमय कंगन, मंजीर, करधनी से अलंकृत श्रीवत्स और कौस्तुभमणि हृदय पर
धारण किए हुए, मोती की मालाओं से सजे श्रीराम की स्थापना सुवर्ण अथवा
चाँदी के पात्र में षट्कोण लिखकर करें। उपलब्ध न रहने पर बेल की लकड़ी से
बनी चौकी पर स्थापना करें।
वस्त्रद्वयसमायुक्तं दिव्यरत्नविभूषितम्।
अस्त्रशक्तिसमायुक्तं देवेशं पूजयेत् क्रमात् ।।31।।
एक जोड़ा वस्त्र से युक्त, दिव्य रत्नों से आभूषित, अस्त्र की शक्ति से
युक्त देवेश श्रीराम की पूजा क्रम से करें।
प्रणवं पूर्वमुच्चार्य नमः शब्दं ततो वदेत्।
भगवत्पदमासाद्य वासुदेवाय इत्यपि ।।32।।
¹ततः सर्वात्मसंयोगयोगपीठात्मने नमः।
इति मन्त्रेण तन्मध्ये कुर्यात् पुष्पाञ्जलिं पुनः ।।33।।
सबसे पहले ‘ॐ’ ऐसा बोलकर तब ‘नमः’ पद बोलें। इसके बाद ‘भगवत्’
पद (भगवते) कहकर ‘वासुदेवाय’ यह भी कहें। तब ‘सर्वात्मसंयोगयोगपीठात्मने
नमः’ इस मन्त्र से बीच में पुष्पाञ्जलि करें।

  1. यहाँ से चार चरण क. में अनुपलब्ध।

अष्टाविंशोऽध्यायः (209)
एवं सम्पूजिते पीठे देवमावाह्य पूजयेत्।
अर्घ्यादिधूपदीपान्तमुपचारान् निधाय च।।३४।।
ततोऽनुज्ञाप्य देवेशं परिचारांश्च पूजयेत्।
इस प्रकार पीठ की पूजा कर उसपर देव श्रीराम का आवाहन कर अर्घ्य से
धूप-दीप तक उपचार समर्पित कर देवेश के प्रति आत्मनिवेदन कर श्रीराम के
परिचारकों की पूजा करें।
पूर्वादिषट्सु कोणेषु हृदयादीनि च क्रमात्।।३५।।
मूलमन्त्रेण कर्तव्यमुपचारास्तु षोडश।
इन्द्रादिलोकपालाँश्च वसिष्ठादिमुनीनपि।।३६।।
सर्वं दिक्पालमन्त्रेण पूजयेद् भक्तिसंयुक्तम्।
अशोककुसुमैर्युक्तमर्घ्यं देवस्य दापयेत्।।३७।।
पूर्व दिशा से प्रारम्भ कर षट्कोण में हृदयादि का न्यास करें और षोडशोपचार
मूलमन्त्र से करें। इन्द्र आदि लोकपाल और वसिष्ठ आदि मुनियों की भी पूजा
दिक्पाल के मन्त्र से भक्तिपूर्वक करें तथा अशोक के फूल से युक्त अर्घ्य समर्पित
करें।
दशाननवधार्थाय देवानां हिताय च¹।
धर्मसंस्थापनार्थाय दैत्यानां निधनाय च।।३७।।
परित्राणाय साधूनां जातो रामः स्वयं हरिः।
गृहाणार्घ्यम्मया दत्तं भ्रातृभिः सहितोऽनघ।।३८।।
“रावण के वध के लिए, देवताओं के कल्याण के लिए, धर्म की स्थापना के
लिए तथा सज्जनों की रक्षा के लिए स्वयं भगवान् विष्णु श्रीराम के रूप में उत्पन्न
हुए। हे पुण्यस्वरूप श्रीराम! मेरे द्वारा अर्पित यह अर्घ्य अपने भ्राताओं के साथ
स्वीकार करें।”
प्रतिमायां विशेषेण अर्चयेद्रघुनन्दनम्।
पौराणस्तोत्रपाठैश्च वेदपारायणेन च।।३९।।
नृत्यगीतैश्चवाद्यैश्च रात्रिशेषं व्यपोह्य च।
विशेष रूप से प्रतिमा पर श्रीराम की अर्चना पुराणोक्त स्तोत्रों का पाठ
कर, वेद मन्त्रों का पाठ कर, नृत्य, गीत, वाद्य आदि से रात्रि में जागरण के साथ करें।

