अगस्त्य संहिता (महर्षि अगस्त्य - पञ्चरात्र राम-उपासना एवं मन्त्र-विधान सटीक)
Agastya Samhita of Sage Agastya with Commentary
महर्षि अगस्त्य / पं. भवनाथ झा द्वारा
पृष्ठ 129, कुल 337 में से
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इस प्रकार अन्तर्मातृका न्यास कर मन ही मन बहिर्मातृकान्यास करें।
शिर, मुखवृत्त, दोनों नेत्रों और कानों में, दोनों नाकों और दोनों गालों, अधर,
एवं ओष्ठ, ऊर्ध्वदन्त पंक्ति, अधोदन्त पंक्ति, मूर्द्धा एवं मुख इन सोलह अंगों में
सोलह स्वरों का न्यास करें। इसके बाद क वर्ग एवं च वर्ग से क्रमशः दक्षिण और
वाम बाहु के पाँच सन्धि स्थलों (बाहुमूल, कूर्प्पर, मणिबन्ध, अंगुलिमूल एवं
अंगुल्यग्र) में न्यास करें। इस प्रकार ट वर्ग एवं त वर्ग से दक्षिण एवं वामपाद के
पाँच सन्धिस्थलों (पादमूल, कूर्प्पर, मणिबन्ध, पादमूल एवं पादमूलाग्र) पर न्यास
करें। प वर्ग से क्रमशः दक्षिणपार्श्व, वामपार्श्व, पृष्ठ, नाभि एवं उदर में न्यास
करें। हृदय, दक्षिण बाहुमूल, ककुत्, वामबाहुमूल, हृदादिदक्षकर, हृदादिवामकर,
हृदादिमुख में क्रमशः य से क्ष तक वर्णों का न्यास करें। पचास मातृकावर्णों का इस
प्रकार न्यास विहित है।
ॐ माद्यन्तो नमोन्तो वा सबिन्दुबिन्दुवर्जितः ।।15।।
मायालक्ष्मीकामबीजपूर्वो न्यस्तव्य उच्यते।
केशवाय च कीर्त्यै च तथा नारायणाय च।।16।।
कान्त्यै तथा माधवाय तुष्ट्यै नम इति न्यसेत् ।।
गोविन्दाय च तुष्ट्यै¹ च विष्णुर्धृत्यै वदेत् ततः।।17।।
मधुसूदनाय शान्त्यै च त्रिविक्रमाय क्रियायै च।
वामनाय च पुष्ट्यै² च श्रीधराय वदेत्तदा।।18।।
मेधायै हृषीकेशाय हृष्ट्यै³ चापि नमस्तथा।
पद्मनाभाय श्रद्धायै⁴ तथा दामोदराय च।।19।।
लज्जायै वासुदेवाय लक्ष्म्यै संकर्षणाय च।
सरस्वत्यै प्रद्युम्नाय प्रीत्यै नम इतीरयेत् ।।20।।
अनिरुद्धाय रत्यै च स्वरान्ते प्रवदेदथ।
मातृकान्यास में आदि और अन्त में ॐ लगाकर अथवा आदि में ॐ और
अन्त में नमः लगाकर, बिन्दु सहित अथवा बिन्दु रहित माया बीज (ह्रीं) लक्ष्मीबीज
(श्रीं) एवं कामबीज (क्लीं) आदि में जोड़कर न्यास करें।
- ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अं केशवाय कीर्त्यै नमः।
- ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं आं नारायणाय कान्त्यै नमः।
- घ. पुष्ट्यै। 2. घ. दयायै। 3. हर्षायै। 4. घ. शुद्धायै।