अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकाटीकया समलङ्कृतम्
अभिज्ञानशकुन्तलम्
Prakashika Series
No. 10
General Editor
Dipti S. Tripathi
चन्द्रशेखरचक्रवर्तिकृतसन्दर्भदीपिकाटीकया समलङ्कृतम्
अभिज्ञानशकुन्तलम्
सम्पादकः
वसन्तकुमार म० भट्ट
राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन
॥ विज्ञानमृग्यम् ॥
National Mission for Manuscripts
राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन
नयी दिल्ली
तथा
न्यू भारतीय बुक कॉरपोरेशन
नयी दिल्ली
प्रकाशक :
राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन
11, मानसिंह रोड,
नई दिल्ली-110 001
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सह-प्रकाशक :
न्यू भारतीय बुक कॉरपोरेशन
208, द्वितीय तल, प्रकाशदीप बिल्डिंग,
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नई दिल्ली-110002
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E-mail : [email protected]
प्रथम संस्करण : 2013
© राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन
ISBN: 978-93-80829-02-9 (Series)
ISBN: 978-93-80829-18-0 (Vol. X)
मूल्य : Rs. 300.00
आमुख
संस्कृत साहित्य में ही नहीं विश्व साहित्य में भी अभिज्ञानशकुन्तलम् का स्थान अद्वितीय है। कालिदास का यह अद्भुत नाटक साहित्याकाश का वह जाज्वल्यमान प्रदीप है जिसने समालोचकों, साहित्यप्रेमियों एवं सामान्य पाठकों को भी रसाप्यायित किया है। लेकिन जिस प्रकार इसके रचयिता कालिदास के विषय में ऐतिहासिक प्रमाणों के भाव में मतमतान्तर प्रचलित हैं उसी प्रकार अभिज्ञानशकुन्तलम् को लेकर भी पाठों के विषय में अनेक भेद उपलब्ध होते हैं। सबसे पहले तो नाटक का नाम ही अभिज्ञानशकुन्तलम् एवं अभिज्ञानशाकुन्तलम् दोनों रूपों में उपलब्ध होता है। पुनः नाटक के आकार, विस्तार तथा उसमें उपलब्ध श्लोकों की संख्या को लेकर भी विद्वानों में मतैक्य नहीं है। इस नाट्यकृति की दो पाठ परम्पराएँ उपलब्ध होती हैं (1) लघुपाठ एवं (2) वृहत् पाठ। लघुपाठ परम्परा में, देवनागरी में लिखित एवं भारत के दाक्षिणात्य प्रान्तों में उपलब्ध पाठ प्रकाशित हो चुके हैं। वृहत् पाठ परम्परा में बंगाली, मैथिली, काश्मीरी एवं उत्कल प्रान्त में उपलब्ध पाठ-भेद विद्वानों के समक्ष मूल पाठ के निर्धारण में समस्याएँ उत्पन्न करते हैं। इतना ही नहीं इन पाठ-भेदों पर उपलब्ध टीकाओं की भी लम्बी सूची है। यह विपुल साहित्य कालिदास के मूल पाठ तक पहुँचने में अनेक रूपों में सहायक होता है तो उसके साथ ही अनेक समस्याएँ भी उत्पन्न करता है। यह खेद एवं चिन्ता का विषय है कि अद्यावधि शाकुन्तल की वैसी पाण्डुलिपि उपलब्ध नहीं हो सकी है जिसे कालिदास की मूलकृति के सर्वाधिक निकट माना जा सके। यह अनुपलब्धि जहाँ एक ओर सम्पादन का कार्य कठिन बना देता है वहीं दूसरी ओर इस बात का साक्षात् प्रमाण है कि काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एवं बंगाल से लेकर गुजरात तक इस नाटक को कितनी लोकप्रियता प्राप्त हुई थी। डॉ० रिचर्ड पिशेल ने सबसे पहले बंगाल में उपलब्ध पाठ के आधार पर समीक्षित पाठ का प्रकाशन किया था, उसके बाद से अनेक विद्वानों ने विभिन्न पाठों एवं टीकाओं की तुलना कर के मूल पाठ तक पहुँचने का प्रयत्न किया है।