  1. ग. विभीषणश्रियेऽपि वा ।

(210) अगस्त्य-संहिता
प्रातः स्नात्वा च गायत्रीं¹ जप्त्वा सन्ध्यामुपास्य च ।। ४० ।।
दशाक्षरेण मन्त्रेण देवेशं मनसा स्मरेत्।
देवदेवं प्रणम्याथ पूर्ववत् पूजयेद् व्रती ।। ४१ ।।
प्रातःकाल में स्नान कर गायत्री जप एवं सन्ध्यावंदन कर दशाक्षर मन्त्र से
देवेश श्रीराम का मन से स्मरण करें। देवों के देव श्रीराम को प्रणाम कर व्रत करने
वाले पूर्वोक्त विधि से पूजा करें।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये रामनवमीव्रतविधानं नाम
अष्टाविंशोऽध्यायः ।।
अथ एकोनत्रिंशोऽध्यायः
सुतीक्ष्ण उवाच
सर्वेतिहासतत्त्वज्ञ श्रुतिस्मृतिविदां वर।²
न्यासा बहुविधाः प्रोक्तास्त्वयादौ मन्त्रयोगतः ।। 1¹ ।।
तत्र कश्च कथं कुर्यात् कथयस्व महामुने।
सुतीक्ष्ण ने पूछा- हे महामुनि अगस्त्य! आप सभी इतिहासों का तत्त्व
जानते हैं, वेद और स्मृतियों के ज्ञानियों में श्रेष्ठ है। आपने पूर्व में मन्त्र के योग से
अनेक प्रकार के न्यासों का उपदेश किया, अब यह कहें कि साधक किस न्यास को
कैसे करेगें।
अगस्त्य उवाच
न्यासः स्यान्मन्त्रसन्नाहो न्यासहीनो न सिद्धिदः ।। २ ।।
तस्मान्न्यासः प्रयत्नेन कर्तव्यः सिद्धिमच्छता।
अगस्त्य बोले- मन्त्र का कवच न्यास कहलाता है, अतः न्यासरहित मन्त्र
से सिद्धि नहीं मिलती है। इसलिए सिद्धि चाहते हुए साधक प्रयत्नपूर्वक न्यास करें।
वैष्णवानां हि मन्त्राणां सर्वेषां च विशेषतः ।। ३ ।।
न्यासः केशवकीर्त्यादि तत्त्वन्यासः ततः परम्।
न्यासः परमहंसाख्य ईरितः कविभिः सदा ।। ४ ।।


