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अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (सन्दर्भदीपिका टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Abhijnanashakuntalam of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Abhijnanashakuntalam with Sandarbhadipika Tika & Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished262 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 262 में से

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पृष्ठ 43

अभिज्ञानशकुन्तलम् प्रस्तावना 29

ध्यानास्पद बिन्दु यह है कि नाटक के गन्तव्य को महाकवि ने प्रत्येक अङ्क में किसी न किसी स्वरूप से निर्दिष्ट भी किया है। जैसे कि प्रथमाङ्क में ‘सर्वथा चक्रवर्तिनं पुत्रम् अवाप्नुहि’ शब्दों से वैखानस के आशीर्वचन दिये जाते हैं और सप्तमाङ्क में चक्रवर्ती राजा के लक्षणों से युक्त सर्वदमन भरत की प्राप्ति दिखायी गयी है। तृतीयाङ्क में नायक-नायिका का गान्धर्व-विवाह होता है और चतुर्थाङ्क में कण्वमुनि कहते हैं कि दौष्यन्ति पुत्र को राज्य की धुरा सौंप कर इस आश्रम में फिर से वापस आना। पञ्चमाङ्क के अन्त में, शकुन्तला-प्रत्याख्यान प्रसङ्ग में राजपुरोहित कहता है कि–त्वं साधुभिरुद्दिष्टः प्रथममेव चक्रवर्तिनं पुत्रम् जनयिष्यसि इति। (शाकु. 5 / 29 के बाद), और षष्ठाङ्क में सार्थवाह धनमित्र के पूर्वोक्त प्रसङ्ग के द्वारा दुष्यन्त की अनपत्यता व्यञ्जित की जाती है। किन्तु देवनागरी वाचना और दाक्षिणात्य वाचनावाले शाकुन्तल के द्वितीयाङ्क में कहीं पर भी पुत्रप्राप्ति रूप नाट्यकार्य का किसी भी तरह से निर्देश नहीं है। राजमाता ने जो उपवास किये थे उसका कोई उद्देश्य वहाँ नहीं कहा गया है। यहाँ पर देवनागरी और दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार ‘प्रवृत्तपारण’ या ‘निर्वृत्तपारण’ उपवास का ही निर्देश है।$^{18}$ केवल बंगाली, मैथिली और काश्मीरी वाचना के शकुन्तल में ही “पुत्रपिण्डपालन”, “पुत्रपिण्डपर्युपासन”, एवं “पुत्रपिण्डाराधन” जैसे पाठभेदवाले शब्दों से पुत्र-प्राप्ति रूप लक्ष्य का निर्देश मिलता है। इन पाठभेदों का तुलनात्मक अध्ययन करने से भी यह सिद्ध होगा कि देवनागरी और दाक्षिणात्य वाचना का पाठ संक्षिप्त करने के साथ साथ परिवर्तित भी किया गया है। बंगाली वाचना के पुत्रपिण्डपालन-वाले पाठ में नाटक के चरम लक्ष्य का निर्देश सुरक्षित है, परन्तु वह निर्देश देवनागरी एवं दाक्षिणात्य वाचना से गायब हो गया है। इस तरह बंगाली वाचना के पाठ की मौलिकता की सम्भावना उपर्युक्त एक छोटे से पाठभेद से भी दृढतर सिद्ध होती है।

6-1 संस्कृत नाट्य-साहित्य में भास, कालिदास, शूद्रक, कुन्दमालाकारादि अनेक कवियों ने प्रेमोद्भव के एक बीजभूत कारण के रूप में अनुक्रोश नामक गुण को पुरस्कृत किया है। यद्यपि संस्कृत-कोशकारों नें इस शब्द का दया, अनुकम्पा, घृणा, सहानुभूति जैसे अर्थों का परिगणन किया है, और टीकाकार चन्द्रशेखर ने उसका अर्थ “कृपा” किया है। किन्तु उसका सही अर्थ तो “परदुःखदुःखिता” ही होता है।$^{19}$ दूसरों के दुःख को देख कर, उस दुःखीजन को साहाय्य करने को जो तुरन्त उद्यत होता है वह व्यक्ति सानुक्रोश है-ऐसा कहा जाता है। ऐसी सानुक्रोशता को देख कर कुसुम-सुकुमारचित्तवाली नारियों के हृदय में प्रेम की भावना सद्यः प्रकट होती है। अतः महाकवि कालिदास जब अपनी इस नाट्यकृति में अनुक्रोश शब्द का प्रयोग करते हैं तो उसका भी परीक्षण करके देवनागरी शाकुन्तल के पाठ की आलोचना की जा सकती है:


  1. राघवभट्ट की टीका में - देव्याज्ञापयति - आगामिनि चतुर्थदिवसे प्रवृत्तपारणो मे उपवासो भविष्यति। तथा काटयवेम की टीका में-देव्याज्ञापयति-आगामिनि चतुर्थदिवसे निर्वृत्तपारणो मे उपवासो भविष्यति। ऐसे पाठान्तरों को स्वीकार किया गया है।
  2. एतत्कृत्वा प्रियमनुचितप्रार्थनावर्तिनो मे, सौहार्दाद् वा विधुर इति वा मय्यनुक्रोशबुद्ध्या। मेघदूतम्-55