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सर्वकोश
अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)

Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary

महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा

DevanagariSanskritpublished337 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 337 में से

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पृष्ठ 130

द्वादशोऽध्यायः (69)
3. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं इं माधवाय तुष्ट्यै नमः।
4. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ईं गोविन्दाय पुष्ट्यै नमः।
5. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं उं विष्णवे धृत्यै नमः।
6. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऊं मधुसूदनाय शान्त्यै नमः।
7. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऋं त्रिविक्रमाय क्रियायै नमः।
8. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ॠं वामनाय पुष्ट्यै नमः।
9. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऌं श्रीधराय मेधायै नमः।
10. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ॡं हृषीकेशाय हृष्ट्यै नमः।
11. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं एं पद्मनाभाय श्रद्धायै नमः।
12. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं दामोदराय लज्जायै नमः।
13. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ओ वासुदेवाय लक्ष्म्यै नमः।
14. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं औं संकर्षणाय सरस्वत्यै नमः।
15. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अं प्रद्युम्नाय प्रीतये नमः।
16. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अः अनिरुद्धाय रत्यै नमः।
ये स्वर मातृकाओं के अन्त में बोलें।
यहाँ श्लोक संख्या 18 में 'वामनायं' के बाद 'दयायै' शब्द 'क' पाण्डुलिपि
में है। ध्यातव्य है कि यहाँ विष्णु के 16 रूपों के साथ षोडशमातृकाओं का उल्लेख
हुआ है। 'पुष्टि' को छोड़कर शेष 15 मातृकाएँ स्पष्ट हैं, अतः यहाँ 'पुष्ट्यै च' पाठ
माना जाना चाहिए।
चक्रिणे विजयायै च गदिने शार्ङ्गिणे तथा ।।21।।
दुर्गायै च प्रभायै च [सत्यायै] खङ्गिने [तथा] ।
[शंखिने च चण्डायै नमो तदनन्तरं वदेत्] ।।22।।
हलिने च तथा वाण्यै नमो मुसलिने वदेत्।
विलासिन्यै शूलिने च जयायै तदनन्तरम् ।।23।।
पाशिने विरजायै च तथा चाङ्कुशिने वदेत्।
विश्वायै च मुकुन्दाय विमदायै नमस्ततः।। 24 ।।
नन्दजाय सुनन्दायै नन्दिने स्मृतये नमः।
नराय ऋद्ध्यै तद्वच्च नरकजिते तथा वदेत् ।।25।।
समृद्धयै हरये शुद्ध्यै कृष्णाय तुष्ट्यै तथा।