कालिदास की कृतियों का कोई भी मूल पाठ उपलब्ध नहीं होने के कारण समालोचकों के लिए मूल पाठ के निर्धारण में टीकाएँ सहायक सामग्री सिद्ध होती हैं। केवल मूल ग्रन्थ के पाठों के आधार पर किया गया सम्पादन अनेक बार सर्वथा निर्दुष्ट पाठ का निर्धारण नहीं कर पाता क्योंकि मूल ग्रन्थ का पाठ-भेद लिपिकारों और नाटक के सन्दर्भ में मंचीय
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आवश्यकताओं के लिए निर्देशकों की दृष्टि और सुविधा से नियन्त्रित होता है। टीकाकार, रचना के साहित्यिक सन्दर्भों का, उसके गुण-दोषों का एवं पाठ की स्वीकार्यता का तार्किक विश्लेषण कर टीका में अपना मन्तव्य रखता है; इसीलिए शाकुन्तल जैसी प्रचलित एवं लोक प्रसिद्ध कृति के पाठ निर्धारण में टीकाओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
शाकुन्तल की शंकरकृत रसचन्द्रिका एवं नरहरिकृत अभिज्ञानशकुन्तल टिप्पणी मिथिला विद्यापीठ में सन् 1957 में प्रकाशित हो चुकी है। उत्कलीय पाठ पर श्री नवकिशोरकर शास्त्री ने आधुनिक काल में एक टीका लिखी है। देवनागरी पाठ पर राघव भट्ट की टीका का नाम अर्थद्योतनिका है। शाकुन्तल की सर्वाधिक टीकाएँ दाक्षिणात्य पाठ पर उपलब्ध होती हैं। इनमें से 'चर्चा' टीका के लेखक का नाम अज्ञात है लेकिन अन्य टीकाओं में काटयवेम की कुमारगिरिराजीया एवं अभिराम की दिङ्मात्रदर्शना उल्लेखनीय हैं। शाकुन्तलव्याख्या श्रीनिवासाचार्य की कृति है। घनश्याम ने संजीवन टिप्पण की रचना की है एवं नारायण पण्डित की टीका का नाम प्राकृतविवृति है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि दक्षिण भारत में शाकुन्तल अत्यधिक लोकप्रिय था और लम्बे समय तक समालोचना का विषय बना रहा।
चन्द्रशेखर नामक टीकाकार ने अभिज्ञानशकुन्तल पर सन्दर्भदीपिका नामक टीका लिखी है। इसी लेखक की शिशुपालवध पर सन्दर्भ चिन्तनम् टीका उपलब्ध होती है। विभिन्न अंतः साक्ष्यों के आधार पर प्रो० वसन्त भट्ट ने लेखक का समय ईसवी सन् 1600-1650 के बीच अनुमान किया है। 17वीं शताब्दी की यह टीका तत्काल उपलब्ध पूर्व के टीकाकारों की टीकाओं से निश्चय ही समृद्ध हुई होगी।
प्रो० वसन्त भट्ट ने पूर्व में अप्रकाशित टीका के सम्पादन में दो पाण्डुलिपियों का उपयोग किया है। जिनमें से एक को वे मूल एवं दूसरी को इसकी अनुकृति मानते हैं। सिर्फ टीका का सम्पादन करना इस बात को स्पष्ट नहीं करता कि वह टीका किस पाठ पर आधारित है अतः प्रो० भट्ट ने रिचर्ड पिशेल द्वारा सम्पादित पाठ को मूल आधार बनाया है।