१. ग. मावित्रीं। २. ग. श्रुतिस्मृतिविशारद ।

एकोनत्रिंशोऽध्यायः (211)
सभी वैष्णव-मन्त्रों का तत्त्व-न्यास केशवकीर्त्यादि-न्यास है। इसके बाद
'परमहंस' नामक न्यास कहलाता है।
मातृकां विन्दुसंयुक्तां शुद्धां मन्मथसंयुताम्।
मायावेदादिसंयुक्तां केशवादिन्तथैव च ।।5।।
आभ्यन्तरीं मातृकां च कृत्वानुष्ठानमाचरेत्।
बिन्दु युक्त केवल मातृका वर्ण अथवा कामबीज (क्लीं), माया (ह्रीं) वेद
(ॐ) आदि से युक्त तथा केशवादि से युक्त न्यास तथा आभ्यन्तर मातृका न्यास
कर अनुष्ठान करना चाहिए।
अस्यानुष्ठानमखिलं सकलं मुनिसत्तम ।।6।।
अशक्तश्चेन्मन्त्रमात्रमुच्चरन् नियतोऽन्वहम्।
सर्वान् कामानवाप्नोति स रामो राममाप्नुयात् ।।7।।
इसका समग्र अनुष्ठान सफल होता है। यदि साधक अशक्त हो, तो
नियमपूर्वक प्रतिदिन केवल मन्त्र का जप करता हुआ सभी कामनाओं को प्राप्त
कर लेता है। वह रामस्वरूप होकर श्रीराम को प्राप्त करता है।
सुतीक्ष्ण उवाच
श्रुतं त्वत्तो मया ब्रह्मन् रामस्याद्भुतकर्मणः।
विधानं सर्वमन्त्राणां सरहस्यमशेषतः ।।8।।
दशाक्षरादिमन्त्राणां विधानं च विशेषतः।
ज्ञानञ्च सम्यग्विधिवद् ब्रह्मप्राप्त्यैक साधनम् ।।9।।
इदानीं श्रोतुमिच्छामि प्रतिष्ठाविधिमञ्जसा।
कदा कुत्र कथं चेति सर्वज्ञस्त्वं यतोऽसि मे ।।10।।
ब्रूहि श्रद्दधतः स्वामिन् यतः कारुणिको भवान् ।।11।।
सुतीक्ष्ण बोले- अद्भुत कृत्यों के कर्ता श्रीराम की पूजा का विधान तथा
उनके सभी मन्त्रों का रहस्य मैंने आपसे सुन लिया। दशाक्षर आदि मन्त्रों का
विशेष विधान तथा विधिवत् सम्यक् ज्ञान भी प्राप्त किया, जो ब्रह्मप्राप्ति का साधन
है। अब संक्षेप में मूर्ति-प्रतिष्ठा की विधि सुनना चाहता हूँ कि किस दिन, किस
स्थान पर और कैसे प्रतिष्ठा करनी चाहिए। आप तो सबकुछ जानते हैं; आपके
प्रति मेरी श्रद्धा है अतः हे स्वामी! मुझे यह बतलाएँ; क्योंकि आप तो करुणा
करनेवाले हैं।

(212) अगस्त्य-संहिता

अगस्त्य उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया विद्वन् गुह्याद् गुह्यतमं परम्।
यः पश्यति हरेः पुण्यां प्रतिष्ठां विधिवत्कृताम् ।।12।।
सोऽपि पुण्यतमो लोके पापात् सद्यो विमुच्यते।
श्रीरामस्य प्रतिष्ठायाः फलं वक्तुं पितामहः ।।13।।
न शक्तः स्यान्महेशोऽपि सहस्त्रवदनोऽपि च।
अगस्त्य बोले- हे सुतीक्ष्ण! आपने ठीक ही प्रश्न किया। यह जिस किसी
भी व्यक्ति को कहने योग नहीं है, सँभालकर रखने की वस्तु है। जो विधानपूर्वक
की गयी विष्णु की मूर्ति-स्थापना का दर्शन करते हैं, वे इस संसार में श्रेष्ठ पुण्य
प्राप्त करते हैं और पापों से मुक्त हो जाते हैं। श्रीराम की प्रतिष्ठा का फल
बखानने में ब्रह्मा, महेश और शेषनाग भी समर्थ नहीं हैं।
येन केन प्रकारेण यत्र कुत्रापि वा मुने ।।14।।
यैः कैश्चिद् कृतं चेत् स्यात् लोके धन्यतमा हि ते।
कालप्रतीक्षां नो कुर्याद् विधिं चापि विशेषतः ।।15।।
यदैव भक्तिरुत्पन्ना तदा स्थाप्यो रघूद्वहः।
हे मुनि! जिस किसी भी विधि से जहाँ कहीं भी जो कोई व्यक्ति श्रीराम की
मूर्ति-प्रतिष्ठा करते हैं, वे सबसे अधिक धन्य हो जाते हैं। इसमें अच्छे मुहूर्त की
प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, उचित विधान के भी भरोसे नहीं रहना चाहिए, जिस
दिन ही भक्ति उपजे, उसी दिन श्रीराम की स्थापना करनी चाहिए।
विनापि चन्द्रतारादिबलं नक्षत्रमेव च ।।16।।
चैत्रशुद्धनवम्यां तु प्रतिष्ठाप्यो रघूत्तमः।
अशक्तश्चेन्नवम्यां तु माघशुद्धदिनेऽपि वा ।।17।।
चैत्र शुक्ल नवमी को चन्द्र, तारा आदि का बलाबल और नक्षत्रों की
शुद्धि न रहने पर भी श्रीराम की स्थापना करें। माघ मास के शुक्लपक्ष की नवमी
तिथि को भी स्थापना करें।
चन्द्रतारादिसम्पन्ने प्रतिष्ठाप्यो विधानतः।
मार्गशीर्षेऽथवा पूर्णे वैशाखे वा समाहितः ।।18।।
मूलादिदोषरहिते प्रतिष्ठा राघवस्य तु।
प्रकुर्याच्च विधानेन शक्त्या भक्त्या प्रयत्नतः ।।19।।

