अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८९)
जगदेतन्महाबाहो पुनर्जातमिवाभवत् ॥ न रावणादभ्यधिको
दुष्टो लोकभयंकरः ॥ ११ ॥ दशास्यैर्दशदिक्कार्यमाज्ञापयति
राक्षसः ॥ स दशास्यो हतो राम दिष्ट्या च जगदुद्धृतम् ॥ १२ ॥
मानो यह जगत् फिर उत्पन्न हुआ है, रावणसे अधिक लोगोंको भयदायक
कोई दुष्ट नहीं था ॥ ११ ॥ इस राक्षसकी दशोंदिशाओंमें आज्ञा प्रचलित होती
थी, भाग्यसे उसको मारकर आपने जगत्का उद्धार किया ॥ १२ ॥
भगवानसि भूपाल ब्रह्मणा प्रार्थितः पुरा ॥ पुंडरीकविशालाक्षः
श्याम आजानुबाहुकः ॥ १३ ॥ अयोध्यायां प्रादुरभूदिक्ष्वाकुकुल
नंदनः ॥ त्वद्दर्शनान्महाबाहो निवृत्ताःस्मो वयं प्रभो ॥ १४ ॥
हे राम ! आप प्रथम ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेसे भूपालरूप धारण कर आये
हो, आपके कमलकेसे बडे नेत्र हैं, श्यामशरीर जानुपर्यन्त लम्बी भुजा हैं। १३ ।
इक्ष्वाकुकुलके आनन्द देनेको आप आयोध्यामें प्रगट हुए हो, हे प्रभो ! आपके
दर्शनसेही हम आनन्दित हो गये ॥ १४ ॥
तपश्चरामः सहितास्त्वत्प्रसादाद्वनेवने ॥ किंतु सीता महादेवी
प्राप दुखं महत्प्रभो ॥ १५ ॥ तदेव स्मर्यमाणं सच्चित्तमुद्वेजयेद्धि नः ॥
एवमुक्ते तु मुनिभिः सानुक्रोशं पुनः पुनः ॥ १६ ॥
आपके प्रसादसे वन वनमें निर्भयतप करते हैं, हे प्रभो ! परन्तु सीतादेवीने
महादुःख पाया है ॥ १५ ॥ यही स्मरण करनेसे हमारा चित्त उद्वेजित है,
जब दयासे वारम्वार मुनिजनोंने यह वचन कहे ॥ १६ ॥
जहास मधुरं साध्वी सीता जनक नंदिनी ॥ उवाच सस्मितं देवी
तान्मुनीन्मितभाषिणी ॥ १७ ॥ मुनयो यद्यदुक्तं हि रावणस्य वधं
प्रति ॥ परिहास इवाभाति प्रशंसनमिदं द्विजाः ॥ १८ ॥
तब जनकनंदिनी साध्वी सीता हँस पडी और हँसती हुई देवी उन मुनियोंसे
कहने लगी ॥ १७ ॥ जो कुछ मुनियोंने रावणके वधके प्रति कहा है हे ब्राह्मणो !
यह प्रशंसा परिहास कहलाती है ॥ १८ ॥
रावणो हि दुराचारः सत्यमेतन्न संशयः ॥ दशभिर्वदनैर्वीरो
जगदुद्वेजको हि सः ॥ १९ ॥ दशास्यस्य वधो विप्रा न प्रशंसामिहा-
र्हति ॥ एतच्छ्रुत्वा तु मुनयो विस्मयं परमं गताः ॥ २० ॥