प्रो० भट्ट ने अत्यधिक श्रम एवं निष्ठा से पूर्वापर का सम्यक् विनियोग करते हुए यह श्रम साध्य सम्पादन किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत प्रमाण आगे भी विद्वानों को अभिज्ञानशकुन्तल के कालिदासीय मूल पाठ तक पहुँचने में सहायता करेंगे, ऐसा विश्वास है। साहित्य के इस प्रामाणिक ग्रन्थ-सम्पादन के लिए मिशन प्रो० वसन्त भट्ट का आभारी है। न्यू भारतीय बुक कॉरपोरेशन ने इसके सुरुचिपूर्ण प्रकाशन में जो अभिनिवेश किया है उसके लिए मिशन की ओर से साधुवाद। विद्वज्जन की प्रतिक्रियाएँ मिशन के प्रकाशनों को सार्थकता एवं गति प्रदान करेंगी।
प्रथम आषाढ 1935
22 जून, 2013
नयी दिल्ली
दीप्ति त्रिपाठी
अस्मदीयम्
महाकवि कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् की देवनागरी वाचना पर राघवभट्ट की “अर्थद्योतनिका” टीका प्रकाशित है तथा दाक्षिणात्य वाचना पर बहुत सारी टीकायें प्रकाशित हुई हैं। इनमें काटयवेम की कुमारगिरिराजीया, अभिराम की दिङ्मात्रदर्शिनी, श्रीनिवासाचार्य की व्याख्या, घनश्याम की सञ्जीवन-टिप्पण, अज्ञातकर्तृक चर्चा टीका गणमान्य हुई हैं। मैथिली वाचना पर शङ्कर एवं नरहरि की दो टीकायें भी प्रकाशित हुई हैं। लेकिन इस नाटक की बंगाली वाचना पर लिखी गयी एक भी टीका अद्यावधि प्रकाशित नहीं हुई थी। इस वाचना पर चन्द्रशेखर चक्रवर्ती ने टीका लिखी थी, किन्तु उसकी एक भी पाण्डुलिपि भारत में नहीं थी। आज यहाँ पर चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की “सन्दर्भ-दीपिका” टीका का समीक्षित पाठसम्पादन प्रकाशित किया जाता है। यह क्षण एक अपूर्व उत्सव समान है। क्योंकि भारत में लिखी गयी, लेकिन आज इन्डिया ऑफिस लाईब्रेरी, लंदन के संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही दो पाण्डुलिपियों के आधार पर उसीका प्रकाशन हो रहा है। ये दोनों पाण्डुलिपियाँ बंगलिपि में लिखी गयी हैं। उसका विनियोग डॉ. रिचार्ड पिशेल एवं डॉ. दिलीपकुमार काञ्जीलाल के द्वारा किया गया था। पिशेल ने इस टीका के कुछ अंश अपने प्रथम संस्करण में दिये थे। लेकिन अद्यावधि उसका साद्यन्त पाठ देवनागरी में लिप्यन्तरण करके समीक्षित संस्करण के रूप में प्रकाशित नहीं हुआ था। यह आज कालिदासानुरागियों के समक्ष प्रथम बार प्रकाशित हो रहा है।।
करीब एक सौ साल से ऐसा पूर्वाग्रह फैला हुआ है कि अभिज्ञानशकुन्तलम् का बंगाली वाचना में प्रवहमान पाठ प्रक्षेपों से भरा है और वह मौलिकता से बिछड़ा हुआ पाठ है। देवनागरी पाठ की ओर पक्षपात दिखानेवाले प्रॉफे. पी. एन. पाटणकर (1902), प्रॉफे. शारदारञ्जन राय (1908), और पण्डितप्रवर डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदीजी (1986) आदि विद्वानों ने बंगाली वाचना के पाठ की कड़ी आलोचना की है, और देवनागरी वाचना के पाठ को ही मूलभूत पाठ माना है। आज सारे भारतवर्ष में इस नाटक का पठन-पाठन देवनागरी वाचना के पाठ से ही चल रहा है।। लेकिन प्रॉफे. दिलीपकुमार काञ्जीलाल (1980)ने पहली बार बंगाली पाठ की आपेक्षिक प्राचीनता एवं मौलिकता का समर्थन अनेक प्रमाणों