एकोनत्रिंशोऽध्यायः (213)
अग्रहण अथवा वैशाख मास की पूर्णिमा को चन्द्र तारा आदि के बली होने
पर मूल आदि नक्षत्र-दोष न रहने पर विधानपूर्वक श्रीराम की प्रतिष्ठा करें।
प्रयत्न कर विधान से अपनी शक्ति के अनुसार भक्ति के साथ स्थापना करें।
गोपालस्य प्रतिष्ठायां श्रावणं शस्यते सदा।
नृसिंहानां तु वैशाखे केशवस्यापि शस्यते।।20।।
चैत्रे तु रामचन्द्रस्य माघे वापि बलान्विते।
अनन्तस्यापि माघे स्यादन्येषां च यथारुचि ।।21।।
श्रीकृष्ण की स्थापना में श्रावण मास, नृसिंह और केशव आदि की स्थापना
में वैशाख प्रशस्त मास हैं। श्रीराम की स्थापना चैत्र मास में और चन्द्रतारा आदि
बली रहे तो माघ में एवं अनन्त भगवान् की स्थापना माघ में करें। अन्य देवताओं
की स्थापना अपनी रुचि के अनुसार करें।
सर्वकालेषु सर्वत्र प्रतिष्ठाप्यो रघूत्तमः।
न लग्नं न तिथिवारो न नक्षत्रबलं न च ।।22।।
सभी कालों में, किसी भी स्थान पर श्रीराम की स्थापना करें, इसके लिए,
लग्न, तिथि, दिन और नक्षत्र के बल की गणना अपेक्षित नहीं है।
चैत्रशुद्धनवम्यां च स्थाप्यो रामो मुमुक्षुभिः।
सर्वान् कामानवाप्नोति माघे शुभबलान्विते ।।23।।
कुर्यात् श्रीरामचन्द्रस्य प्रतिष्ठां वै नरोत्तमः।
मार्गशीर्षे च वैशाखेऽप्येवमेव यथाविधिः।।24।।
मोक्ष चाहनेवाले चैत्र शुक्ल नवमी को श्रीराम की स्थापना करें। इससे
उनकी सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। माघ मास में चन्द्र और तारा का शुभ
बल देखकर मनुष्यों में श्रेष्ठ श्रीराम की स्थापना करें। अग्रहण और वैशाख में भी
यही नियम है।
सूर्यग्रहे महापुण्ये कुरुक्षेत्रे विधानतः।
कृतैर्यत्पुण्यमाप्नोति तुलापुरुषाकादिभिः ।।25।।
तत्पुण्यं प्राप्नुयान्मर्त्यः प्रतिष्ठाप्य रघूत्तमम्।
यः कुर्याद्रामचन्द्रस्य प्रतिष्ठां विधिवन्नरः।।26।।
ऐहिकानखिलान् भोगान् भुक्त्वा नारायणो भवेत्।

