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सर्वकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 337 में से

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पृष्ठ 135

(74) अगस्त्य-संहिता

सहौ शरौ च यश्चापि षश्च लश्च वलावपि। । 43 ।।
क्षौं चेति दश वर्णांश्च प्रणवान्ते च पूर्ववत्।¹
स एवं ह, श एवं र, य, ष, ल, व, ल तथा क्षौं ये दश वर्ण हैं, जो पूर्वोक्त
विधि से प्रणव ॐकार के बाद लगाये जायेंगे।
हृत्पद्मे सोमसूर्याग्नित्वकलायुक्तमण्डलम् ।। 44 ।।
त्रयं हृद्येव विन्यस्य वासुदेवादयस्तथा।
परमेष्ठी च पुरुषो विश्वस्यापि निवर्तकः ।²। 45 ।।
नारायणो नृसिंहश्च सर्वकोपाख्यपूर्वकौ।
मूर्द्धास्ये हृदि गुह्ये च पादयोर्व्यापकं तथा ।। 46 ।।
तदात्मने नम इति तत्तत्स्थाने न्यसेत् ततः।
हृदय रूपी कमल में, अपनी कलाओं के साथ सोममण्डल, सूर्यमण्डल एवं
अग्निमण्डल की कल्पना कर इन तीनों का हृदय में ही न्यास करें और वासुदेवादि
न्यास करें। वासुदेव, परमेष्ठी, पुरुष, विश्वनिवर्तक, नारायण और नृसिंह, ये छह
देव हैं। यहाँ दोनों प्रकार के न्यासों में कोप-मन्त्र (हुम्) को पूर्व में व्यवहार करें।
इसमें 'तदात्मने नमः' यह योग कर मूर्द्धा, मुख, हृदय, गुह्य, दोनों पैर एवं सर्वांग
में न्यास करें। जैसे-
ॐ हुं वासुदेवाय मूर्द्धात्मने नमः इति मूर्ध्नि।
ॐ हुं परमेष्ठिने मुखात्मने नमः इति मुखे।
ॐ हुं पुरुषाय हृदयात्मने नमः इति हृदि।
ॐ हुं विश्वनिवर्तकाय गुह्यात्मने इति गुह्ये।
ॐ हुं नारायणाय पादात्मने इति पादयोः।
ॐ हुं नृसिंहाय सर्वाङ्गात्मने नमः इति सर्वाङ्गे।
अतत्त्वस्याप्यपूज्यस्य तत्प्राप्तेर्हेतुना³ पुनः ।। 47 ।।
तत्त्वन्यासमिदं प्राहुर्न्यासं तत्त्वविदो बुधाः।
जो तत्त्व नहीं है और पूज्य भी नहीं है उसकी प्राप्ति के लिए कारण के साथ
उन तत्त्वों के न्यास को मनीषियों ने तत्त्व-न्यास कहा है।
यः कुर्यात् तत्त्वविन्यासं स एव भवति ध्रुवम् ।। 48 ।।
तदात्मनानुप्रविश्य भगवानिह तिष्ठति।
यतः स एव तत्त्वानि तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।। 49 ।।

  1. घ. प्रणम्यान्ते च पूर्ववत्। 2. घ. विश्वकोऽपि निवृत्तिकः। 3. क. तत्प्राप्तौ
    हेतना।