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सर्वकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 337 में से

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पृष्ठ 134

द्वादशोऽध्यायः (73)
सुतीक्ष्ण तत्त्वं बक्ष्यामि तत्त्वन्यासमतः शृणु ।।३५।।
यत्तत्त्वन्यासमात्रेण तत्त्वमेव प्रजायते।
मादयः प्रतिलोमेन कान्ताः स्युस्तत्त्वसंज्ञया।।३६।।
हे सुतीक्ष्ण! अब मैं तत्त्व को बतलाता हूँ। इसलिए तत्त्वन्यास सुनो।
केवल तत्त्वन्यास से तत्त्व उत्पन्न होता है। मकार से प्रारम्भ कर 'क' से अन्त कर
किया गया न्यास तत्त्वन्यास कहलाता है।
नमः पराय पूर्वन्तु प्रणवान्ते व्यवस्थिताः।
जीवः प्राणाश्च बुद्धिश्चाहंकारो मनस्तथा।।३७।।
सर्वाङ्गे हृदि विन्यस्य श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यपि।¹
मूर्ध्नि घ्राणे च हृदयेऽप्युपस्थे पादयोरपि।।३८।।
‘नमः पराय’ इस मन्त्र को सबसे पहले प्रणव के बाद जोड़कर जीव, प्राण,
बुद्धि, अहंकार एवं मन को सर्वाङ्ग एवं हृदय में न्यास कर श्रोत्र आदि पाँच
इन्द्रियों को भी मूर्द्धा, घ्राण, हृदय, उपस्थ एवं दोनों पैरों में न्यास करें।
श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वा च घ्राणरूपाणि देहिनाम्।
ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चापि तत्तत्स्थाने न्यसेत् पुनः।।३९।।
वाक्पाणिपायुपादांश्च कर्माख्यानि ह्युपस्थकम्।
तथैव तत्तत् स्थानेषु तत्तदेव प्रविन्यसेत्।।४०।।
दोनों कान, त्वचा, दोनों आँखें, जीभ, और नासिका, ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ
है तथा वाणी, दोनों हाथ, दोनों पैर, गुदा, और जननेन्द्रिय, ये पाँच कर्मेन्द्रिय हैं।
उन उन स्थानों में न्यास करें। इसी क्रम से उन उन स्थानों उन उन तत्त्वों का
न्यास करें।
शिरोमुखे च हृदये तथा गुह्येपि पादयोः।
आकाशानिलतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा।।४२।।
विन्यसेत् पूर्ववच्चैव न्यासविद्भिरुदीरितम्।²
शिर, मुख, हृदय, गुह्य एवं दोनों पैरों में क्रमशः आकाश, वायु, तेज, जल
एवं पृथिवी का न्यास पूर्ववत् मन्त्र के साथ न्यास के ज्ञानियों के द्वारा कही गयी विधि
से करें।

  1. घ. शब्दादीनि ततः परम्। 2. घ. ०रुदाहृतम्।