(214) अगस्त्य-संहिता
वर्द्धते तत्कुलं भौमे कल्पकोटिशताधिकम् ।। 27 ।।
नापण्डितो नापि मूर्खो न दरिद्रोऽपि तत्कुले।
नावैष्णवोऽपि जायेत कदाचिदपि कुत्रचित् ।। 28 ।।
सूर्य-ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में विधानपूर्वक तुलापुरुष आदि दान करने से
जो पुण्य मिलता है, वही श्रीराम की मूर्तिप्रतिष्ठा करके मिलता है। जो मनुष्य
विधानपूर्वक श्रीरामचन्द्र की मूर्ति स्थापित करते हैं, वे सांसारिक सभी सुखों का
भोगकर नारायण हो जाते हैं। इस संसार में उनके कुल की वृद्धि सौ करोड़ कल्पों
तक होती है। उनके कुल में सभी विद्वान् होते हैं कोई न तो मूर्ख होता है, न
दरिद्र। कभी कहीं भी उनके कुल में विष्णु की भक्ति से हीन नहीं होते।
लौहेन निर्मिता वापि दारुणा वा यथाविधि।
कारयेत् प्रतिमां रम्यां श्रीरामस्य शुभे दिने ।। 29 ।।
लक्ष्मणस्यापि सीतायाः मारुतेश्च विशेषतः।
सीता स्वर्णनिभा कार्या लक्ष्मणोऽपि तथा भवेत् ।। 30 ।।
लोहा अथवा काष्ठ से शुभ दिन में श्रीराम की सुन्दर प्रतिमा का निर्माण
कराना चाहिए। अपने अपने वैशिष्ट्य के अनुसार लक्ष्मण, सीता और हनुमान्
की भी प्रतिमा का निर्माण कराना चाहिए। सीता की प्रतिमा सोना के समान
चमकीली होनी चाहिए, लक्ष्मण की भी उसी प्रकार होनी चाहिए।
संशोध्य देवतागारं निर्माणस्थानमुत्तमम्।
शल्यलोष्टादिवर्ज्यञ्च कुर्याद्यत्नेन शोधयेत् ।। 31 ।।
खनेत् तद्भूप्रदेशान्तं जलोत्पत्तिर्यथा भवेत्।
यथा पाषाणसिकताः पूरयेत्पूर्ववत् सुधीः ।। 32 ।।
कुट्टिमं च प्रकुर्वीत निवासस्थानमुत्तमम्।
शुद्धरम्यशिलापट्टैरनेकेश्च सुविस्तरैः ।। 33 ।।
देववासप्रदेशं तु पूर्ववद्भूमिकोन्नतम्।
हस्तद्वयोन्नतं कुर्यात् सुविस्तीर्णं मनोरमम् ।। 34 ।।
कुर्याद्दिवालयं रम्यं सर्वनेत्रोत्तमं परम्¹।

  1. क. सर्वनेत्रोत्सवं यथा।

एकोनत्रिंशोऽध्यायः (215)
प्राकारं कारयेत्तत्र *चतुर्गोपुरसंयुतम्¹ ।।३५।।
पीठं रम्यं प्रकुर्वीत शिलायां चोन्नतोन्नतम्।
हस्तद्वयायतं कुर्याच्चतुरस्रं सुशोभनम् ।।३६।।
मन्दिर तथा चारों ओर के स्थान से काँटा, गड़ा हुआ ढेला (पत्थर, ईंट
आदि का टुकड़ा) प्रयत्नपूर्वक हटाकर शोधन करें। तब उस स्थान पर तब तक
खुदाई करें, जबतक पानी नहीं छूट जाता है। तब उस गड्ढे को पत्थर और बालू
आदि से भर दें और ऊपर पत्थर कूट कूट कर दृढ़ बनावें। इस उत्तम निवास
स्थान को शुद्ध तथा सुन्दर बड़े शिलापट्टों से मन्दिर की भूमि को पूर्वोक्त विधि से
दो हाथ ऊँची और सुन्दर रूप से विस्तृत करें। वहाँ पर रम्य देवालय का निर्माण
करें, जो सबकी आँखों को अच्छा लगे। वहाँ चारों ओर मेहराव से युक्त भवन
बनाएँ। उसमें पत्थर की शिला पर क्रमशः ऊँचा करते हुए सुन्दर पीठ का निर्माण
करावें। यह पीठ दो हाथ लंबा-चौड़ा चौकोर और सुन्दर होना चाहिए।
अग्रभागे हनूमन्तं पीठस्य विलिखेन्मुने।
पीठशुद्धिं प्रकुर्वीत वक्ष्यमाणविधानतः ।।३७।।
लिखेदाग्नेयदिग्भागे सुग्रीवं द्विभुजं पुनः।
दक्षिणे भरतं चैव नैर्ऋत्ये च विभीषणम् ।।३८।।
पश्चिमे लक्ष्मणं चैव वायव्येऽङ्गदमेव च।
शत्रुघ्नं चोत्तरे भागे ऐशान्यामृक्षनायकम्² ।।३९।।
इस पीठ के अग्रभाग में हनुमान् की आकृति बनावें। तब आगे कहीं
जानेवाली विधि से पीठ की शुद्धि करें। अग्निकोण में दो बाहों वाले सुग्रीव,
दक्षिण में भरत, नैर्ऋत्य कोण में विभीषण पश्चिम में लक्ष्मण, वायव्य में अंगद,
उत्तर में शत्रुघ्न और ईशान कोण में जाम्बवान् को उत्कीर्ण करें।
ततः श्रीरामचन्द्रं च पीठस्योपरि वै लिखेत्।
सौवर्णे राजते वापि ताम्रे वापि यथाविधि ।।४०।।
शिलायां वा प्रकुर्वीत चतुरस्रं सुशोभितम्।
द्वात्रिंशदङ्गुलं वापि षोडशाङ्गुलमेव च। ।४१।।
देवस्य स्थापनस्थाने तद्यन्त्रं स्थापयेन्मुने।