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से किया है। जिससे इस विवादग्रस्त प्रश्न में पुनरपि नवजागृति लायी गयी है। भूतकाल में कतिपय ऐसे भी विद्वान् आये हैं, जैसे कि - प्रो० श्री बलवन्तराय क. ठाकोर (गुजरात, 1922), जिन्होंने किसी एक वाचना के पाठ का आग्रह नहीं जताया था। किन्तु सभी वाचनाओं के पाठान्तरों का आलोडन करके, इकलेक्टीक प्रिन्सिपल्स का आश्रयण करते हुए, जहाँ से भी अधिक नाट्यक्षमता वाला पाठ मिले उसका चयन करके शाकुन्तल का पाठ पुनर्गठित करने का कहा था। (यह अभिगम ऑल इन्डिया ओरिएन्टल कॉन्फरेन्स के प्रथम अधिवेशन, पूणे, 1912 में “द टेक्स्ट ऑफ शकुन्तला” शीर्षकवाले शोध-आलेख से व्यक्त किया गया था।) तत्पश्चात् श्रद्धेय प्रो० एस. के. बेलवलकर जी (पूणे, 1923)ने अभिज्ञानशाकुन्तल के विभिन्न दृश्यों की उच्चतर समीक्षा करके, काश्मीरी पाठ की ओर अपना पक्षपात घोषित किया था। संक्षेप में कहें तो, विगत शताब्दी में केवल चार-पाँच विद्वानों ने ही इस नाटक की पाठालोचना की है। और अभी भी अभिज्ञानशाकुन्तल की सर्वसम्मत हो सके ऐसी समीक्षितावृत्ति बनाने का कार्य अवशिष्ट है। क्योंकि 1. काश्मीरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं का सही समीक्षित पाठसम्पादन अभी तक अवशिष्ट है, तथा 2. बंगाली वाचना पर लिखी गयी चन्द्रशेखर चक्रवर्ती जैसे महत्त्वपूर्ण टीकाकार की टीका अद्यावधि अप्रकाशित रही थी। किसी भी कृति का समीक्षित पाठसम्पादन तैयार करने में प्राचीन टीकाएँ सहायक-सामग्री की भूमिका निभाती हैं। अतः उसका प्रकाशन परम उपकारक सिद्ध होगा।
अभिज्ञानशकुन्तल की उपलब्ध पाँचों वाचनाओं में से बंगाली वाचना का पाठ ही सब से प्राचीन है ऐसा डॉ. दिलीपकुमार काञ्जीलाल (1980) ने सिद्ध किया है। लेकिन बंगाली वाचना का पाठ ही सर्वांश में मौलिक भी होगा यह मानना मुश्किल है। अतः चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की इस सन्दर्भदीपिका टीका का समीक्षित पाठसम्पादन करने के साथ साथ, बंगाली पाठ की उच्चतर समीक्षा करना भी अनिवार्य है ऐसा सोचा गया है। इस तरह की समीक्षा के लिए मौलिकता का दावा करनेवाली देवनागरी एवं बंगाली वाचनाओं का तुलनात्मक परीक्षण अधिक फलदायी होगा इस विचार से प्रेरित होकर यहाँ बंगाली एवं देवनागरी पाठ में प्रक्षेप एवं संक्षेप का तुलनात्मक विवरण भी प्रस्तुत किया गया है। बंगाली पाठ मौलिकता के नजदीक होते हुए भी उसमें कुछ ऐसे अंश दिखते हैं कि जो कृतिनिष्ठ आन्तरिक प्रमाणों से प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं। देवनागरी के पाठ में अनेक स्थानों पर कटौती करके पाठ को संक्षिप्त किया गया