अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाविंशोऽध्यायः (209)
एवं सम्पूजिते पीठे देवमावाह्य पूजयेत्।
अर्घ्यादिधूपदीपान्तमुपचारान् निधाय च।।३४।।
ततोऽनुज्ञाप्य देवेशं परिचारांश्च पूजयेत्।
इस प्रकार पीठ की पूजा कर उसपर देव श्रीराम का आवाहन कर अर्घ्य से
धूप-दीप तक उपचार समर्पित कर देवेश के प्रति आत्मनिवेदन कर श्रीराम के
परिचारकों की पूजा करें।
पूर्वादिषट्सु कोणेषु हृदयादीनि च क्रमात्।।३५।।
मूलमन्त्रेण कर्तव्यमुपचारास्तु षोडश।
इन्द्रादिलोकपालाँश्च वसिष्ठादिमुनीनपि।।३६।।
सर्वं दिक्पालमन्त्रेण पूजयेद् भक्तिसंयुक्तम्।
अशोककुसुमैर्युक्तमर्घ्यं देवस्य दापयेत्।।३७।।
पूर्व दिशा से प्रारम्भ कर षट्कोण में हृदयादि का न्यास करें और षोडशोपचार
मूलमन्त्र से करें। इन्द्र आदि लोकपाल और वसिष्ठ आदि मुनियों की भी पूजा
दिक्पाल के मन्त्र से भक्तिपूर्वक करें तथा अशोक के फूल से युक्त अर्घ्य समर्पित
करें।
दशाननवधार्थाय देवानां हिताय च¹।
धर्मसंस्थापनार्थाय दैत्यानां निधनाय च।।३७।।
परित्राणाय साधूनां जातो रामः स्वयं हरिः।
गृहाणार्घ्यम्मया दत्तं भ्रातृभिः सहितोऽनघ।।३८।।
“रावण के वध के लिए, देवताओं के कल्याण के लिए, धर्म की स्थापना के
लिए तथा सज्जनों की रक्षा के लिए स्वयं भगवान् विष्णु श्रीराम के रूप में उत्पन्न
हुए। हे पुण्यस्वरूप श्रीराम! मेरे द्वारा अर्पित यह अर्घ्य अपने भ्राताओं के साथ
स्वीकार करें।”
प्रतिमायां विशेषेण अर्चयेद्रघुनन्दनम्।
पौराणस्तोत्रपाठैश्च वेदपारायणेन च।।३९।।
नृत्यगीतैश्चवाद्यैश्च रात्रिशेषं व्यपोह्य च।
विशेष रूप से प्रतिमा पर श्रीराम की अर्चना पुराणोक्त स्तोत्रों का पाठ
कर, वेद मन्त्रों का पाठ कर, नृत्य, गीत, वाद्य आदि से रात्रि में जागरण के साथ करें।
- ग. विभीषणश्रियेऽपि वा ।