  1. ग. रम्यगोपुरसंयुतम् । 2. ग. ऐशान्ये जाम्बुनायकम् ।

(216) अगस्त्य-संहिता
इसके बाद पीठ के ऊपर श्रीराम को सुवर्ण, रजत, ताम्र अथवा प्रस्तर के
पीठ पर विधि के अनुसार उत्कीर्ण करें। देवता की स्थापना के स्थान पर उनके
यन्त्र की स्थापना करें। यह यन्त्र सुन्दर चौकोर, बत्तीस अथवा सोलह अंगुल
परिमाण का होना चाहिए।
अङ्कुरार्पणमादौ तु सप्तपञ्चत्रिवासरे।।42।।
यथाविधि प्रकुर्वीत चन्द्रताराबलान्विते।
सबसे पहले सात, पाँच अथवा कमसे कम तीन दिन पूर्व अंकुरार्पण चन्द्र
तारा आदि के बली होने पर विधान से करें।
गणेशप्रार्थनां कुर्यात् सर्वविघ्नोपशान्तये।।43।।
सुवर्णप्रतिमां पूज्यां वस्त्रद्वयसमन्विताम्।
कुटुम्बिने दरिद्राय ब्राह्मणाय निवेदयेत्।।44।।
एकाक्षरो गणेशस्य ध्यानमार्गेण यत्नतः।
श्रीरामप्रतिमां वापि दशाक्षरविधानतः।।45।।
आत्ममूलेन वाचापि द्वादशाक्षरमार्गतः।
येन केनापि मार्गेण कारयेद्विधिवन्मुने।।46।।
तब गणेश की प्रार्थना सभी प्रकार के विघ्नों की शान्ति के लिए करें।
जोड़ा वस्त्र से युक्त स्वर्ण-प्रतिमा की पूजा कर गृहस्थ एवं दरिद्र ब्राह्मण को दान
करें। गणेश का एकाक्षर मन्त्र है, जिसका ध्यान कर अथवा श्रीराम की प्रतिमा
को दशाक्षर मन्त्र के विधान से अथवा अपने मूल मन्त्र से अथवा द्वादशाक्षर मन्त्र
की विधि से जिस किसी भी प्रकार से स्थापना कराएँ।
इत्यगस्त्यसंहितायां परमरहस्ये श्रीरामप्रतिष्ठाविधिर्नाम
एकोनत्रिंशोऽध्यायः।।29।।
अथ त्रिंशोऽध्यायः
सुतीक्ष्ण उवाच
कथं दशाक्षरादीनां मार्गो वै मुनिसत्तम।
आचक्ष्व सरहस्यं मे त्वयि भक्तस्य सुव्रत।।1।।