है यहाँ उस पर भी विस्तार से चर्चा की गयी है। इस चर्चा के दौरान, इस नाटक के पाठ का संचरण-इतिहास भी ध्यान में आया है। चतुर्थाङ्क के आरम्भिक चार श्लोकों के पाठभेद से ऐसा इङ्गित मिला है कि शाकुन्तल की विद्यमान पाण्डुलिपियों में शारदालिपि के पाठ से आरम्भ करके पहले मैथिली वाचना में पाठसंक्रमण हुआ है। तदनन्तर मैथिली से बंगाली वाचना का बृहत्पाठ आकारित हुआ होगा और चतुर्थ
(ix)
स्तर पर बृहत्पाठ में से संक्षिप्तीकरण की प्रक्रिया शुरू होकर देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचनाओं का लघुपाठ सम्भूत हुआ है।। यदि इन दोनों पाठ-परम्पराओं की उच्चतर समीक्षा करके मौलिकता कहाँ पर संनिहित है यह निर्णीत नहीं किया जायेगा और दोनों पाठ-परम्पराओं के पक्षधर परस्पर विमुख या उदासीन ही रहेंगे तो अभिज्ञानशाकुन्तल के सही पाठ से और सही सौन्दर्य से हम अभी भी वञ्चित रहेंगे। आशा है कि प्रस्तुत प्रयास से इस दिशा में नया अरुणोदय होगा। इस कार्य में मेरे अनेक प्रिय छात्रों ने निरन्तर परिश्रम किया है। पाण्डुलिपियों का देवनागरी में लिप्यन्तरण करने में श्रीमती भारती पटेल, श्री धमेन्द्र भट्ट साधुवाद के पात्र हैं। श्री सञ्जय दमयन्ती एवं श्रीमती शिप्रा दत्त के प्रति भी सहायता के लिए आभार।
राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन की विदुषी निदेशिका प्रो० दीप्ति त्रिपाठी का सादर आभार जिन्होंने प्रकाशिका सिरीज़ में इस ग्रन्थ के प्रकाशन का प्रस्ताव स्वीकार ही नहीं किया, उसे तुरंत कार्यान्वित भी किया।
सहधर्मचारिणी श्रीमती वृन्दा भट्ट तथा सुपुत्री डॉ० कृष्णा एवं चि० विश्वेश मेरे कार्य में प्रेरणा स्रोत रहे हैं। उन्हें आभार व्यक्त कर उनके महत्त्व को कम नहीं करूँगा। इस कार्य की पूर्ति में विभिन्न प्रकार से सहायता प्रदान करने के लिए निम्नांकित विद्वानों का नाम स्मरण समीचीन होगा। सबसे पहले चन्द्रशेखर चक्रवर्ती की इस टीका की दो पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध करवाने के लिए इण्डिया ऑफिस लाईब्रेरी, लंदन के प्रति मैं औपचारिकता निभाते हुए हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ जिनके अभाव में यह सम्पादन सम्भव ही नहीं था। एक तीसरी प्रति के रूप में, डॉ० दिलीप कुमार काञ्जीलाल ने जो इस टीका की प्रति अपने हाथों से लंदन में लिखी थी, वह मुझे प्रदान की थी, उसके लिए भी मैं हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ और प्रणाम निवेदित करता हूँ। इस कार्य के प्रति शुभाशंसा प्रदान करने के लिए मैं पूज्यश्री डॉ० रेवाप्रसाद द्विवेदी जी, डॉ० राधावल्लभ त्रिपाठी, डॉ० जितेन्द्र शाह, डॉ० बालकृष्ण शर्मा, डॉ० प्रभुनाथ द्विवेदी को सादर प्रणामाञ्जलि निवेदन करता हूँ।
14 जनवरी, 2013
मकरसंक्रान्ति
वसन्तकुमार म० भट्ट
अहमदाबाद
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