त्रिशोऽध्यायः (217)
सुतीक्ष्ण ने पूछा- हे मुनिश्रेष्ठ! दशाक्षर आदि मन्त्र की कैसी पद्धति है, यह
मुझे रहस्य के साथ बताएँ, जो आपकी दृष्टि में हो।
अगस्त्य उवाच।
साधु वक्ष्यामि ते सर्वं शृणुष्वावहितो मुने।
सीतालङ्कृतवामाङ्कं द्विभुजं चारुलोचनम् ।। २ ।।
वामहस्तेन सीतायाः स्पृशन्तं स्तनमण्डलम्।
ज्ञानमुद्रायुतेनान्येनापि तल्लोकसुन्दरम् ।। ३ ।।
धनुर्द्वययुतेनापि लक्ष्मणेन सुशोभितम्।
कोटिकन्दर्पसंकाशं राघवं करुणाकरम् ।। ४ ।।
उपविष्टं पद्ममध्ये वीरासनमनोहरम्।
हनुमत्सेवितं चाग्रे कुर्यादेवं मनोहरम् ।। ५ ।।
अगस्त्य बोले- हे मुनि! अच्छा, मैं तुम्हें सब कहता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक
सुनो। जिनके वामभाग में सीता शोभित हों, बायें हाथ से सीता के स्तनमण्डल को
स्पर्श करते हुए दूसरे हाथ से ज्ञानमुद्रा धारण करनेवाले दो भुजाओं वाले एवं
सुन्दर आँखों वाले श्रीराम का ध्यान करें। जो दो धनुष लिए हुए लक्ष्मण से
शोभित हैं, करोड़ों कामदेव के समान सुन्दर हैं, कमल के मध्य में वीरासन में बैठे
हुए हैं, करुणा करनेवाले हैं तथा जिनके आगे हनुमान आज्ञा की प्रतीक्षा में है।
दशाक्षरोऽयं कथितो विधिना मुनिपुङ्गवैः।
नीलोत्पलदलश्यामं पीताम्बरधरं विभुम् ।। ६ ।।
द्विभुजं कंजनयनं दिव्यसिंहासने स्थितम्।
वसिष्ठाद्यैः परिवृतं हाररत्नकिरीटिनम् ।। ७ ।।
सीतासंलापचतुरं दिव्यगन्धादिशोभितम्।
चापद्वयकरेणारात् सेवितं लक्ष्मणेन च ।। ८ ।।
शत्रुघ्नभरताभ्यां च पार्श्वयोरुपसेवितम्।
ऐसे श्रीराम का दशाक्षर मन्त्र 'क्लीं सीतारामचन्द्राभ्यां नमः' है। नीलकमल
के समान श्यामल वर्णवाले, पीताम्बरधारी, दो हाथों वाले, कमलनयन, दिव्य
सिंहासन पर स्थित, वसिष्ठ आदि पार्षदों से चारो ओर से घिरे हुए, रत्न का मुकुट
धारण करनेवाले, श्रीसीता के साथ आलाप करने में चतुर, दिव्य चन्दन आदि से
Rarest Archiver

(218) अगस्त्य-संहिता
शोभित दो धनुष हाथ में लिए हुए लक्ष्मण द्वारा दूर से सेवित, दोनों पार्श्वों में
शत्रुघ्न और भरत से सेवित प्रभु श्रीराम ध्यातव्य हैं।
ध्यायन्ननन्यधी रामं द्वादशाक्षरमन्वहम् ।।९।।
प्रजपेद्दीक्षितो नित्यं श्रीरामन्यासपूर्वकम्।
मन्त्रसन्ध्यां विधायैव त्रिकाले पूजयेत् सदा ।।१०।।
ऐसे श्रीराम का ध्यान करते हुए दीक्षित द्वादशाक्षर मन्त्र 'रां क्लीं ह्रीं ऐं हुं
क्षौं श्रीं आं क्रौं फट् स्वाहा' प्रतिदिन श्रीराम का न्यास और मन्त्रसन्ध्या कर जप
करे और तीनों कालों में पूजन करे।
क्रीडन्तं सीतया सार्द्धं नीलजीमूतसन्निभम्।
वृषाकपिच्छाद्यष्टेन वसिष्ठेन स्मृतं विभुम् ।।११।।
तद्गदादाय सौमित्रं चापबाणग्रहोद्यतम्।
चापद्वयभृतं पश्चाल्लक्ष्मणं तु सुशोभनम् ।।१२।।
सर्वलोकहितोद्युक्तं पीताम्बरधरं विभुम्।
ध्यायन् सप्ताक्षरं जप्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।^1 ।।१३।।
सीता के साथ क्रीडा करते हुए, नील मेघ के समान, वृषाकपिच्छ^1 अर्थात्
हनुमान् आदि आठ देवताओं और वसिष्ठ के द्वारा स्मरण किए गये श्रीराम,
जिनके पीठ पीछे दो धनुष लिए हुए सुन्दर रूप वाले लक्ष्मण धनुष और बाण
लेकर तैयार हैं। ऐसे श्रीराम, जो सभी लोकों की भलाई करने के लिए तैयार हैं,
पीत वस्त्र धारण करते हैं। ऐसे श्रीराम का ध्यान कर सात अक्षरों वाला मन्त्र
जपकर सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
सुनीलाम्बुदसंकाशं धनुर्बाणकरं मुने।
ध्यायेदष्टाक्षरं जप्त्वा राम एव भवेत्ततः ।।१४।।
सुन्दर नील मेघ के समान तथा हाथ में धनुष और बाण धारण करने वाले
श्रीराम का ध्यान करते हुए अष्टाक्षर मन्त्र का जपकर इससे साधक राम ही हो
जाये।
ज्ञानमुद्रालसद्बाहुं हनुमत्सेवितं पुनः।
शत्रुघ्नभरताभ्यां च लक्ष्मणेन समावृतम् ।।१५।।
ध्यायेदेकाक्षरं जप्त्वा मुक्तो भवति भाजनम्।

  1. वैदिक साहित्य में 'वृषाकपि' वानरवाची शब्द प्रयुक्त हुआ है।

त्रिंशोऽध्यायः (219)

श्रीराम हाथ से ज्ञान मुद्रा धारण किए हुए हैं, हनुमान् जिनकी सेवा कर
रहे हैं तथा शत्रुघ्न, भरत और लक्ष्मण से घिरे हुए हैं। ऐसे श्रीराम का ध्यान
करते हुए आधार स्वरूप एकाक्षर मन्त्र का जप कर साधक मोक्ष प्राप्त करता है।
अन्याश्च मूर्त्तयः सन्ति बहवो मुनिसत्तम ।।16।।
आसामन्यतमा मूर्तिः स्थापनीया प्रयत्नतः।
मन्त्राँस्तु वैष्णवानुक्त्वा मूलमन्त्रस्य चेतसा ।।17।।
देवस्यापि प्रकुर्वीत ततोऽस्ति किमतः परम्।
प्राणप्रतिष्ठां तन्न्यासान् यथाविधि विचक्षणाः ।।18।।
लक्ष्मणस्यापि मन्त्रस्य न्यासं देव्याश्च मारुतेः।
शत्रुघ्नभरतादीनां कुर्याद्यत्नेन देशिकः ।।19।।
हे मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्ण! श्रीराम की ऐसी अन्य अनेक मूर्तियाँ हैं। इनमें से
एक मूर्ति की स्थापना यत्नपूर्वक करनी चाहिए। वैष्णव-मन्त्रों का उच्चारण कर
मूल मन्त्र का उचित प्रयोग करें, इससे बढ़कर और क्या होगा? लक्ष्मण, देवी
सीता तथा हनुमान् के दिव्य-मन्त्रों को तथा शत्रुघ्न, भरत आदि के मन्त्रों का भी
न्यास प्रयोग-साधक यत्नपूर्वक करें।
सुतीक्ष्ण उवाच
लक्ष्मणादिमनूनां च विधानं लक्षणं मुने।
वक्तुमर्हसि मे सर्वं भक्तस्यैवं दयानिधे ।।20।।
सुतीक्ष्ण ने कहा- हे दयानिधि अगस्त्य! लक्ष्मण आदि के मन्त्रों के लक्षण
एवं विधान भी आप मुझे कह सकते हैं, क्योंकि मैं भी भक्त हूँ।
अगस्त्य उवाच
शृणु वक्ष्यामि ते सर्वं सुविस्तरमनेकधा।
रेफपूर्वं समुद्धृत्य विन्दुलक्षणसंयुक्तम् ।।21।।
ङेन्तोयं लक्ष्मणमनुर्नमसा च समन्वितः।
ऋषिः स्यामहमेवात्र गायत्रीच्छन्द उच्यते ।।22।।
लक्ष्मणो देवता प्रोक्ता लं बीजं शक्तिरेव हि।
नमः स्याद्विनियोगे हि पुरुषार्थचतुष्टये ।।23।।
दीर्घमात्राञ्च बीजेन षडङ्गानि समाचरेत्।